अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 35 पैसे टूटकर 95.63 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आई है जब कच्चे तेल की कीमतें लगातार उछाल पर हैं और निवेशक जोखिम वाले बाजारों से दूरी बना रहे हैं।
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के मुताबिक पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और तेल-गैस सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इसका असर सीधे भारतीय मुद्रा और शेयर बाजार दोनों पर दिखाई दिया।
कैसे रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया?
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 95.57 प्रति डॉलर पर खुला। कारोबार के दौरान यह और कमजोर होकर 95.74 तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
कारोबार के अंत में रुपया 95.63 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। इससे पहले सोमवार को भी भारतीय मुद्रा 79 पैसे टूटकर 95.28 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुई थी। लगातार दो दिनों में रुपये में आई भारी गिरावट ने बाजार में चिंता और बढ़ा दी है।
रुपये पर दबाव क्यों बढ़ा?
विशेषज्ञों के मुताबिक रुपये की कमजोरी के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के शांति प्रस्ताव को ठुकराने के बाद वैश्विक बाजारों में डर और बढ़ गया।
निवेशकों को आशंका है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष और बढ़ सकता है, तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है और वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है। इसी वजह से निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ बढ़ रहे हैं और डॉलर मजबूत हो रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई मुश्किल
रुपये पर दबाव बढ़ने की दूसरी बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेजी है। वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड 3 फीसदी से ज्यादा उछलकर 107 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर आयात बिल, डॉलर की मांग और रुपये की कीमत पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल लंबे समय तक महंगा बना रहा, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है।
डॉलर क्यों हो रहा मजबूत?
दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती दिखाने वाला डॉलर इंडेक्स भी बढ़कर 98.28 पर पहुंच गया। वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक आमतौर पर डॉलर जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली संपत्तियों की तरफ जाते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। भारतीय रुपया भी इसी दबाव का सामना कर रहा है।
RBI से बाजार को क्या उम्मीद?
विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये को संभालने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। RBI पहले भी डॉलर बेचकर, तरलता प्रबंधन करके और विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके रुपये को स्थिर रखने की कोशिश करता रहा है।
मिराए एसेट शेयरखान के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी के मुताबिक अमेरिका-ईरान तनाव के बीच रुपये में कमजोरी का रुख फिलहाल जारी रह सकता है। उनके अनुसार डॉलर-रुपये की स्पॉट रेंज 95.30 से 96 के बीच रह सकती है।
शेयर बाजार में क्यों मची बिकवाली?
रुपये की कमजोरी और तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। मंगलवार को बीएसई सेंसेक्स 1,456 अंक टूटकर 74,559 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 436 अंक गिरकर 23,379 पर आ गया। बाजार में सबसे ज्यादा दबाव बैंकिंग, ऑटो, एविएशन और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों पर देखा गया।
विदेशी निवेशकों ने क्यों बढ़ाई बिकवाली?
शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने सोमवार को ₹8,437 करोड़ से ज्यादा के शेयर बेच डाले। जब रुपया कमजोर होता है, तेल महंगा होता है और वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक जोखिम कम करने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। इसी वजह से भारतीय बाजार में भी भारी बिकवाली देखने को मिली।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहता। अगर रुपया लगातार कमजोर होता है, तो पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, आयातित सामान की कीमत बढ़ सकती है, विदेश यात्रा महंगी हो सकती है और इलेक्ट्रॉनिक्स व गैजेट्स की लागत भी बढ़ सकती है।
इसके अलावा महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका भी रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो इसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी दिखाई देगा।
पीएम मोदी की अपील क्यों चर्चा में?
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने, गैर-जरूरी सोने की खरीद टालने और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अपील मौजूदा ऊर्जा और विदेशी मुद्रा दबाव को देखते हुए की गई थी।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक इन बातों पर निर्भर करेगी:
- अमेरिका-ईरान तनाव कितना बढ़ता है
- कच्चे तेल की कीमतें कहां तक जाती हैं
- RBI कितना हस्तक्षेप करता है
- विदेशी निवेशकों का रुख कैसा रहता है
अगर पश्चिम एशिया संकट और गहराता है, तो रुपया और दबाव में आ सकता है। वहीं हालात स्थिर होने पर बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।
Also Read:


