भारत की ऊर्जा नीति अब तेजी से “ग्रीन ट्रांजिशन” की ओर बढ़ रही है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए Small Hydro Power (SHP) Development Scheme को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य देश के पहाड़ी और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराना है।
इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में 1,500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही निर्माण चरण में करीब 51 लाख मानव-दिवसों का रोजगार सृजित होने की संभावना है, जो ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।
यह योजना केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय विकास और पर्यावरणीय संतुलन के एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है Small Hydro Power Development Scheme?
केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत इस योजना का कुल बजट 2,584.60 करोड़ रुपये रखा गया है। यह योजना वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू रहेगी।
इसका मुख्य उद्देश्य छोटे जलविद्युत परियोजनाओं (25 मेगावाट तक की क्षमता वाली) को बढ़ावा देना है। सरकार का मानना है कि भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में जल संसाधनों की अपार क्षमता मौजूद है, जिसे अब तक पूरी तरह उपयोग में नहीं लाया जा सका है।
योजना के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट अब नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के तहत आएंगे, जबकि बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत ही रहेंगे।
भारत की अपार जलविद्युत क्षमता, लेकिन बड़ा अंतर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में छोटे हाइड्रो पावर की कुल संभावित क्षमता 21,133.61 मेगावाट आंकी गई है, जो 7,133 चिन्हित स्थलों पर फैली हुई है।
लेकिन वर्तमान में केवल 5,171 मेगावाट क्षमता ही विकसित की जा सकी है, जो कुल संभावनाओं का सिर्फ 24.5% है। इसका मतलब है कि अभी भी लगभग 15,960 मेगावाट क्षमता अनछुई पड़ी है।
यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि यदि इस सेक्टर को सही दिशा में विकसित किया जाए, तो यह भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा कर सकता है।
वित्तीय सहायता और निवेश मॉडल
इस योजना में सरकार ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग वित्तीय सहायता मॉडल तैयार किया है।
उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों के लिए सरकार 3.6 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 30% (जो भी कम हो) सहायता देगी। इसके अलावा प्रति प्रोजेक्ट अधिकतम 30 करोड़ रुपये की सीमा तय की गई है।
वहीं अन्य क्षेत्रों के लिए 2.4 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट या परियोजना लागत का 20% सहायता दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 20 करोड़ रुपये प्रति परियोजना होगी।
सरकार का अनुमान है कि इस योजना से लगभग 15,000 करोड़ रुपये का निजी और सार्वजनिक निवेश आकर्षित होगा, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में नई गति आएगी।
किन राज्यों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में छोटे हाइड्रो पावर की क्षमता अलग-अलग है।
उत्तर भारत में सबसे अधिक 7,978 मेगावाट की क्षमता है, जो कुल संभावनाओं का लगभग 38% है। इसके बाद उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में 3,262 मेगावाट (15%) की क्षमता मौजूद है।
दक्षिण भारत में 5,490 मेगावाट, पश्चिमी क्षेत्र में 2,963 मेगावाट और पूर्वी भारत में 1,440 मेगावाट की क्षमता आंकी गई है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तर और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र इस योजना के केंद्र में रहेंगे, क्योंकि यहां प्राकृतिक जल संसाधन अधिक हैं और ऊर्जा पहुंच की समस्या भी ज्यादा गंभीर है।
ग्रामीण विकास और रोजगार पर बड़ा असर
इस योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू रोजगार सृजन है। निर्माण चरण में ही लगभग 51 लाख मानव-दिवसों का रोजगार उत्पन्न होने की उम्मीद है।
इसके अलावा, छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के संचालन और रखरखाव के दौरान भी स्थायी रोजगार अवसर पैदा होंगे। यह खासकर ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में युवाओं के लिए बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
सरकार का मानना है कि यह योजना छोटे उद्योगों, स्थानीय व्यवसायों और स्वरोजगार को भी बढ़ावा देगी।
ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन
छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद अनुकूल माना जाता है। इनका भूमि उपयोग कम होता है और ये लंबे समय तक स्थिर रूप से बिजली उत्पादन कर सकते हैं।
सरकारी बयान के अनुसार, ये परियोजनाएं न केवल कार्बन उत्सर्जन को कम करती हैं, बल्कि ट्रांसमिशन लॉस को भी घटाती हैं क्योंकि ये बिजली उत्पादन केंद्रों के पास ही स्थापित की जाती हैं।
इससे दूरदराज़ इलाकों में बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनती है।
आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय निर्माण को बढ़ावा
इस योजना के तहत सरकार “Make in India” और “Atmanirbhar Bharat” पर भी जोर दे रही है।
छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में स्वदेशी मशीनरी और तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलेगी और विदेशी निर्भरता कम होगी।
इसके अलावा सरकार ने 200 परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के लिए 30 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया है।
ऊर्जा क्षेत्र में संतुलित रणनीति की ओर कदम
भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में केवल सोलर और विंड पावर पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि ये दोनों ही मौसम आधारित स्रोत हैं।
छोटा हाइड्रो पावर एक स्थिर (firm) ऊर्जा स्रोत है, जो 24×7 बिजली आपूर्ति में मदद करता है। इसलिए इसे ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
निष्कर्ष: भारत की ऊर्जा यात्रा का नया अध्याय
Small Hydro Power Development Scheme भारत की ऊर्जा नीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।
यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाएगी, बल्कि ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और क्षेत्रीय संतुलन को भी मजबूत करेगी।
सरकार का यह कदम दर्शाता है कि भारत अब केवल ऊर्जा उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादक और निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
Also Read:


