नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कंपनी के खिलाफ कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू होने से पहले EPFO ने ब्याज और जुर्माने की राशि का अंतिम निर्धारण नहीं किया था, तो कंपनी का नया मालिक (Resolution Applicant) उस अतिरिक्त रकम का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं होगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कर्मचारियों के PF का मूल बकाया (Principal Amount) पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और उसका भुगतान हर हाल में किया जाएगा। यह फैसला दिवालिया कंपनियों के कर्मचारियों, निवेशकों और नए खरीदारों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
PF के मूल पैसे को मिली पूरी सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई ने अपने फैसले में कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि का मूल बकाया किसी भी स्थिति में सुरक्षित रहेगा। इसे रिजॉल्यूशन प्लान के तहत चुकाना अनिवार्य होगा।
हालांकि, EPF Act की धारा 7Q के तहत ब्याज और धारा 14B के तहत जुर्माना तभी वसूला जा सकेगा, जब उनका अंतिम निर्धारण CIRP शुरू होने से पहले हो चुका हो। यदि यह प्रक्रिया बाद में शुरू होती है, तो ऐसी देनदारी को रिजॉल्यूशन प्लान से बाहर रखा जा सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसी कंपनी से जुड़ा था जिसके खिलाफ 1 मई 2023 को दिवालिया प्रक्रिया (CIRP) शुरू हुई।
EPFO ने कंपनी के खिलाफ कुल 22,49,956 रुपये का दावा किया, जिसमें शामिल थे:
- मूल PF बकाया (Section 7A): 73,120 रुपये
- ब्याज (Section 7Q): लगभग 9.32 लाख रुपये
- हर्जाना/पेनल्टी (Section 14B): लगभग 12.44 लाख रुपये
कर्जदाताओं की समिति (Committee of Creditors – CoC) द्वारा मंजूर रिजॉल्यूशन प्लान में केवल 73,120 रुपये के मूल PF बकाया का भुगतान स्वीकार किया गया। ब्याज और पेनल्टी को शामिल नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज किया ब्याज और जुर्माना?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि EPFO ने ब्याज और हर्जाने से संबंधित कार्रवाई 10 मई 2023 को शुरू की थी, जबकि कंपनी के खिलाफ CIRP 1 मई 2023 से लागू हो चुका था।
यानी जब दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई, तब तक ब्याज और जुर्माने की देनदारी का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ था। इसलिए अदालत ने माना कि यह केवल संभावित (Contingent) देनदारी थी, जिसे नए मालिक पर थोपना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
अदालत ने कहा कि किसी भी कंपनी को खरीदने वाले नए निवेशक को पहले से यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे कुल कितनी देनदारी का भुगतान करना होगा।
यदि रिजॉल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद पुराने मामलों में नई-नई देनदारियां जोड़ दी जाएं, तो कोई भी निवेशक दिवालिया कंपनी खरीदने में रुचि नहीं दिखाएगा। इससे IBC का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा।
कोर्ट ने कहा कि:
- PF का मूल बकाया हमेशा सुरक्षित रहेगा।
- CIRP शुरू होने से पहले तय न हुआ ब्याज और जुर्माना संभावित देनदारी माना जाएगा।
- CoC चाहे तो ऐसी संभावित देनदारी के लिए राशि सुरक्षित रख सकती है, लेकिन ऐसा करना अनिवार्य नहीं है।
IBC के उद्देश्य पर भी कोर्ट ने दी अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) का उद्देश्य समयबद्ध तरीके से कंपनियों का पुनर्जीवन (Resolution) सुनिश्चित करना है।
यदि रिजॉल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद नई वित्तीय देनदारियां जोड़ी जाएंगी, तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित होगी और निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ेगा। इसलिए CIRP शुरू होने के बाद शुरू हुई पेनल्टी की कार्यवाही का असर नए रिजॉल्यूशन प्लान पर नहीं पड़ेगा।
कर्मचारियों पर इस फैसले का क्या असर होगा?
इस फैसले से कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है क्योंकि उनका PF का मूल पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। यदि कोई कंपनी दिवालिया हो जाती है, तब भी कर्मचारियों के भविष्य निधि की मूल राशि पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
हालांकि, यदि कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले EPFO ने ब्याज या जुर्माने का अंतिम आदेश जारी नहीं किया था, तो उस अतिरिक्त राशि की वसूली नए मालिक से नहीं की जा सकेगी।
आसान भाषा में समझें फैसला
मान लीजिए किसी कर्मचारी का PF बकाया 1 लाख रुपये है और उस पर ब्याज व पेनल्टी मिलाकर कुल दावा 1.50 लाख रुपये बनता है।
- यदि ब्याज और पेनल्टी का आदेश CIRP शुरू होने से पहले जारी हो चुका था, तो पूरा दावा लागू हो सकता है।
- लेकिन यदि उनका निर्धारण CIRP शुरू होने के बाद हुआ, तो नया मालिक केवल 1 लाख रुपये का मूल PF देने के लिए बाध्य होगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्मचारियों और निवेशकों के हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश माना जा रहा है। अदालत ने एक ओर कर्मचारियों के PF के मूल अधिकार को सुरक्षित रखा है, वहीं दूसरी ओर नए निवेशकों को अनिश्चित और बाद में तय होने वाली देनदारियों से राहत दी है। इससे भविष्य में दिवालिया कंपनियों के अधिग्रहण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यावहारिक बनने की उम्मीद है।


