SEBI Closing Auction Session: शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए हाल ही में लागू किए गए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) को लेकर निवेशकों और बाजार सहभागियों के बीच बहस तेज है। नई व्यवस्था के तहत सामान्य कारोबार खत्म होने के बाद 20 मिनट का विशेष ऑक्शन सेशन आयोजित किया जाता है। इस दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर के आधार पर शेयरों का क्लोजिंग प्राइस तय किया जाता है।
नई व्यवस्था को लेकर बाजार के कुछ हिस्सों में चिंता जताई जा रही है। निवेशकों और ब्रोकर्स की ओर से सिस्टम में भागीदारी, ऑर्डर निष्पादन और क्लोजिंग प्राइस को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इसी बीच SEBI प्रमुख तुहिन कांता पांडे ने बाजार सहभागियों को भरोसा दिलाया है कि नियामक CAS को लेकर मिल रहे फीडबैक की समीक्षा कर रहा है। जरूरत महसूस होने पर नियमों में बदलाव पर भी विचार किया जा सकता है।
HighLights
- SEBI प्रमुख तुहिन कांता पांडे ने CAS को लेकर मिल रहे बाजार फीडबैक की समीक्षा का आश्वासन दिया है।
- जरूरत पड़ने पर क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के नियमों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
- SEBI के मुताबिक CAS का उद्देश्य क्लोजिंग प्राइस को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है।
- नई व्यवस्था में 20 मिनट का अलग ऑक्शन सेशन रखा गया है।
- ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म पर इंडिकेटिव प्राइस दिखाने की सुविधा भी धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है।
CAS को लेकर SEBI चीफ ने क्या कहा?
मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान SEBI प्रमुख तुहिन कांता पांडे ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन को लेकर बाजार सहभागियों की चिंताओं पर बात की। उन्होंने कहा कि नियामक बाजार से मिलने वाले फीडबैक और सुझावों को गंभीरता से देख रहा है। अगर समीक्षा के बाद किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता महसूस होती है तो नियमों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक CAS की वजह से किसी तरह की हेराफेरी के संकेत नहीं मिले हैं। SEBI के अनुसार नई व्यवस्था को बाजार की पारदर्शिता बढ़ाने और क्लोजिंग प्राइस को अधिक विश्वसनीय बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
पांडे ने यह भी कहा कि SEBI अलग-अलग बाजार सहभागियों से सुझाव ले रहा है। इसके अलावा सोशल मीडिया और बाजार में चल रही चर्चाओं पर भी नजर रखी जा रही है, ताकि नई व्यवस्था के वास्तविक प्रभाव को समझा जा सके।
क्या है Closing Auction Session?
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन यानी CAS शेयर बाजार में ट्रेडिंग खत्म होने के बाद होने वाला एक विशेष नीलामी सत्र है। इसका उद्देश्य किसी शेयर का ऐसा क्लोजिंग प्राइस तय करना है, जिस पर उपलब्ध खरीद और बिक्री के ऑर्डर के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सके।
नई व्यवस्था में नियमित ट्रेडिंग खत्म होने के बाद 20 मिनट का क्लोजिंग ऑक्शन सेशन आयोजित किया जाता है। इस दौरान एक्सचेंज पर खरीद और बिक्री के ऑर्डर इकट्ठे किए जाते हैं। इसके बाद उस कीमत का निर्धारण किया जाता है, जिस पर अधिकतम संभव मात्रा में सौदे किए जा सकें।
यानी अब दिन के आखिरी कुछ ट्रेड से शेयर की क्लोजिंग कीमत प्रभावित होने की संभावना को कम करने की कोशिश की गई है।
पुराने सिस्टम में क्या दिक्कत थी?
CAS लागू होने से पहले क्लोजिंग प्राइस निर्धारित करने के लिए एक औसत मूल्य आधारित व्यवस्था इस्तेमाल की जाती थी। इस व्यवस्था में कारोबारी दिन के आखिरी हिस्से में हुए सौदों का प्रभाव क्लोजिंग प्राइस पर पड़ सकता था।
SEBI का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था में कम मात्रा के कुछ ट्रेड भी अंतिम कीमत को प्रभावित कर सकते थे। इसे बाजार में क्लोजिंग मार्किंग जैसी गतिविधियों के संभावित जोखिम से जोड़ा जाता रहा है।
नई ऑक्शन व्यवस्था का उद्देश्य इस जोखिम को कम करना है। इसमें केवल आखिरी कुछ सेकेंड या मिनट में होने वाले ट्रेड के बजाय ऑर्डर की पूरी तस्वीर को ध्यान में रखकर क्लोजिंग प्राइस निर्धारित करने की कोशिश की जाती है।
CAS में कैसे तय होती है क्लोजिंग कीमत?
क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान निवेशकों के खरीद और बिक्री के ऑर्डर एकत्र किए जाते हैं। एक्सचेंज इन ऑर्डर्स का मिलान करके ऐसी कीमत खोजता है, जिस पर अधिकतम मात्रा में शेयरों का कारोबार संभव हो।
इसका फायदा यह है कि क्लोजिंग प्राइस केवल एक छोटे ट्रेड पर निर्भर नहीं रहता। इसके बजाय बाजार में उपलब्ध कई खरीद-बिक्री ऑर्डर्स को ध्यान में रखा जाता है।
नई व्यवस्था में इंडिकेटिव प्राइस भी दिखाया जाता है। इससे बाजार सहभागियों को ऑक्शन के दौरान संभावित क्लोजिंग प्राइस का अंदाजा मिलता है।
इसके अलावा रैंडम क्लोज की व्यवस्था भी रखी गई है। इसका मकसद यह है कि बाजार बंद होने से ठीक पहले कोई व्यक्ति जानबूझकर ऑर्डर डालकर अंतिम कीमत को प्रभावित न कर सके।
निवेशकों को CAS से क्या परेशानी है?
नई व्यवस्था का उद्देश्य भले ही बाजार को अधिक पारदर्शी बनाना है, लेकिन इसके लागू होने के बाद कुछ बाजार सहभागियों ने इसकी व्यावहारिक चुनौतियों पर सवाल उठाए हैं।
कुछ निवेशकों को चिंता है कि क्लोजिंग ऑक्शन में पर्याप्त भागीदारी नहीं होने पर कीमतों की खोज यानी Price Discovery प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा ऐसे निवेशक जो सामान्य ट्रेडिंग के अंतिम मिनटों में शेयर खरीदने या बेचने के आदी रहे हैं, उनके लिए नई व्यवस्था अलग अनुभव हो सकती है।
ब्रोकर्स और निवेशकों के लिए नई प्रक्रिया को समझना भी जरूरी है, क्योंकि सामान्य ट्रेडिंग और क्लोजिंग ऑक्शन के नियमों में अंतर है।
यही वजह है कि SEBI ने बाजार सहभागियों से मिलने वाले फीडबैक को महत्वपूर्ण माना है। हालांकि, नियामक का कहना है कि सिर्फ शुरुआती प्रतिक्रियाओं के आधार पर व्यवस्था को गलत नहीं माना जा सकता और इसके प्रभाव का आकलन समय के साथ किया जाएगा।
दुनिया के कई बड़े बाजारों में पहले से लागू है CAS
SEBI प्रमुख के अनुसार क्लोजिंग ऑक्शन कोई केवल भारतीय बाजार की व्यवस्था नहीं है। जापान, अमेरिका, जर्मनी, हांगकांग, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई प्रमुख बाजारों में भी क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।
इन बाजारों में क्लोजिंग ऑक्शन का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है ताकि ट्रेडिंग डे के अंत में किसी शेयर का संदर्भ मूल्य अधिक व्यवस्थित तरीके से तय किया जा सके।
भारत में भी इसका एक बड़ा उद्देश्य ऐसे निवेशकों और संस्थानों को अधिक विश्वसनीय क्लोजिंग प्राइस उपलब्ध कराना है, जिनके निवेश या वैल्यूएशन में दिन के अंतिम मूल्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
म्यूचुअल फंडों की भागीदारी बढ़ी
SEBI के मुताबिक CAS में म्यूचुअल फंडों की भागीदारी में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। नई व्यवस्था के शुरुआती दिन म्यूचुअल फंडों की भागीदारी करीब 5-6 फीसदी रही थी, जो बाद में बढ़कर लगभग 20-25 फीसदी तक पहुंच गई।
म्यूचुअल फंड और खासकर पैसिव फंड के लिए क्लोजिंग प्राइस काफी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे फंड किसी इंडेक्स को ट्रैक करते हैं और उन्हें अपने पोर्टफोलियो की वैल्यू तय करने के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ मूल्य की जरूरत होती है।
SEBI का मानना है कि बेहतर क्लोजिंग प्राइस से पैसिव फंडों में ट्रैकिंग एरर को कम करने में मदद मिल सकती है।
ब्रोकरेज ऐप पर भी दिखेगा Indicative Price
CAS को लेकर एक महत्वपूर्ण बदलाव ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म पर इंडिकेटिव प्राइस की उपलब्धता है। SEBI प्रमुख ने बताया कि कुछ प्रमुख ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म ने अपने वेब प्लेटफॉर्म पर इंडिकेटिव प्राइस दिखाना शुरू कर दिया है।
बताया गया है कि Zerodha और Upstox जैसे प्लेटफॉर्म पर यह सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि मोबाइल ऐप पर भी इसे उपलब्ध कराने की दिशा में काम हो रहा है। वहीं ICICI Securities, Groww और Angel One जैसे अन्य प्रमुख ब्रोकर्स के प्लेटफॉर्म पर भी इस सुविधा को शामिल करने की प्रक्रिया बताई गई है।
इस सुविधा से निवेशकों को ऑक्शन के दौरान संभावित क्लोजिंग प्राइस को समझने में मदद मिल सकती है।
क्या CAS के नियमों में बदलाव होगा?
फिलहाल SEBI की ओर से CAS को खत्म करने या बड़े बदलाव की कोई घोषणा नहीं की गई है। नियामक का रुख यह है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य बाजार की संरचना को मजबूत करना है और इसके प्रभाव का आकलन किया जा रहा है।
अगर बाजार सहभागियों से मिलने वाले फीडबैक और वास्तविक आंकड़ों से यह सामने आता है कि किसी हिस्से में सुधार की जरूरत है, तो SEBI नियमों में बदलाव पर विचार कर सकता है।
इसका मतलब है कि निवेशकों की शिकायतों और सुझावों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है। हालांकि, किसी भी बदलाव का फैसला बाजार के आंकड़ों, ट्रेडिंग पैटर्न और निवेशकों पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव के आधार पर ही होने की संभावना है।
निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?
निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि CAS लागू होने के बाद दिन का क्लोजिंग प्राइस सामान्य ट्रेडिंग के अंतिम कुछ मिनटों में हुए ट्रेड के आधार पर उसी तरह निर्धारित नहीं होगा, जैसा पहले होता था।
इसलिए अगर कोई निवेशक खास तौर पर दिन के अंत में ट्रेड करता है, तो उसे ऑक्शन प्रक्रिया, इंडिकेटिव प्राइस और ऑर्डर मैचिंग के नियमों को समझना चाहिए।
खासकर बड़े निवेशकों, म्यूचुअल फंडों और पैसिव फंडों के लिए क्लोजिंग प्राइस का महत्व अधिक है। ऐसे में नई व्यवस्था के असर को समझने के लिए शुरुआती दिनों के बजाय लंबी अवधि के आंकड़ों को देखना ज्यादा उपयोगी होगा।
पारदर्शिता बनाम बाजार की चिंता, आगे क्या?
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन को लेकर फिलहाल तस्वीर दो पहलुओं वाली है। एक तरफ SEBI इसे बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने, बेहतर प्राइस डिस्कवरी करने और क्लोजिंग प्राइस में संभावित हेरफेर के जोखिम को कम करने वाला सुधार मान रहा है। दूसरी तरफ बाजार सहभागियों को नई व्यवस्था के व्यावहारिक असर और ट्रेडिंग में होने वाली संभावित दिक्कतों को लेकर सवाल हैं।
SEBI प्रमुख का यह बयान महत्वपूर्ण है कि नियामक बाजार से मिल रहे फीडबैक की समीक्षा करेगा और आवश्यकता पड़ने पर नियमों में बदलाव पर विचार किया जाएगा।
ऐसे में आने वाले समय में CAS से जुड़े ट्रेडिंग डेटा, निवेशकों की भागीदारी और क्लोजिंग प्राइस पर इसके प्रभाव से यह स्पष्ट होगा कि नई व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है। फिलहाल SEBI का फोकस इसे अधिक पारदर्शी और निवेशकों के लिए उपयोगी बनाने पर है।


