नई दिल्ली। दिल्ली से मेरठ की ओर जाते समय रास्ते में आने वाला मोदीनगर आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक शहरों में गिना जाता है। लेकिन इस शहर की पहचान सिर्फ चीनी मिलों और उद्योगों तक सीमित नहीं है। इसके नाम के पीछे एक ऐसे कारोबारी की कहानी छिपी है, जिसने बेहद सीमित संसाधनों से शुरुआत करके एक विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़ा किया।
यह कहानी है गूजरमल मोदी की। उन्होंने जिस जगह पर अपना कारोबार शुरू किया, वह कभी बेगमाबाद नाम की एक छोटी-सी बस्ती थी। गूजरमल मोदी ने यहां चीनी मिल लगाई और धीरे-धीरे इस इलाके को एक औद्योगिक केंद्र में बदल दिया। बाद में यही बेगमाबाद मोदीनगर के नाम से पहचाना जाने लगा।
किसने बनाया बेगमाबाद को मोदीनगर?
गूजरमल मोदी का जन्म 9 अगस्त 1902 को हुआ था। वे भारतीय उद्योग जगत के उन कारोबारियों में शामिल रहे, जिन्होंने सिर्फ अपनी कंपनी का विस्तार नहीं किया, बल्कि जिस इलाके में कारोबार स्थापित किया, वहां भी औद्योगिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा दिया।
उन्होंने अपने भाई केदार नाथ मोदी के साथ मिलकर 1930 के दशक में कारोबार को आगे बढ़ाया। मोदीनगर में चीनी मिल की स्थापना उनके कारोबारी सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई उद्योग शुरू किए और देखते ही देखते बेगमाबाद एक औद्योगिक शहर में बदलने लगा।
पहला काम था कैशियर का
गूजरमल मोदी का कारोबारी सफर सीधे किसी बड़े उद्योग से शुरू नहीं हुआ था। वर्ष 1919 में उन्होंने अपने पिता की अनाज मिल में कैशियर के तौर पर काम करना शुरू किया।
उस समय देश प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में भी काफी उतार-चढ़ाव था। ऐसे माहौल में गूजरमल ने कारोबार की बारीकियों को करीब से समझा।
मिल में काम करते हुए उन्हें अनुभव तो मिला, लेकिन वह नौकरी से संतुष्ट नहीं थे। उनके भीतर अपना कारोबार खड़ा करने की इच्छा लगातार मजबूत होती गई।
₹400 लेकर घर से निकले
गूजरमल मोदी के जीवन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपना स्वतंत्र कारोबारी सफर बेहद कम पूंजी से शुरू किया था।
1932 में वह करीब ₹400 लेकर बेहतर कारोबारी अवसर की तलाश में घर से निकले। दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने कारोबार के लिए ऐसी जगह की तलाश शुरू की, जहां उद्योग स्थापित किया जा सके।
आखिरकार उनकी नजर बेगमाबाद पर पड़ी। यह जगह आगे चलकर उनके औद्योगिक साम्राज्य का आधार बनी। यहां उन्होंने चीनी मिल स्थापित की। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों के बीच कारोबार को संभाला और धीरे-धीरे इसे मुनाफे वाले उद्योग में बदल दिया।
चीनी मिल से शुरू हुआ सफर
चीनी मिल गूजरमल मोदी के कारोबारी साम्राज्य की शुरुआत थी। इसके बाद उन्होंने कारोबार को केवल चीनी उद्योग तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश किया और कई नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित कीं। यही विस्तार आगे चलकर मोदी ग्रुप की पहचान बना।
गूजरमल मोदी की खासियत यह थी कि वह एक उद्योग में सफलता मिलने के बाद उसी पर निर्भर नहीं रहे। उन्होंने रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े उत्पादों से लेकर टेक्सटाइल, तेल, स्टील, रबर और अन्य क्षेत्रों में कारोबार का विस्तार किया।
टॉयलेट सोप फैक्ट्री भी बनी बड़ी सफलता
गूजरमल मोदी की शुरुआती बड़ी सफलताओं में टॉयलेट सोप का कारोबार भी शामिल था। उनकी साबुन फैक्ट्री ने 1941 में काम करना शुरू किया।
बताया जाता है कि उस दौर में टॉयलेट सोप के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले टैलो यानी जानवरों की चर्बी के विकल्प की तलाश एक महत्वपूर्ण चुनौती थी। गूजरमल मोदी ने एक बंगाली विशेषज्ञ की मदद से बिना टैलो के टॉयलेट सोप तैयार करने का तरीका विकसित किया।
इसमें उनकी वनस्पति बनाने वाली इकाई से प्राप्त वनस्पति का इस्तेमाल किया गया। यह प्रयोग सफल रहा और साबुन का कारोबार भी तेजी से आगे बढ़ा।
गूजरमल मोदी ने किन-किन कारोबारों की शुरुआत की?
