Supreme Court of India ने सबरीमाला मंदिर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से एक बुनियादी सवाल पूछा—क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो भगवान अयप्पा का भक्त नहीं है, मंदिर की परंपराओं को अदालत में चुनौती दे सकता है?
यह सवाल सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और न्यायिक दखल की सीमाओं को लेकर एक बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
केरल के Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया था।
लेकिन इसके बाद इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग उठी, और 2019 में इस मुद्दे को एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेज दिया गया। अब 9 जजों की बेंच इस बात पर विचार कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है और कौन इसे चुनौती दे सकता है।
कोर्ट का बड़ा सवाल: “याचिकाकर्ता कौन है?”
सुनवाई के दौरान जस्टिस BV Nagarathna ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि मूल याचिकाकर्ता कौन हैं। जब यह सामने आया कि याचिका Indian Young Lawyers Association द्वारा दायर की गई थी, तो कोर्ट ने सवाल उठाया:
- क्या ये लोग भगवान अयप्पा के भक्त हैं?
- अगर नहीं, तो क्या इन्हें इस परंपरा को चुनौती देने का अधिकार है?
- क्या किसी भी बाहरी व्यक्ति को धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति दी जा सकती है?
यह सवाल सीधे तौर पर PIL (जनहित याचिका) की सीमा और उसकी वैधता से जुड़ा हुआ है।
PIL पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
Surya Kant की अगुवाई वाली बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि आज के समय में कोर्ट PIL को लेकर पहले से ज्यादा सतर्क है।
कोर्ट ने कहा:
- हर PIL को स्वीकार नहीं किया जाता
- केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी होता है, जहां ठोस आधार होता है
- “मोटिवेटेड PIL” (निजी एजेंडे वाली याचिकाएं) एक गंभीर समस्या बनती जा रही हैं
सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने भी कहा कि आज के समय में आम लोगों के पास कोर्ट तक पहुंचने के पर्याप्त साधन हैं, इसलिए “तीसरे पक्ष” द्वारा दायर PIL की जरूरत कम हो गई है।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता का अधिकार
यह मामला केवल एक मंदिर या एक परंपरा का नहीं है, बल्कि दो बड़े संवैधानिक अधिकारों के टकराव का है:
- धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25)
- समानता का अधिकार (Article 14)
एक ओर, धार्मिक समुदाय अपनी परंपराओं को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर, समानता और गैर-भेदभाव की मांग उठती है।
सुप्रीम कोर्ट अब यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
9 जजों की बेंच: क्यों अहम है यह सुनवाई?
इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ कर रही है, जो बेहद दुर्लभ होता है। आमतौर पर इतने बड़े बेंच केवल अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में ही बैठते हैं।
इस बेंच ने 7 बड़े सवाल तय किए हैं, जिनमें प्रमुख है:
- क्या कोई गैर-भक्त धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?
- क्या धार्मिक समूहों को अपनी परंपराओं पर पूर्ण अधिकार है?
- कोर्ट की दखल की सीमा क्या होनी चाहिए?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में कई धार्मिक मामलों की दिशा तय कर सकते हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सुनवाई जारी है और कोर्ट विभिन्न पक्षों की दलीलें सुन रहा है। अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है, लेकिन इसके असर दूरगामी होंगे।
संभावना है कि:
- PIL की परिभाषा और दायरा और स्पष्ट होगा
- धार्मिक मामलों में कोर्ट की भूमिका तय होगी
- भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक नया कानूनी फ्रेमवर्क बन सकता है
निष्कर्ष
Supreme Court of India की यह टिप्पणी एक बड़े संवैधानिक बहस की शुरुआत है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सबरीमाला में कौन प्रवेश कर सकता है, बल्कि यह है कि किसे धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने का अधिकार है।
आने वाला फैसला यह तय करेगा कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाएगा।
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