UPI Payment Charges: करीब छह साल बाद यूपीआई पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की वापसी का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ₹2,000 या उससे अधिक के कुछ UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.3% तक MDR लगाया जा सकता है। हालांकि आम ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर इसका सीधा बोझ न पड़े, इस बात पर सरकार का जोर है। आखिर MDR की जरूरत क्यों महसूस हुई और इससे मिलने वाला पैसा किन-किन संस्थाओं में बंटेगा? आइए समझते हैं।
करीब छह साल बाद UPI पर MDR की वापसी की तैयारी
भारत में UPI ने डिजिटल पेमेंट को बेहद आसान और तेज बना दिया है। दुकानों से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक, आज करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। अब करीब छह साल बाद इस सिस्टम में MDR यानी Merchant Discount Rate की वापसी की चर्चा तेज हो गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ₹2,000 या उससे अधिक के मर्चेंट UPI पेमेंट पर करीब 0.3% MDR लागू किया जा सकता है। हालांकि यह शुल्क सीधे ग्राहक से वसूले जाने के बजाय पेमेंट इकोसिस्टम में शामिल संस्थाओं के बीच निर्धारित तरीके से बांटा जा सकता है।
सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना उद्देश्य नहीं है। प्रस्तावित व्यवस्था का मकसद UPI के विशाल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने और सुरक्षित रखने में होने वाली लागत का कुछ हिस्सा पूरा करना है।
पहले UPI पर MDR क्यों लगता था?
UPI के शुरुआती दौर में मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर MDR की व्यवस्था मौजूद थी। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए बाद में सरकार ने UPI पर MDR को शून्य कर दिया।
2019 के आसपास जीरो-MDR व्यवस्था लागू होने के बाद व्यापारियों के लिए UPI स्वीकार करना और भी आसान हो गया। इसके बाद UPI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और यह भारत के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट माध्यमों में शामिल हो गया।
हालांकि जीरो MDR का दूसरा पहलू यह रहा कि UPI ट्रांजैक्शन से जुड़े बैंक, पेमेंट कंपनियां और अन्य संस्थाएं अपने सिस्टम को चलाने की लागत के लिए सीधे MDR आय पर निर्भर नहीं रह सकीं। इस कमी की भरपाई के लिए सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जाती रही।
UPI पर MDR लगाने की जरूरत क्यों पड़ी?
UPI का नेटवर्क जितना बड़ा हुआ है, उसे संचालित करने की लागत भी उतनी ही बढ़ी है। पेमेंट सिस्टम को 24 घंटे चालू रखने के साथ-साथ साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड मॉनिटरिंग, सर्वर, टेक्नोलॉजी और ट्रांजैक्शन प्रोसेसिंग पर लगातार खर्च होता है।
12 अगस्त को भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी इस मुद्दे पर चिंता जताई गई। रिपोर्ट के मुताबिक जीरो-MDR के कारण डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री को होने वाले रेवेन्यू नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने करीब ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया है, जबकि डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री की अनुमानित सालाना लागत करीब ₹20,700 करोड़ बताई गई है।
यानी सरकारी सहायता और वास्तविक लागत के बीच बड़ा अंतर है। समिति ने चिंता जताई कि पर्याप्त फंडिंग नहीं होने पर साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकने और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश प्रभावित हो सकता है।
AI के दौर में साइबर सिक्योरिटी का खर्च भी बढ़ा
डिजिटल पेमेंट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर फ्रॉड का खतरा भी बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के इस्तेमाल से साइबर अपराधों के तरीके लगातार बदल रहे हैं।
ऐसे में UPI नेटवर्क को सुरक्षित रखने, फ्रॉड का पता लगाने और पेमेंट सिस्टम की क्षमता बढ़ाने के लिए लगातार निवेश जरूरी है। यही वजह है कि UPI को लंबे समय तक पूरी तरह जीरो-चार्ज मॉडल पर चलाने की आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
RBI की ओर से भी यह संकेत दिया जा चुका है कि इतने बड़े डिजिटल पेमेंट सिस्टम की लागत किसी न किसी माध्यम से पूरी करनी होगी।
MDR का पैसा किन लोगों में बंटेगा?
MDR से मिलने वाला पैसा किसी एक संस्था को नहीं मिलेगा। UPI पेमेंट की पूरी प्रक्रिया में शामिल अलग-अलग संस्थाओं को इसमें हिस्सा मिल सकता है।
प्रस्तावित मॉडल में पेमेंट चेन से जुड़े प्रमुख हिस्सेदारों में शामिल हैं:
- ग्राहक का बैंक यानी Issuer Bank: ग्राहक के खाते से भुगतान की प्रक्रिया संभालने वाले बैंक को हिस्सा मिल सकता है।
- Payment Service Provider: जिस पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर के जरिए ट्रांजैक्शन प्रोसेस होता है, उसे भी निर्धारित हिस्सा मिल सकता है।
- Acquirer Bank और Merchant-side PSP: दुकानदार की तरफ से पेमेंट स्वीकार करने वाले बैंक और उससे जुड़े पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को हिस्सा मिलेगा।
- NPCI: UPI नेटवर्क को संचालित करने और ट्रांजैक्शन के निपटारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली NPCI को भी हिस्सा मिल सकता है।
इस व्यवस्था में इंटरचेंज शुल्क का बड़ा हिस्सा इश्यूइंग बैंक यानी ग्राहक के बैंक की ओर जाने की संभावना बताई जा रही है, जबकि NPCI का हिस्सा अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
क्या हर UPI पेमेंट पर लगेगा चार्ज?
नहीं। प्रस्तावित व्यवस्था का फोकस मुख्य रूप से अधिक वैल्यू वाले मर्चेंट पेमेंट पर है। ₹2,000 से कम के भुगतान को इसके दायरे से बाहर रखने की बात सामने आई है।
इसका मतलब यह है कि रोजमर्रा में किए जाने वाले छोटे UPI भुगतान—जैसे चाय, किराना, छोटी खरीदारी या कम कीमत के दूसरे सामान—पर प्रस्तावित MDR का असर सीमित रहेगा।
इसके अलावा P2P यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले ट्रांजैक्शन और P2M यानी व्यक्ति से दुकानदार को किए जाने वाले भुगतान में भी अंतर है। MDR का प्रस्ताव मुख्य रूप से मर्चेंट ट्रांजैक्शन से जुड़ा है।
कितने UPI ट्रांजैक्शन इससे प्रभावित हो सकते हैं?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत में करीब ₹314 लाख करोड़ मूल्य के 24,000 करोड़ से अधिक UPI ट्रांजैक्शन हुए।
इनमें करीब 71% ट्रांजैक्शन P2P यानी व्यक्ति-से-व्यक्ति थे, जबकि बाकी P2M यानी मर्चेंट पेमेंट थे।
खास बात यह है कि P2M ट्रांजैक्शन में भी ₹2,000 या उससे अधिक मूल्य वाले भुगतान की हिस्सेदारी वैल्यू के हिसाब से करीब 4% बताई गई है। ऐसे में प्रस्तावित सीमा लागू होने पर UPI के अधिकांश छोटे ट्रांजैक्शन MDR से बाहर रहेंगे।
छोटे दुकानदारों पर क्या होगा असर?
सरकार का रुख है कि छोटे कारोबारियों को अतिरिक्त बोझ से बचाया जाना चाहिए। यही कारण है कि कम मूल्य वाले ट्रांजैक्शन को MDR के दायरे से बाहर रखने का विकल्प महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि इलेक्ट्रॉनिक्स, महंगे कपड़े, ज्वेलरी, बड़ी किराना खरीदारी या अन्य हाई-वैल्यू खरीदारी जैसे क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के डिजिटल भुगतान अधिक होते हैं। ऐसे मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर प्रस्तावित शुल्क का असर पड़ सकता है।
सरकार के सामने सिर्फ MDR ही एक विकल्प नहीं
UPI के खर्च की भरपाई के लिए MDR अकेला विकल्प नहीं है। वित्तीय सेवा विभाग ने संसदीय समिति को बताया है कि इस लागत को कम करने के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।
इनमें अधिक मूल्य वाले UPI पेमेंट पर MDR दोबारा लागू करना और आने वाले वर्षों में सरकारी सहायता को धीरे-धीरे कम करना शामिल है।
यानी भविष्य में UPI के फंडिंग मॉडल में बदलाव संभव है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट नेटवर्क में शामिल UPI को सुरक्षित और मजबूत बनाए रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध रहें।
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?
अगर प्रस्तावित MDR व्यवस्था लागू होती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर UPI पेमेंट करने वाले ग्राहक को अलग से चार्ज देना होगा। मौजूदा प्रस्ताव में आम ग्राहकों पर सीधे शुल्क डालने के बजाय मर्चेंट ट्रांजैक्शन और पेमेंट इकोसिस्टम के स्तर पर लागत बांटने की बात है।
हालांकि बड़े मर्चेंट भविष्य में इस लागत को अपनी कीमतों या अन्य शुल्कों में शामिल करते हैं या नहीं, यह अलग विषय होगा। इसलिए ग्राहकों के लिए वास्तविक असर नियम लागू होने और उसकी अंतिम संरचना स्पष्ट होने के बाद ही पता चलेगा।
निष्कर्ष
UPI पर MDR की संभावित वापसी का मुख्य कारण डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने की बढ़ती लागत और जीरो-MDR मॉडल की वित्तीय चुनौतियां हैं। साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड रोकथाम और पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार निवेश के लिए स्थायी फंडिंग की जरूरत है।
हालांकि प्रस्तावित मॉडल में ₹2,000 से कम के भुगतान और छोटे कारोबारियों को राहत देने की कोशिश की जा रही है। इसलिए अगर MDR वापस आता भी है, तो इसका असर UPI के हर ट्रांजैक्शन पर समान रूप से नहीं पड़ेगा।