गूजरमल मोदी ने कुछ ही वर्षों में अपने कारोबार का दायरा काफी बढ़ा दिया। उनके औद्योगिक विस्तार की एक झलक इस तरह देखी जा सकती है:
- 1933: चीनी मिल
- 1939: वनस्पति बनाने की यूनिट
- 1940: कपड़े धोने का साबुन बनाने की फैक्ट्री
- 1941: टॉयलेट सोप फैक्ट्री
- 1941: मोदी टिन फैक्ट्री
- 1941: मोदी फूड प्रोडक्ट्स
- 1944: मोदी ऑयल मिल्स
- 1945: बिस्किट और कन्फेक्शनरी प्लांट
- 1947: पेंट और वार्निश फैक्ट्री
- 1948: टेक्सटाइल मिल
- 1957: स्पिनिंग मिल
- 1959: आटा मिल
- 1960: डिस्टिलरी
- 1961: टॉर्च फैक्ट्री
- 1964: स्टील फैक्ट्री
- 1965: धागा मिल
- 1965: मोदीपॉन
- 1971: मोदी रबर लिमिटेड
इन उद्योगों के विस्तार ने मोदीनगर को एक बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
बेगमाबाद कैसे बना मोदीनगर?
जब गूजरमल मोदी ने बेगमाबाद में चीनी मिल और दूसरी औद्योगिक इकाइयां स्थापित करनी शुरू कीं, तो यह छोटा-सा इलाका धीरे-धीरे उद्योगों के केंद्र में बदलने लगा।
कारखानों के साथ यहां रोजगार के अवसर बढ़े और शहर का आर्थिक महत्व भी बढ़ता गया। इसी औद्योगिक विकास ने बेगमाबाद को एक नई पहचान दी।
1945 में इस शहर का नाम बदलकर मोदीनगर किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह गूजरमल मोदी के नाम से जुड़ा यह शहर आगे चलकर उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल हो गया।
सिर्फ उद्योग नहीं, शहर बसाने पर भी दिया जोर
गूजरमल मोदी की कहानी को केवल एक कारोबारी सफलता की कहानी के तौर पर नहीं देखा जाता। उनका औद्योगिक मॉडल उस दौर के कई कारोबारियों से अलग था।
उन्होंने उद्योग स्थापित करने के साथ-साथ उनके आसपास काम करने वाले लोगों के लिए सुविधाएं विकसित करने पर भी ध्यान दिया। जैसे-जैसे कारखानों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे बेगमाबाद में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बढ़ती गईं।
यही वजह रही कि एक छोटी बस्ती धीरे-धीरे एक योजनाबद्ध औद्योगिक शहर के रूप में विकसित हुई।
गूजरमल मोदी का निधन और कारोबार का बंटवारा
गूजरमल मोदी का निधन 22 जनवरी 1976 को हुआ। उनके निधन के बाद उनके परिवार और कारोबारी विरासत को अगली पीढ़ी ने आगे बढ़ाया।
बाद में 1989 में मोदी ग्रुप का विभाजन हुआ। कारोबार का बंटवारा गूजरमल मोदी के पांच बेटों—कृष्ण कुमार मोदी, वी.के. मोदी, एस.के. मोदी, बी.के. मोदी और यू.के. मोदी—तथा उनके भाई केदार नाथ मोदी के तीन बेटों के बीच हुआ।
गूजरमल मोदी के सबसे बड़े बेटे कृष्ण कुमार मोदी का नाम भी भारतीय कारोबारी जगत में काफी चर्चित रहा। वह गॉडफ्रे फिलिप्स से जुड़े रहे।
₹400 से शुरू हुआ सफर बना औद्योगिक विरासत
गूजरमल मोदी की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें एक छोटे स्तर से शुरू होकर बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचने की पूरी यात्रा दिखाई देती है।
एक समय अपने पिता की अनाज मिल में कैशियर के तौर पर काम करने वाले गूजरमल मोदी, बाद में चीनी, साबुन, वनस्पति, खाद्य उत्पाद, टेक्सटाइल, स्टील, रबर और कई अन्य क्षेत्रों में कारोबार खड़ा करने वाले उद्योगपति बने।
उन्होंने सिर्फ कंपनियां नहीं बनाईं, बल्कि बेगमाबाद को एक औद्योगिक शहर में बदलने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज मोदीनगर का नाम सुनते ही गूजरमल मोदी और उनके औद्योगिक साम्राज्य की कहानी याद आती है।
यही वजह है कि मोदीनगर का इतिहास सिर्फ एक शहर के नाम बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस दौर के भारतीय उद्यमिता की कहानी भी है, जब सीमित पूंजी और कठिन परिस्थितियों के बीच कारोबार खड़ा करने वाले उद्योगपतियों ने नए औद्योगिक केंद्रों की नींव रखी।


