नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को भारी उथल-पुथल देखने को मिली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर दिए गए एक बयान ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया। महज 40 मिनट के भीतर सेंसेक्स 1,000 अंकों से अधिक टूट गया, जबकि दिन के अंत तक बाजार में बिकवाली और तेज हो गई।
बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे केवल भू-राजनीतिक तनाव ही नहीं, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, निवेशकों की बढ़ती घबराहट, सेक्टरों में व्यापक बिकवाली और पहली तिमाही के नतीजों को लेकर चिंता जैसे कई कारण भी जिम्मेदार रहे। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर बाजार में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई और आगे निवेशकों को किन बातों पर नजर रखनी चाहिए।
40 मिनट में बदल गई बाजार की तस्वीर
दोपहर करीब 1:40 बजे सेंसेक्स 77,603.90 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इसके बाद अचानक बिकवाली का दबाव बढ़ा और अगले 40 मिनट में सेंसेक्स 1,076 अंक फिसलकर 76,527.81 तक पहुंच गया।
कारोबार समाप्त होने तक:
- सेंसेक्स 1,677.12 अंक (2.15%) गिरकर 76,503.60 पर बंद हुआ।
- निफ्टी 516.65 अंक (2.12%) टूटकर 23,882.05 पर बंद हुआ।
बाजार में चौतरफा बिकवाली देखने को मिली। लगभग 3,095 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए, जबकि करीब 1,000 शेयरों में ही तेजी रही।
ट्रंप के बयान से क्यों मचा हड़कंप?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ हुआ अंतरिम सीजफायर अब समाप्त हो चुका है और वह अब किसी नए समझौते के पक्ष में नहीं हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान के पास परमाणु हथियार हुए तो वह उनका इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा। हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्रतिनिधि ईरान से बातचीत जारी रखेंगे, लेकिन उन्हें किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद नहीं है।
इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में जोखिम लेने की क्षमता कम हुई और निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू कर दिया।
पश्चिम एशिया में तनाव क्यों बढ़ा?
तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिका ने ईरान पर दोबारा हवाई हमले किए और ईरान के तेल निर्यात से जुड़ी कुछ अहम छूट भी समाप्त कर दी।
इसके जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसने बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। साथ ही एक अमेरिकी MQ-9 Reaper ड्रोन मार गिराने का भी दावा किया गया।
इन घटनाओं ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।
बाजार में गिरावट की 7 बड़ी वजह
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 6% चढ़कर 76 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
2. FII निवेश को लेकर बढ़ी अनिश्चितता
विशेषज्ञों के अनुसार हाल के दिनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की खरीदारी से बाजार को मजबूती मिल रही थी, लेकिन बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों की धारणा को कमजोर कर दिया।
3. India VIX में बड़ा उछाल
बाजार में डर का संकेत देने वाला India VIX इंट्राडे कारोबार में 23% से ज्यादा उछलकर 14.33 तक पहुंच गया। VIX में तेजी आमतौर पर आने वाले दिनों में अधिक उतार-चढ़ाव का संकेत देती है।
4. लगभग सभी सेक्टरों में बिकवाली
फाइनेंशियल सर्विसेज, FMCG, ऑटो, हेल्थकेयर और अन्य प्रमुख सेक्टरों में भारी बिकवाली देखने को मिली, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया।
5. बड़े शेयरों में भारी गिरावट
मारुति सुजुकी के शेयर 3% से ज्यादा टूट गए। इसके अलावा IndiGo, Hindustan Unilever, UltraTech Cement और Bharat Electronics जैसे दिग्गज शेयर भी दबाव में रहे।
6. तकनीकी संकेत कमजोर
विश्लेषकों के अनुसार निफ्टी के लिए 24,120–24,140 का स्तर अहम सपोर्ट माना जा रहा था। इसके नीचे फिसलने से तकनीकी कमजोरी और बढ़ गई।
7. Q1 नतीजों को लेकर चिंता
पहली तिमाही के कॉर्पोरेट नतीजों में कमजोर कमाई की आशंका भी निवेशकों की चिंता बढ़ाने वाली बड़ी वजह बनी।
एक्सपर्ट्स की क्या राय है?
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कम कर दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई बढ़ने की आशंका फिर मजबूत हुई है। इसके अलावा भारत और अमेरिका दोनों देशों के बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी देखने को मिली, जिससे इक्विटी बाजार पर अतिरिक्त दबाव आया।
विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशक अब केवल कंपनियों के नतीजों पर ही नहीं, बल्कि मैनेजमेंट की भविष्य की रणनीति और ग्रोथ आउटलुक पर भी खास नजर रखेंगे।
अब इन 3 बड़े फैक्टर्स पर रहेगी बाजार की नजर
आने वाले दिनों में भारतीय शेयर बाजार की दिशा मुख्य रूप से इन तीन अहम फैक्टर्स से तय हो सकती है—
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व की जुलाई मौद्रिक नीति और ब्याज दरों पर उसका रुख।
- अमेरिका के रेसिप्रोकल टैरिफ ट्रूस की अवधि समाप्त होने के बाद वैश्विक व्यापार पर पड़ने वाला असर।
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है या कम होता है, क्योंकि इसका सीधा असर कच्चे तेल और निवेशकों की धारणा पर पड़ेगा।
निवेशकों के लिए क्या करें?
मौजूदा परिस्थितियों में विशेषज्ञ जल्दबाजी में निवेश निर्णय लेने से बचने की सलाह दे रहे हैं। जिन निवेशकों का नजरिया लंबी अवधि का है, उन्हें घबराकर गुणवत्ता वाले शेयरों से बाहर निकलने के बजाय कंपनियों के तिमाही नतीजों, वैश्विक घटनाक्रम और बाजार के अगले संकेतों का इंतजार करना चाहिए।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश संबंधी निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार या प्रमाणित निवेश विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।


