नई दिल्ली: अनिल अंबानी समूह की कंपनी रिलायंस पावर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कंपनी के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) अशोक कुमार पाल को ₹68.2 करोड़ की कथित फर्जी बैंक गारंटी से जुड़े धन शोधन (Money Laundering) मामले में नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया है। यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के दायरे में है और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत इसकी जांच जारी है।
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब कॉर्पोरेट गवर्नेंस और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े मामलों पर नियामक एजेंसियां पहले से अधिक सख्त रुख अपना रही हैं। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और जांच एजेंसी द्वारा पेश सामग्री के आधार पर इस चरण में आरोपी को राहत देने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता है।
क्या है पूरा मामला?
मामला रिलायंस पावर की सहायक कंपनी रिलायंस एनयू बीईएसएस लिमिटेड (Reliance NU BESS Limited) द्वारा सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SECI) को दी गई ₹68.2 करोड़ की बैंक गारंटी से जुड़ा है। जांच के दौरान यह बैंक गारंटी कथित तौर पर फर्जी पाई गई थी।
इस मामले के सामने आने के बाद संबंधित लेन-देन और दस्तावेजों की जांच शुरू हुई। बाद में मामला धन शोधन के दायरे में आने पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच शुरू की। जांच एजेंसी का आरोप है कि कथित फर्जी बैंक गारंटी के माध्यम से वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया और उससे जुड़े लेन-देन की जांच की जा रही है।
ईडी ने अशोक कुमार पाल को 10 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया था। इसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में हैं और नियमित जमानत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रहे थे।
अदालत ने जमानत क्यों खारिज की?
न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान ईडी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक संचार, वित्तीय रिकॉर्ड और PMLA की धारा 50 के तहत दर्ज बयानों का अवलोकन किया।
अदालत ने कहा कि वर्तमान चरण में उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी अपराध में शामिल नहीं है। इसलिए धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 45 के तहत जमानत के लिए निर्धारित शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को जमानत देने के लिए यह संतुष्टि आवश्यक है कि उसके खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया टिकाऊ नहीं हैं। लेकिन जांच एजेंसी द्वारा पेश किए गए रिकॉर्ड और साक्ष्य इस स्तर पर आरोपी के पक्ष में ऐसा निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं देते।
पूर्व CFO की क्या दलील थी?
अशोक कुमार पाल की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि उन्हें कथित फर्जी बैंक गारंटी की जानकारी नहीं थी और उन्होंने केवल अपने आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन किया था। उनका कहना था कि वे किसी भी प्रकार की जालसाजी में शामिल नहीं थे।
इसके अलावा उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मूल अपराध से संबंधित प्राथमिकी दर्ज कराने में उनकी भूमिका रही थी और उन्हें कथित अपराध से कोई आर्थिक लाभ या अपराध की आय (Proceeds of Crime) प्राप्त नहीं हुई।
हालांकि अदालत ने कहा कि इन दलीलों पर अंतिम फैसला मुकदमे के दौरान साक्ष्यों और गवाहों की जांच के बाद ही किया जा सकता है। जमानत पर विचार करते समय केवल उपलब्ध रिकॉर्ड और जांच सामग्री को देखा जाता है।
PMLA की धारा 45 क्यों महत्वपूर्ण है?
धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 45 को देश के सबसे सख्त जमानत प्रावधानों में से एक माना जाता है। इसके तहत आरोपी को जमानत मिलने से पहले अदालत को दो महत्वपूर्ण शर्तों पर संतुष्ट होना पड़ता है।
पहली शर्त यह है कि अदालत को प्रथम दृष्टया यह लगे कि आरोपी अपराध का दोषी नहीं है। दूसरी शर्त यह है कि आरोपी जमानत मिलने के बाद किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं होगा।
इन्हें आम तौर पर “ट्विन कंडीशंस” या दोहरी शर्तें कहा जाता है। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में ये दोनों शर्तें पूरी नहीं होती दिख रही हैं, इसलिए जमानत नहीं दी जा सकती।
रिलायंस पावर पर क्या असर पड़ेगा?
फिलहाल यह मामला कंपनी के पूर्व CFO से संबंधित है और अदालत का आदेश किसी भी तरह से रिलायंस पावर के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। हालांकि ऐसे मामलों का असर कंपनी की कॉर्पोरेट छवि और निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सूचीबद्ध कंपनियों में वित्तीय अनुशासन और अनुपालन (Compliance) को लेकर निवेशक पहले से अधिक सतर्क हो गए हैं। ऐसे में किसी भी जांच या कानूनी विवाद पर बाजार की नजर बनी रहती है।
रिलायंस पावर हाल के वर्षों में अपने कर्ज घटाने, परियोजनाओं के पुनर्गठन और कारोबारी गतिविधियों को मजबूत करने के प्रयासों के कारण भी चर्चा में रही है। इसलिए इस मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निवेशकों और बाजार विशेषज्ञों की निगाह बनी रहेगी।
आगे क्या होगा?
अब मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ेगी, जहां जांच एजेंसी अपने साक्ष्य पेश करेगी और आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। अदालत अंतिम निर्णय मुकदमे के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर करेगी।
फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद अशोक कुमार पाल को नियमित जमानत नहीं मिली है और उन्हें राहत के लिए आगे उच्च न्यायिक मंच का रुख करना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा रिलायंस पावर के पूर्व CFO अशोक कुमार पाल की जमानत याचिका खारिज किया जाना इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को देखते हुए फिलहाल आरोपी को राहत देने का आधार नहीं बनता। अब इस मामले की दिशा आगामी ट्रायल और जांच में सामने आने वाले तथ्यों पर निर्भर करेगी।


