मुंबई की गलियों से शुरू हुआ एक सट्टेबाजी का कारोबार कभी पूरे भारत में फैला ऐसा नेटवर्क बन गया, जिसे लोग “मटका” के नाम से पहचानने लगे। इस नेटवर्क का सबसे बड़ा चेहरा थे रतन खत्री, जिन्हें भारत का “मटका किंग” कहा जाता था।
रतन खत्री ने 1960 और 70 के दशक में ऐसा अंडरग्राउंड सट्टा कारोबार खड़ा किया, जिसमें रोजाना लाखों रुपये का दांव लगता था। दिलचस्प बात यह रही कि अवैध जुए और सट्टेबाजी की दुनिया में भी उनकी पहचान “ईमानदारी” के लिए बनी। कहा जाता है कि लोग उनके नेटवर्क पर इसलिए भरोसा करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि रतन खत्री खेल में हेराफेरी नहीं करते थे।
कौन थे रतन खत्री?
रतन खत्री का जन्म कराची के एक सिंधी हिंदू परिवार में हुआ था। 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आकर बस गया। विभाजन के बाद लाखों शरणार्थियों की तरह उन्होंने भी संघर्ष से भरी जिंदगी शुरू की। शुरुआती दिनों में उन्होंने मुंबई के व्यापार और कपड़ा बाजार से जुड़े काम किए। इसी दौरान उनका सामना सट्टेबाजी की दुनिया से हुआ और धीरे-धीरे उन्होंने उसी को अपना मुख्य कारोबार बना लिया।
कैसे शुरू हुआ ‘मटका’?
1960 के दशक से पहले बॉम्बे में सट्टेबाजी मुख्य रूप से न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज और बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज के भावों पर आधारित होती थी। जब 1961 में न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज ने टेलीप्रिंटर के जरिए भाव भेजना बंद कर दिया, तब पुराने सट्टा सिस्टम में संकट पैदा हो गया। इसी के बाद “मटका” सिस्टम शुरू हुआ।
इस सिस्टम में कागज की पर्चियों पर नंबर लिखे जाते थे, उन्हें एक बड़े बर्तन यानी “मटके” में डाला जाता था और फिर उनमें से नंबर निकाले जाते थे। यहीं से “मटका” नाम पड़ा।
कैसे बने ‘मटका किंग’?
रतन खत्री ने शुरुआत में कल्याणजी भगत के साथ काम किया, जिन्हें “वर्ली मटका” शुरू करने वालों में गिना जाता है। लेकिन 1964 में रतन खत्री ने अपना अलग नेटवर्क शुरू किया, जिसे “रतन मटका” कहा गया।
धीरे-धीरे उनका नेटवर्क मुंबई, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों तक फैल गया। उनके नेटवर्क में हजारों बुकी और लाखों लोग जुड़े बताए जाते थे।
सट्टे के धंधे में ‘ईमानदारी’ की पहचान कैसे बनी?
रतन खत्री की सबसे अलग पहचान यह थी कि लोग उन्हें “ईमानदार मटका ऑपरेटर” मानते थे। उस दौर में कई लोग आरोप लगाते थे कि मटके से नंबर निकालने में हेराफेरी होती है। इसके बाद रतन खत्री ने पर्चियों की जगह ताश के पत्तों का इस्तेमाल शुरू किया ताकि लोगों का भरोसा बना रहे।
कहा जाता है कि खिलाड़ी उनके रिजल्ट पर भरोसा करते थे, बुकी उन्हें निष्पक्ष मानते थे और इसी वजह से उनका नेटवर्क सबसे लोकप्रिय बन गया। हालांकि यह पूरा कारोबार अवैध सट्टेबाजी से जुड़ा था।
कितना बड़ा था उनका नेटवर्क?
1970 और 80 के दशक में रतन खत्री का नेटवर्क देश का सबसे बड़ा सट्टा सिंडिकेट माना जाता था। रिपोर्ट्स के मुताबिक रोजाना 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का दांव लगता था। हजारों बुकी नेटवर्क से जुड़े थे और लाखों लोग नंबर पर पैसा लगाते थे। उस दौर में टेलीफोन और टेलीग्राम के जरिए देशभर में नंबर भेजे जाते थे।
इमरजेंसी में हुई गिरफ्तारी
1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ। उसी दौरान रतन खत्री को गिरफ्तार कर लिया गया। बताया जाता है कि उन्होंने करीब 19 महीने जेल में बिताए।
जेल से बाहर आने के बाद उनका नेटवर्क पहले जैसा मजबूत नहीं रह पाया। समय के साथ पुलिस कार्रवाई, बदलती परिस्थितियों और नए सट्टा नेटवर्क के उभरने से उनका प्रभाव कम होने लगा।
कब हुआ निधन?
9 मई 2020 को मुंबई में रतन खत्री का निधन हो गया। उनकी मौत के बाद भी “मटका किंग” का नाम भारत के सबसे चर्चित अंडरग्राउंड सट्टा कारोबारियों में लिया जाता है।
क्यों आज भी चर्चा में रहती है ‘मटका’ की कहानी?
मटका सिर्फ जुए की कहानी नहीं बल्कि मुंबई के पुराने अंडरवर्ल्ड, आर्थिक संघर्ष और उस दौर की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा माना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक 1960 से 1980 के दशक का मुंबई, कपड़ा मिल संस्कृति, बेरोजगारी और तेजी से पैसा कमाने की चाह ने मटका कारोबार को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। हालांकि भारत में ज्यादातर तरह की सट्टेबाजी और जुआ आज भी कानूनन प्रतिबंधित या नियंत्रित है।
फिल्मों और पॉप कल्चर में भी दिखा असर
मटका और मुंबई के सट्टा नेटवर्क का असर बॉलीवुड और पॉप कल्चर में भी दिखाई देता रहा है। कई फिल्मों, वेब सीरीज और किताबों में मटका नेटवर्क, बुकी सिस्टम और अंडरग्राउंड बेटिंग जैसे विषयों को दिखाया गया है। इसी वजह से रतन खत्री का नाम आज भी मुंबई के सबसे चर्चित “मटका किंग” के रूप में याद किया जाता है।
Also Read:


