अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। अमेरिका की ओर से ईरान के केश्म द्वीप (Qeshm Island) पर हमले की खबर के बाद क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल आया है। इससे अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। खास बात यह है कि सोमवार को ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 7 फीसदी से ज्यादा की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। लेकिन अमेरिकी हमले की खबर ने बाजार का रुख फिर बदल दिया।
इस घटनाक्रम के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशकों को आशंका है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव और बढ़ता है तो मिडिल ईस्ट से कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में फिर आई तेजी
मंगलवार, 3 नवंबर को शुरुआती एशियाई कारोबार में ब्रेंट और अमेरिकी WTI क्रूड दोनों की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर 48 सेंट यानी करीब 0.5 फीसदी की बढ़त के साथ 105.25 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 47 सेंट यानी 0.5 फीसदी चढ़कर 96.93 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया।
इससे पहले सोमवार को कच्चे तेल के बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली थी। ब्रेंट क्रूड 8.66 डॉलर यानी 7.63 फीसदी टूटकर 104.77 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से तनाव कम होने की उम्मीदों के कारण निवेशकों ने तेल की कीमतों में गिरावट पर दांव लगाया था।
हालांकि, मंगलवार को केश्म द्वीप पर अमेरिकी हमले की खबर सामने आने के बाद बाजार में फिर से जोखिम का माहौल बन गया। इससे संकेत मिलता है कि कच्चे तेल की कीमतों में आगे भी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
केश्म द्वीप पर अमेरिकी हमले से क्यों बढ़ी चिंता?
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप पर हमला किया है। रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है। कुछ अधिकारियों ने इन हमलों को रक्षात्मक कार्रवाई बताया है।
उनका कहना था कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यावसायिक जहाजों पर हमले करने की क्षमता को सीमित करना था।
इस खबर ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। KCM Trade के चीफ मार्केट एनालिस्ट टिम वाटरर के मुताबिक, अमेरिकी हमले की खबर ने कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर जोखिम प्रीमियम जोड़ दिया है। बाजार जहां अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक समाधान की उम्मीद कर रहा था, वहीं सैन्य गतिविधियों की खबर से निवेशकों की धारणा बदल गई।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच पूरी दुनिया की नजर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टिकी हुई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया की करीब 20 फीसदी कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।
फरवरी के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद से इस समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। अगर यहां तनाव और बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही पर लंबे समय तक प्रतिबंध जैसी स्थिति बनती है तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता कम हो सकती है।
इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। तेल की सप्लाई में थोड़ी सी भी बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को तेजी से ऊपर ले जा सकती है।
क्या ट्रंप ने दिया धोखा? शांति वार्ता के बीच फिर बढ़ा तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव के बावजूद बातचीत की कोशिशें जारी हैं। ईरान ने सोमवार को कहा कि युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है। कतर के मध्यस्थों के साथ कई दिनों तक चर्चा हुई, लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
हालांकि, बातचीत के दौरान प्रस्तावों में बदलाव जरूर किया गया है। ऐसे में एक तरफ कूटनीतिक समाधान की उम्मीद बनी हुई है, तो दूसरी तरफ सैन्य कार्रवाई की खबरों ने अनिश्चितता बढ़ा दी है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से जारी कूटनीतिक प्रयासों और जमीनी स्तर पर हो रही सैन्य गतिविधियों के बीच अंतर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बातचीत पूरी तरह विफल हो गई है या संघर्ष और बढ़ने वाला है।
भारत में महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने से देश के तेल आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।
अगर ब्रेंट क्रूड की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा रुपये और डॉलर की विनिमय दर में बदलाव भी तेल आयात की लागत को प्रभावित करता है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। घरेलू ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। इनमें कच्चे तेल की औसत खरीद लागत, रुपये की स्थिति, रिफाइनिंग खर्च, टैक्स और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति शामिल हैं।
इसलिए फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की पुष्टि नहीं की जा सकती। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी आती है तो भारत में भी ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
आगे किस दिशा में जाएंगे कच्चे तेल के दाम?
आने वाले दिनों में कच्चे तेल की दिशा मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करेगी। पहली, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का क्या नतीजा निकलता है। दूसरी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस की सप्लाई कितनी सामान्य रहती है। तीसरी, मिडिल ईस्ट में सैन्य गतिविधियों का दायरा कितना बढ़ता है।
अगर दोनों देशों के बीच बातचीत से तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में फिर गिरावट देखने को मिल सकती है। इसके उलट, अगर हमले और जवाबी कार्रवाई जारी रहती है तथा तेल की सप्लाई प्रभावित होती है तो कीमतों में तेजी का दबाव बना रह सकता है।
भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और रुपये की विनिमय दर पर नजर बनाए रखना है। इसका असर न केवल पेट्रोल-डीजल बल्कि माल ढुलाई, परिवहन और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख अंतरराष्ट्रीय बाजार की उपलब्ध जानकारी और घटनाक्रम पर आधारित है। पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों में बदलाव को लेकर कोई निश्चित अनुमान नहीं लगाया गया है।


