VB-G RAM-G Employment: ग्रामीण इलाकों में रोजगार की नई गारंटी स्कीम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G RAM-G के तहत जुलाई 2026 में रोजगार के अवसरों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। केंद्र सरकार के डैशबोर्ड के 10 अगस्त को अपडेट किए गए आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में इस योजना के तहत गारंटीड रोजगार के पर्सन-डेज की संख्या जुलाई 2025 में मनरेगा के तहत दर्ज आंकड़े की तुलना में 50 फीसदी से ज्यादा कम रही।
केंद्र सरकार ने 1 जुलाई 2026 से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जगह VB-G RAM-G को लागू किया है। नई योजना में रोजगार की गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन किया गया है। हालांकि, योजना शुरू होने के पहले ही महीने में रोजगार के पर्सन-डेज में इतनी बड़ी गिरावट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकारी सूत्रों और राज्य सरकार के एक प्रतिनिधि के मुताबिक, रोजगार में कमी के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। मानसून, नई योजना को लागू करने की शुरुआती दिक्कतें, राज्यों की वित्तीय स्थिति और ग्रामीण श्रमिकों के पलायन में बदलाव जैसे कई फैक्टर इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
जुलाई में रोजगार में 50 फीसदी से ज्यादा की गिरावट
VB-G RAM-G के आधिकारिक डैशबोर्ड पर उपलब्ध 10 अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में इस नई योजना के तहत गारंटीड रोजगार के पर्सन-डेज की संख्या पिछले साल जुलाई में मनरेगा के तहत उपलब्ध रोजगार की तुलना में 50 फीसदी से अधिक कम रही।
यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जुलाई 2025 में ग्रामीण रोजगार के लिए मनरेगा लागू था, जबकि जुलाई 2026 में उसी अवधि में नई VB-G RAM-G योजना लागू हो चुकी थी।
हालांकि, सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ पर्सन-डेज में गिरावट को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोरी का सीधा संकेत नहीं माना जाना चाहिए। जुलाई का महीना मानसून और खेती से जुड़ी गतिविधियों के लिहाज से भी अलग होता है। इसलिए इस अवधि में ग्रामीण रोजगार की मांग और सरकारी योजना के तहत उपलब्ध काम दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
मानसून बना रोजगार घटने की बड़ी वजह
केंद्र सरकार के सूत्रों के मुताबिक, मानसून का सीजन VB-G RAM-G के तहत रोजगार घटने की प्रमुख वजहों में से एक है। बारिश के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह के सार्वजनिक कार्यों की रफ्तार धीमी हो जाती है या कुछ काम अस्थायी तौर पर रोक दिए जाते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इस समय खेती से जुड़े काम भी बढ़ जाते हैं। ऐसे में ग्रामीण मजदूरों के लिए सरकारी रोजगार योजना के बजाय कृषि क्षेत्र में काम के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं।
यही वजह है कि जुलाई के आंकड़ों को पूरे वित्त वर्ष के रोजगार ट्रेंड के तौर पर देखना जल्दबाजी हो सकती है। आने वाले महीनों में योजना के तहत रोजगार की मांग और उपलब्धता की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।
नई योजना लागू होने में भी आईं शुरुआती दिक्कतें
मनरेगा की जगह VB-G RAM-G लागू होने से ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के प्रशासनिक और वित्तीय ढांचे में बदलाव हुआ है। नई योजना के तहत राज्यों और केंद्र की जिम्मेदारियों में भी बदलाव किया गया है।
ऐसे में योजना के शुरुआती चरण में राज्यों को नई व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाने, फंडिंग और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लागू करने में कुछ समय लग सकता है।
केंद्र सरकार के दो सूत्रों ने भी संकेत दिया है कि मनरेगा से नई योजना में बदलाव के दौरान आई शुरुआती दिक्कतों का असर रोजगार के आंकड़ों पर पड़ सकता है।
राज्यों पर आया 40 फीसदी खर्च का बोझ
VB-G RAM-G और मनरेगा के बीच सबसे अहम बदलावों में से एक फंडिंग सिस्टम है। नई योजना में ज्यादातर राज्यों को योजना पर होने वाले खर्च का 40 फीसदी हिस्सा खुद उठाना है, जबकि बाकी 60 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करती है।
इस बदलाव का सीधा असर राज्यों के बजट पर पड़ सकता है। जिन राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से दबाव में है, उनके लिए नई योजना में अपना हिस्सा उपलब्ध कराना चुनौती बन सकता है।
राज्य सरकार के एक प्रतिनिधि के मुताबिक, कई राज्यों की वित्तीय स्थिति खराब है। इसके अलावा राज्यों ने अलग-अलग सामाजिक कल्याण और अन्य कार्यक्रमों पर भी बड़ा खर्च किया है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार योजना के लिए अतिरिक्त रकम उपलब्ध कराना उनके लिए मुश्किल हो सकता है।
राज्यों का बढ़ता कर्ज भी चिंता की वजह
भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में भी राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दबाव का संकेत मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यों का कंसॉलिडेटेड फिस्कल डेफिसिट FY25 में बढ़कर जीडीपी के 3.3 फीसदी तक पहुंच गया। इससे पहले 2021-22 से 2023-24 के दौरान यह 3 फीसदी से नीचे रहा था।
राज्यों के बढ़ते राजकोषीय दबाव को देखते हुए VB-G RAM-G में उनके हिस्से की फंडिंग एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सभी राज्यों में योजना के तहत रोजगार में गिरावट का कारण केवल फंडिंग की कमी है। अलग-अलग राज्यों में कृषि गतिविधियों, मानसून, मजदूरों की मांग और योजना के क्रियान्वयन की स्थिति अलग हो सकती है।
VB-G RAM-G में 125 दिन रोजगार की गारंटी
नई VB-G RAM-G योजना में ग्रामीण परिवारों को 125 दिन के गारंटीड रोजगार का प्रावधान किया गया है। यह मनरेगा के तहत मिलने वाले 100 दिनों के रोजगार की तुलना में 25 दिन अधिक है।
सरकार की ओर से रोजगार की गारंटी बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों के लिए आय के अवसरों को मजबूत करना है। लेकिन दूसरी तरफ ज्यादा दिनों के रोजगार की गारंटी का मतलब योजना के कुल खर्च में भी बढ़ोतरी हो सकता है।
ऐसे में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ उनके ऊपर वित्तीय दबाव का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो जाता है।
बुआई और कटाई के समय 60 दिन तक काम रहेगा बंद
VB-G RAM-G में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान है। योजना के तहत बुआई और कटाई के पीक सीजन में कुल 60 दिन तक काम रोका जा सकता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि के महत्वपूर्ण सीजन में ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की कमी न हो। यदि सरकारी रोजगार और कृषि रोजगार एक ही समय पर उपलब्ध रहेंगे, तो किसानों को खेती के काम के लिए पर्याप्त श्रमिक मिलने में परेशानी हो सकती है।
इसलिए नई व्यवस्था में कृषि चक्र को ध्यान में रखते हुए रोजगार योजना के काम को सीमित करने का प्रावधान किया गया है।
बिहार और पश्चिम बंगाल से पलायन की रफ्तार में बदलाव
रोजगार के आंकड़ों में गिरावट का एक अन्य कारण ग्रामीण श्रमिकों के पलायन में आया बदलाव भी माना जा रहा है।
केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से मजदूरों के पलायन की रफ्तार धीमी हुई है। यदि ग्रामीण श्रमिक अपने ही राज्यों या आसपास के क्षेत्रों में रोजगार के अवसर हासिल कर रहे हैं, तो सरकारी ग्रामीण रोजगार योजना के तहत काम की मांग कम हो सकती है।
इसका मतलब यह भी हो सकता है कि सरकारी योजना में पर्सन-डेज घटने का पूरा असर ग्रामीण परिवारों की आय पर पड़ा हो, ऐसा सीधे तौर पर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
क्या रोजगार में गिरावट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए खतरे का संकेत है?
जुलाई 2026 के आंकड़े निश्चित तौर पर ध्यान खींचने वाले हैं, लेकिन इन्हें समझने के लिए कई पहलुओं को एक साथ देखना होगा।
एक तरफ VB-G RAM-G के तहत पर्सन-डेज में 50 फीसदी से ज्यादा की गिरावट हुई है। दूसरी तरफ जुलाई मानसून का महीना है और इसी दौरान खेती से जुड़ी गतिविधियां भी बढ़ती हैं। इसके अलावा नई योजना लागू होने का यह पहला महीना था।
केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी कहा है कि पर्सन-डेज में कमी को सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव के संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आने वाले महीनों के आंकड़े यह समझने में ज्यादा मदद करेंगे कि जुलाई की गिरावट अस्थायी थी या नई योजना के तहत रोजगार की मांग और उपलब्धता में कोई संरचनात्मक बदलाव हो रहा है।
आगे के आंकड़ों पर रहेगी नजर
VB-G RAM-G अभी अपने शुरुआती चरण में है। इसलिए जुलाई के आंकड़ों के आधार पर योजना की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। खासकर मानसून खत्म होने के बाद जब ग्रामीण निर्माण और दूसरे सार्वजनिक कार्यों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, तब रोजगार के आंकड़ों में बदलाव देखने को मिल सकता है।
साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें नई फंडिंग व्यवस्था के तहत अपनी 40 फीसदी हिस्सेदारी किस तरह उपलब्ध कराती हैं। यदि राज्यों के पास पर्याप्त बजट उपलब्ध रहता है और योजना का क्रियान्वयन सुचारु होता है, तो रोजगार के आंकड़े आगे सुधर सकते हैं।
फिलहाल जुलाई में पर्सन-डेज में 50 फीसदी से अधिक की गिरावट ने यह जरूर दिखा दिया है कि VB-G RAM-G के लागू होने के शुरुआती चरण में रोजगार का ट्रेंड मनरेगा के पिछले साल के मुकाबले काफी अलग रहा है। अब आने वाले महीनों के आंकड़े यह तय करेंगे कि यह गिरावट मुख्य रूप से मानसून और ट्रांजिशन का असर थी या नई योजना की फंडिंग और क्रियान्वयन व्यवस्था का भी इसमें बड़ा योगदान है।


