El Nino impact: मौसम विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मजबूत हो रहे अल नीनो के असर से अगले दो हफ्तों के दौरान देश के पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मानसून में यह सुस्ती लंबे समय तक बनी रही तो कपास, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलों को नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
Monsoon & El Nino Update: भारत में मानसून की स्थिति को लेकर कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। मौसम विभाग (IMD) के दो वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मजबूत हो रहे अल नीनो (El Nino) के प्रभाव के कारण अगले दो हफ्तों में देश के पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मानसून में संभावित सुस्ती और शुष्क मौसम के लंबे खिंचने से हाल ही में बोई गई सोयाबीन, कपास, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलों पर दबाव बढ़ सकता है। इन फसलों की शुरुआती वृद्धि के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अगर बारिश का लंबा ब्रेक आता है तो किसानों के लिए सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है और उत्पादन लागत भी प्रभावित हो सकती है।
मानसून में कमी से सिंचाई और कृषि आजीविका पर असर
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था मानसून पर काफी हद तक निर्भर है। देश में होने वाली वार्षिक बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसून से आता है। यही बारिश जलाशयों, नदियों और भूजल स्रोतों को रिचार्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारत में कृषि भूमि का लगभग आधा हिस्सा अभी भी पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में मानसून की बारिश में लंबे समय तक कमी आने पर किसानों की निर्भरता बारिश पर और बढ़ जाती है। कृषि क्षेत्र में किसी बड़े इलाके में सूखे जैसे हालात बनने पर इसका असर सिर्फ फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण आय, खाद्य कीमतों और कृषि से जुड़े कारोबार पर भी पड़ सकता है।
रॉयटर्स के मुताबिक, IMD के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि अगले दो सप्ताह में कुछ पूर्वी और उत्तरी राज्यों को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश की गतिविधियां कमजोर हो सकती हैं। अधिकारी के अनुसार, पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में बारिश की कमी महत्वपूर्ण या गंभीर हो सकती है।
1 जून से अब तक 12% कम बारिश
चालू मानसून सीजन में बारिश का आंकड़ा भी चिंता बढ़ा रहा है। 1 जून से अब तक देश में सामान्य से करीब 12 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि, बारिश की स्थिति अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में काफी अलग है।
दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में बारिश की कमी करीब 34 फीसदी तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में अगर आने वाले दिनों में मानसून की गतिविधियां और कमजोर होती हैं तो राज्य के कई कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और फसल की स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
मौसम विभाग के दूसरे अधिकारी के मुताबिक, मजबूत हो रहा अल नीनो आने वाले हफ्तों में बारिश की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। अगर यह स्थिति जारी रहती है तो महीने के अंत तक बारिश की कमी का अंतर और बढ़ने की आशंका है।
बारिश कम हुई तो तापमान भी बढ़ सकता है
मानसून में कमजोरी का असर सिर्फ बारिश पर ही नहीं पड़ता। शुष्क मौसम के दौरान तापमान में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। IMD अधिकारी के अनुसार, आने वाले सप्ताहों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है।
बारिश की कमी और तापमान में बढ़ोतरी का संयोजन खरीफ फसलों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। खासकर ऐसी फसलें जिनकी बुवाई हाल ही में हुई है, वे मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर शुरुआती विकास के चरण में प्रभावित हो सकती हैं।
नई बोई गई सोयाबीन, कपास और मक्का की फसलों पर खतरा
जुलाई में देश के कई हिस्सों में सामान्य के करीब बारिश होने से मिट्टी में नमी की स्थिति बेहतर हुई थी। इसके बाद किसानों ने खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी दिखाई। इनमें सोयाबीन, कपास, मक्का, दलहन और धान प्रमुख हैं।
लेकिन नई बोई गई फसलों की जड़ें अभी पर्याप्त गहराई तक विकसित नहीं हुई हैं। ऐसे में अगर बारिश अचानक लंबे समय के लिए रुक जाती है तो पौधों को मिट्टी से पर्याप्त पानी मिलना मुश्किल हो सकता है।
मुंबई स्थित एक ग्लोबल ट्रेड हाउस के डीलर के मुताबिक, नई बोई गई फसलों की जड़ें अभी मिट्टी में ज्यादा गहराई तक नहीं पहुंची हैं। इसलिए बारिश के बिना लंबा शुष्क दौर इन फसलों को नुकसान के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।
खासतौर पर सोयाबीन और कपास जैसी फसलों के लिए शुरुआती विकास के दौरान पर्याप्त नमी जरूरी होती है। इसी तरह मक्का और दलहन की फसलें भी लंबे समय तक नमी की कमी का सामना करने पर प्रभावित हो सकती हैं।
9.68 करोड़ हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त तक देश में करीब 96.8 मिलियन हेक्टेयर यानी 9.68 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी थी।
यह आंकड़ा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 2 फीसदी कम है। ऐसे समय में जब खरीफ बुवाई का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है, मानसून की आगे की चाल किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर अगले दो सप्ताह में बारिश सामान्य से कम रहती है और इसके बाद भी शुष्क मौसम जारी रहता है तो जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां किसानों को अतिरिक्त सिंचाई का सहारा लेना पड़ सकता है। इससे खेती की लागत बढ़ने की संभावना भी रहती है।
अल नीनो क्या है और मानसून पर इसका असर क्यों पड़ता है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।
भारत के लिए अल नीनो को अक्सर कमजोर मानसून से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, हर अल नीनो वर्ष में भारत में बारिश का पैटर्न एक जैसा नहीं रहता। मानसून पर कई दूसरे समुद्री और वायुमंडलीय कारकों का भी प्रभाव होता है।
इसलिए अल नीनो के मजबूत होने की खबर को सीधे पूरे देश में सूखे की स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन अगर इसके साथ मानसूनी गतिविधियों में कमी और लंबे समय तक शुष्क मौसम जुड़ जाता है तो कृषि क्षेत्र के लिए जोखिम जरूर बढ़ सकता है।
किसानों और बाजार के लिए क्यों अहम है मानसून?
भारत में खरीफ सीजन की फसलें मुख्य रूप से जून से अक्टूबर के बीच उगाई जाती हैं। इनमें चावल, सोयाबीन, कपास, मक्का, दालें और कई अन्य फसलें शामिल हैं। इन फसलों का उत्पादन देश की खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
अगर बारिश कम होती है तो सबसे पहले मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है। इसके बाद सिंचाई की मांग बढ़ सकती है और कुछ क्षेत्रों में फसल की उत्पादकता पर असर पड़ सकता है। उत्पादन में बड़ी कमी आने की स्थिति में कुछ कृषि जिंसों की कीमतों पर भी दबाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मानसून की कमजोरी से पूरे देश में फसल उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा। इसके लिए आने वाले दिनों में बारिश के वास्तविक आंकड़े, क्षेत्रवार स्थिति और फसलों की ग्राउंड रिपोर्ट महत्वपूर्ण होंगी।
अगले दो सप्ताह बेहद अहम
फिलहाल किसानों, कृषि बाजार और सरकार की नजर अगले दो सप्ताह की मानसूनी गतिविधियों पर रहेगी। यदि पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत में बारिश सामान्य से कम रहती है तो नई बोई गई खरीफ फसलों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
वहीं, यदि मानसून दोबारा सक्रिय होता है और पर्याप्त बारिश होती है तो मिट्टी में नमी की स्थिति सुधर सकती है और मौजूदा चिंता कुछ कम हो सकती है।
कुल मिलाकर, मजबूत होते अल नीनो के बीच मानसून की संभावित सुस्ती ने कृषि क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है। सोयाबीन, कपास, मक्का और दलहन जैसी फसलों के लिए आने वाले दो सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। किसानों और कृषि बाजार के लिए अब बारिश की मात्रा के साथ-साथ उसके क्षेत्रवार वितरण पर भी नजर रखना जरूरी होगा।


