Highlights
- 2030 तक भारत की 90% प्रस्तावित ग्रीन एनर्जी साइट्स पर जलवायु जोखिम
- 267 GW क्षमता वाले 871 प्रोजेक्ट्स का अध्ययन
- सोलर, विंड और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर अलग-अलग खतरे
- सिर्फ 2% अतिरिक्त निवेश से 75% तक जोखिम कम किया जा सकता है
नई दिल्ली: भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसी बीच एक नई रिपोर्ट ने बड़ी चिंता पैदा कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2030 तक देश के अधिकांश ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
ज्यूरिख ग्रुप (Zurich Group) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत की लगभग 90 प्रतिशत प्रस्तावित रिन्यूएबल एनर्जी साइट्स अगले कुछ वर्षों में उच्च या अत्यधिक जलवायु जोखिम का सामना करेंगी। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि अधिकांश प्रोजेक्ट अभी योजना या निर्माण के शुरुआती चरण में हैं। ऐसे में कम लागत पर इनके डिजाइन में बदलाव करके इन्हें भविष्य के जलवायु जोखिमों के लिए तैयार किया जा सकता है।
267 GW क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स पर मंडरा रहा खतरा
रिपोर्ट के तहत भारत के 10 राज्यों में फैले 871 प्रस्तावित रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का अध्ययन किया गया। इनकी कुल स्थापित क्षमता करीब 267 गीगावाट (GW) है।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:
- 90% साइट्स को वर्ष 2030 तक उच्च या अत्यधिक जलवायु जोखिम
- 66% परियोजनाएं अत्यधिक गंभीर जोखिम वाली श्रेणी में
- अधिकांश प्रोजेक्ट अभी शुरुआती चरण में हैं, इसलिए समय रहते सुधार संभव
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि अभी जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर प्रोजेक्ट्स तैयार किए जाएं तो भविष्य में भारी आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है।
सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए सबसे बड़ा खतरा ओलावृष्टि
भारत की ग्रीन एनर्जी पाइपलाइन में सबसे बड़ा हिस्सा सौर ऊर्जा परियोजनाओं का है।
- 593 सोलर प्रोजेक्ट्स
- 1,82,286 मेगावाट क्षमता
- कुल प्रस्तावित क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत
रिपोर्ट के मुताबिक सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए सबसे बड़ा खतरा ओलावृष्टि (Hailstorm) है। बड़े ओले सोलर पैनलों के शीशे तोड़ सकते हैं। कई मामलों में पैनल बाहर से सही दिखाई देते हैं लेकिन उनके अंदर सूक्ष्म दरारें बन जाती हैं, जिससे समय के साथ बिजली उत्पादन कम होने लगता है।
पवन ऊर्जा परियोजनाओं को चक्रवात और बाढ़ का खतरा
भारत में प्रस्तावित विंड एनर्जी परियोजनाओं की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है।
- 230 विंड प्रोजेक्ट्स
- 44,177 मेगावाट क्षमता
इन परियोजनाओं पर मुख्य खतरे हैं—
- तेज चक्रवाती हवाएं
- समुद्री तूफान
- बाढ़
- मानसून के बदलते पैटर्न
विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में चक्रवातों की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ सकती हैं, जिससे पवन टर्बाइनों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहेगा।
हाइड्रोपावर परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ा वित्तीय जोखिम
जल विद्युत परियोजनाओं की संख्या कम है लेकिन इन पर आर्थिक जोखिम सबसे ज्यादा बताया गया है।
- 48 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स
- 40,188 मेगावाट क्षमता
रिपोर्ट में कहा गया है कि अब केवल पुराने नदी प्रवाह (Hydrological Data) के आधार पर भविष्य की परियोजनाएं तैयार नहीं की जा सकतीं क्योंकि जलवायु परिवर्तन के चलते नदियों के प्रवाह और वर्षा के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं।
ऐसी स्थिति में परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है और बिजली उत्पादन अनुमान से कम हो सकता है।
कैसे सुरक्षित बनाए जा सकते हैं ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स?
रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं, जिनसे भविष्य के जोखिम काफी हद तक कम किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि—
- योजना के शुरुआती चरण में ही जलवायु जोखिमों की अनिवार्य जांच हो।
- सबसे संवेदनशील परियोजनाओं का नियमित स्ट्रेस टेस्ट किया जाए।
- उपकरण खरीदते समय जलवायु जोखिमों के अनुरूप आधुनिक तकनीक अपनाई जाए।
- बिजली ग्रिड और ऊर्जा परिसंपत्तियों के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाए।
- जलवायु-अनुकूल परियोजनाओं में वैश्विक निवेश आकर्षित करने के लिए स्पष्ट वित्तीय मॉडल तैयार किए जाएं।
सिर्फ 2% अतिरिक्त निवेश से बच सकता है भारी नुकसान
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि यदि किसी परियोजना की कुल लागत का केवल 2 प्रतिशत अतिरिक्त निवेश उसकी जलवायु सुरक्षा पर किया जाए तो भविष्य में होने वाले गंभीर नुकसान का जोखिम 75 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
इतना ही नहीं, यह निवेश भविष्य में होने वाले संभावित नुकसान की तुलना में करीब 38 गुना अधिक आर्थिक बचत दिला सकता है।
भारत के ऊर्जा लक्ष्य पर भी पड़ सकता है असर
भारत ने वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा है। ऐसे में यदि जलवायु जोखिमों को नजरअंदाज किया गया तो न केवल बिजली उत्पादन प्रभावित होगा बल्कि निवेशकों का भरोसा और देश के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य भी प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन एनर्जी का भविष्य केवल नई परियोजनाएं लगाने में नहीं बल्कि उन्हें बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत बनाने में भी है।


