Rice Price Hike: दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सिर्फ तेल, सोना और शेयर बाजार तक सीमित नहीं रह गया है। संकट के बीच कई देश अपनी फूड सप्लाई सुरक्षित करने पर जोर दे रहे हैं। इसका सीधा असर चावल जैसे जरूरी खाद्य पदार्थों की मांग और कीमतों पर दिखाई दे रहा है। भारत में भी बासमती और गैर-बासमती चावल के दाम में अच्छी-खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
नई दिल्ली: किसी भी बड़े वैश्विक संकट के दौरान सबसे पहले जरूरी चीजों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ती है। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। कई देश भविष्य की संभावित सप्लाई दिक्कतों से बचने के लिए खाने-पीने की जरूरी वस्तुओं का स्टॉक बढ़ा रहे हैं। चावल भी इसी सूची में शामिल है।
भारत दुनिया के प्रमुख चावल निर्यातकों में है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ने का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ रहा है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बासमती चावल की कीमतें पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब 15-20 फीसदी बढ़ी हैं। गैर-बासमती चावल की कीमतों में भी करीब 20-25 फीसदी की वृद्धि बताई गई है।
जानकारों के मुताबिक, कीमतों में तेजी के पीछे केवल विदेशी मांग ही जिम्मेदार नहीं है। दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में बारिश की स्थिति, घरेलू सरकारी खरीद और नई खरीफ फसल आने में लगने वाला समय भी बाजार पर दबाव बना रहा है।
दुनिया का फोकस अब फूड सिक्योरिटी पर
चावल एक्सपोर्ट और मार्केटिंग कंपनी राइसविला ग्रुप के सीईओ सूरज अग्रवाल के मुताबिक, दुनिया के कई देश अपनी खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। चावल बड़ी आबादी का मुख्य भोजन है, इसलिए इसकी खरीद को प्राथमिकता मिल रही है।
खाड़ी देशों की तरफ से भारतीय चावल की मांग भी मजबूत बनी हुई है। संकट के समय देश अपने पास पर्याप्त खाद्यान्न रखने की कोशिश करते हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में किसी भी तरह की रुकावट आने पर घरेलू जरूरतों को पूरा किया जा सके।
यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चावल की मांग बढ़ने का असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है।
बासमती चावल करीब 100 रुपये किलो तक पहुंचा
बासमती चावल की कीमत वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में करीब 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। पिछले साल इसी अवधि में इसकी कीमत लगभग 85 रुपये प्रति किलो बताई गई थी।
बासमती चावल की खपत खास तौर पर बिरयानी और दूसरे प्रीमियम खाद्य उत्पादों में अधिक होती है। इसकी कीमत बढ़ने से होटल, रेस्टोरेंट और घरेलू उपभोक्ताओं के खर्च पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि तेजी केवल बासमती तक सीमित नहीं है। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली गैर-बासमती किस्मों में भी कीमतें बढ़ी हैं।
सोना मसूरी चावल भी हुआ महंगा
दक्षिण भारत और देश के कई हिस्सों में इस्तेमाल होने वाली सोना मसूरी किस्म की कीमत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
पिछले साल सोना मसूरी चावल करीब 51-52 रुपये प्रति किलो में उपलब्ध था। अब इसकी कीमत बढ़कर लगभग 63-64 रुपये प्रति किलो हो गई है।
इसका मतलब है कि एक साल के भीतर इस किस्म के चावल की कीमत में करीब 11-13 रुपये प्रति किलो तक का अंतर आया है। बड़ी मात्रा में चावल खरीदने वाले परिवारों के मासिक बजट पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
नई फसल आने तक राहत मुश्किल
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ हफ्तों में चावल की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना कम है। इसकी सबसे बड़ी वजह नई खरीफ फसल का इंतजार है।
अक्टूबर-नवंबर के आसपास नई फसल बाजार में आने के बाद सप्लाई बढ़ सकती है। इसके बाद कीमतों पर दबाव कम होने की उम्मीद है। लेकिन अगर बारिश कमजोर रहती है या विदेशी मांग मजबूत बनी रहती है, तो कीमतों में गिरावट सीमित रह सकती है।
सूरज अग्रवाल के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की स्थिति अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसके अलावा खरीफ फसल आने में अभी समय है। ऐसे में निकट अवधि में बाजार में सप्लाई और मांग का संतुलन कीमतों के पक्ष में रहने की संभावना है।
सऊदी अरब भारतीय बासमती का बड़ा खरीदार
भारतीय बासमती चावल के लिए एक्सपोर्ट मार्केट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। KRBL लिमिटेड के बल्क राइस एक्सपोर्ट प्रमुख अक्षय गुप्ता के अनुसार, भारतीय बासमती की अंतरराष्ट्रीय मांग मजबूत बनी हुई है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 154 देशों को रिकॉर्ड 65.2 लाख टन चावल का निर्यात किया। इनमें सऊदी अरब एक प्रमुख खरीदार रहा है। पश्चिम एशिया के अन्य बाजारों से भी भारतीय चावल के लिए पूछताछ बनी हुई है।
हालांकि, खाड़ी क्षेत्र में पेमेंट और शिपिंग से जुड़ी कुछ परेशानियों के कारण कुछ शिपमेंट प्रभावित हुए हैं। जानकारों के अनुसार, इसका मतलब मांग में कमी नहीं है। बल्कि कुछ ऑर्डर और शिपमेंट आगे खिसकने से बाजार में मांग का बैकलॉग बन गया है।
घरेलू बाजार में सरकारी खरीद भी अहम फैक्टर
चावल की कीमतों को प्रभावित करने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारण सरकारी खरीद है। पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम यानी PDS के लिए सरकार द्वारा की जाने वाली खरीद से भी बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर असर पड़ता है।
राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट बी.वी. कृष्णा राव के अनुसार, तेलंगाना में PDS के जरिए गैर-बासमती चावल का वितरण किया जा रहा है। इससे घरेलू बाजार में मांग और स्टॉक की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। इन इलाकों में कम बारिश से उत्पादन और भविष्य की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
अक्टूबर तक क्यों बनी रह सकती है महंगाई?
चावल की कीमतों को समझने के लिए तीन प्रमुख फैक्टर पर नजर रखना जरूरी है।
पहला, घरेलू बाजार में उपलब्ध पुराना स्टॉक तेजी से कम हो रहा है।
दूसरा, पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों से भारतीय चावल की मांग मजबूत बनी हुई है।
तीसरा, नई खरीफ फसल की आवक में अभी कुछ सप्ताह का समय बाकी है।
ऐसे में जब तक बाजार में नई फसल की सप्लाई पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचती, तब तक कीमतों पर दबाव बने रहने की संभावना है।
उपभोक्ताओं को कब मिलेगी राहत?
चावल की कीमतों में स्थायी राहत के लिए केवल विदेशी मांग में कमी आना पर्याप्त नहीं होगा। घरेलू उत्पादन और सप्लाई की स्थिति भी सामान्य होना जरूरी है।
अगर अक्टूबर-नवंबर में नई फसल अच्छी रहती है, दक्षिण भारत में बारिश की स्थिति सुधरती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदारी की रफ्तार कम होती है, तो कीमतों में नरमी आ सकती है।
फिलहाल, हालांकि, बाजार में ऐसा कोई मजबूत संकेत नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि चावल जल्द ही पुराने भाव पर लौट आएगा। इसलिए आने वाले कुछ हफ्तों तक उपभोक्ताओं को महंगे चावल का सामना करना पड़ सकता है।
Source: Economic Times Digital की रिपोर्ट और बाजार विशेषज्ञों के बयानों पर आधारित।


