नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आयातित जेनेरिक दवाओं पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा ने वैश्विक फार्मा सेक्टर में हलचल पैदा कर दी है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को दवाओं की आपूर्ति करने वाली भारतीय फार्मा कंपनियों पर इसका प्रभाव फिलहाल बेहद सीमित रहेगा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रस्तावित टैरिफ 2028 से प्रभावी होंगे और कंपनियों के पास रणनीति बदलने के लिए पर्याप्त समय रहेगा।
भारत लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है और अमेरिकी बाजार में उसकी मजबूत पकड़ बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप की नई टैरिफ नीति पर निवेशकों और उद्योग जगत की नजरें टिकी हुई हैं।
भारतीय कंपनियों पर क्यों रहेगा सीमित असर?
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के एसवीपी एवं इंस्टीट्यूशनल रिसर्च (हेल्थकेयर) तुषार मनुधाने के अनुसार, अमेरिका में उपयोग होने वाली लगभग 90% जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन दवाएं आयात की जाती हैं। ऐसे में यदि टैरिफ लागू होता भी है तो इसका असर केवल भारत पर नहीं बल्कि अमेरिका को दवा निर्यात करने वाले सभी देशों पर समान रूप से पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी कम उत्पादन लागत है। भारत में दवाओं का निर्माण अमेरिका की तुलना में 40 से 60 प्रतिशत तक सस्ता पड़ता है। इसलिए भारी टैरिफ के बावजूद भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है।
अमेरिका में नया प्लांट लगाना आसान नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करना एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है।
इसके लिए:
- नया प्लांट तैयार होने में कम से कम 2 वर्ष लग सकते हैं।
- इसके बाद अमेरिकी नियामक एजेंसियों से निरीक्षण और मंजूरी में 12 से 15 महीने का अतिरिक्त समय लगेगा।
- इस कारण नए निर्माताओं के लिए बाजार में जल्दी प्रवेश करना आसान नहीं होगा।
यही वजह है कि भारतीय कंपनियों की मौजूदा आपूर्ति श्रृंखला निकट भविष्य में मजबूत बनी रह सकती है।
भारत को क्यों कहा जाता है ‘दुनिया की फार्मेसी’?
भारत दुनिया के कई देशों को कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराता है। इसी कारण उसे अक्सर “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है।
अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं में मात्रा के आधार पर लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय कंपनियों की है। इससे साफ है कि अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था काफी हद तक भारतीय दवा उद्योग पर निर्भर है।
अमेरिका को भारत का फार्मा निर्यात कितना है?
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार:
- वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब डॉलर मूल्य की दवाओं का निर्यात किया।
- भारत का कुल वैश्विक फार्मा निर्यात 25.8 अरब डॉलर रहा।
- यानी अमेरिका की हिस्सेदारी भारत के कुल फार्मा निर्यात में लगभग 38 प्रतिशत रही।
यह आंकड़ा दोनों देशों के बीच फार्मा व्यापार की अहमियत को दर्शाता है।
ट्रंप की नई टैरिफ योजना क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि:
- 1 अगस्त 2026 से आयातित जेनेरिक दवाओं को दो वर्षों तक टैरिफ से छूट मिलेगी।
- इसके बाद इन दवाओं पर पहले 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा।
- विदेशी कंपनियों को इस दौरान अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने का अवसर दिया जाएगा।
यदि कंपनियां अमेरिका में विनिर्माण नहीं करती हैं तो उन्हें भारी आयात शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।
भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए आगे की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय दवा कंपनियां पहले से ही अमेरिका में अपनी सहायक कंपनियों और मजबूत सप्लाई नेटवर्क के जरिए कारोबार कर रही हैं। इसके अलावा ट्रांसफर प्राइस और अंतिम बिक्री मूल्य के बीच अंतर भी टैरिफ के वास्तविक प्रभाव को कम कर सकता है।
यदि भविष्य में अमेरिका में स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस होती है, तो भारतीय कंपनियां चरणबद्ध तरीके से निवेश कर सकती हैं। इसलिए निकट अवधि में कारोबार पर बड़ा नकारात्मक असर पड़ने की संभावना नहीं दिख रही है।
निष्कर्ष
ट्रंप की नई टैरिफ नीति पहली नजर में भारतीय फार्मा उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण लग सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी समयसीमा, भारत की कम लागत पर उत्पादन क्षमता और अमेरिकी बाजार की आयात पर निर्भरता को देखते हुए भारतीय कंपनियों पर इसका असर सीमित रहने की संभावना है। आने वाले वर्षों में कंपनियों की निवेश रणनीति और अमेरिका की अंतिम नीति इस पूरे परिदृश्य को तय करेगी।


