पुलिस थानों में CCTV कैमरों की कमी और उनके सही तरीके से काम न करने के मुद्दे पर Supreme Court of India ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मामले में यूनियन होम सेक्रेटरी को मंगलवार को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस Vikram Nath और Sandeep Mehta की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।
कोर्ट ने कहा कि CCTV इंस्टॉलेशन योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार से उच्च स्तर पर सहयोग जरूरी है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पुलिस थानों में CCTV कैमरों के सही तरीके से काम न करने को लेकर स्वत: संज्ञान (suo motu) से शुरू हुआ।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पूछा कि:
- क्या सुरक्षा कारणों से चीनी कंपनी के कैमरे हटाए जा रहे हैं?
- क्या इन कैमरों से डेटा विदेश भेजा जा रहा था?
हालांकि केंद्र की ओर से कहा गया कि इस पर अभी कोई औपचारिक आदेश नहीं आया है।
केंद्र से नाराज दिखी अदालत
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा:
“हम आदेश दे रहे हैं और आप बैठक में अंडर सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी भेज रहे हैं?”
इसके बाद कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अब उच्च स्तर के अधिकारी को ही जवाब देना होगा।
CCTV पर पहले के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई महत्वपूर्ण निर्देश दे चुका है:
- 2018 में सभी पुलिस थानों में CCTV लगाने का आदेश
- 2020 में CBI, ED और NIA जैसे एजेंसियों के दफ्तरों में भी CCTV अनिवार्य
- हर एंट्री/एग्जिट, लॉकअप, कॉरिडोर और बाहर के क्षेत्रों में कैमरे लगाना जरूरी
- कैमरों में नाइट विजन और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग होना अनिवार्य
- कम से कम 1 साल तक डेटा स्टोरेज की व्यवस्था
राज्यों की स्थिति और आगे की योजना
कोर्ट को बताया गया कि कई राज्यों ने CCTV इंस्टॉलेशन शुरू कर दिया है और केंद्रीकृत डैशबोर्ड बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
केरल मॉडल की तारीफ करते हुए कोर्ट ने सुझाव दिया कि अन्य राज्य भी इसे अपनाएं।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख दिखाता है कि वह पुलिस थानों में पारदर्शिता और मानवाधिकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है।
अगर CCTV सिस्टम सही तरीके से लागू होता है, तो यह न केवल पुलिस की जवाबदेही बढ़ाएगा, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों की भी बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
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