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चीनी निर्यात पर रोक से बढ़ेगा संकट? राजू शेट्टी बोले- गन्ना किसानों को होगा सीधा नुकसान

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 10:32 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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चीनी निर्यात पर रोक से गन्ना किसानों में नाराजगी, राजू शेट्टी ने सरकार को घेरा

Contents
सरकार के फैसले पर क्यों उठ रहे सवाल?गन्ना किसानों का बढ़ता बकाया बना बड़ी चिंताचीनी उद्योग पहले से दबाव मेंसरकार ने निर्यात पर रोक क्यों लगाई?किसानों पर क्या पड़ेगा असर?राजनीतिक मुद्दा बनने के आसारआगे क्या हो सकता है?

पुणे। केंद्र सरकार द्वारा चीनी निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने के फैसले ने देश के गन्ना किसानों और चीनी उद्योग में नई बहस छेड़ दी है। स्वाभिमानी शेतकरी संघटना के संस्थापक और किसान नेता राजू शेट्टी ने इस फैसले को “अविवेकपूर्ण” बताते हुए कहा है कि इसका सबसे बड़ा नुकसान सीधे गन्ना किसानों को उठाना पड़ेगा। उनका कहना है कि जब घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें पहले से दबाव में हैं और सरकार निर्यात की भी अनुमति नहीं दे रही, तो चीनी मिलों और किसानों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा।

केंद्र सरकार ने बुधवार को घोषणा की कि 30 सितंबर तक या अगले आदेश तक चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लागू रहेगा। सरकार का तर्क है कि घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और संभावित मूल्य वृद्धि को रोकने के लिए यह कदम जरूरी है। हालांकि किसान संगठनों और उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यह फैसला किसानों की आय और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक असर डालेगा।

सरकार के फैसले पर क्यों उठ रहे सवाल?

राजू शेट्टी ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले चार वर्षों में चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP) नहीं बढ़ाया गया है। ऐसे में चीनी मिलों की कमाई पहले से प्रभावित है। यदि वैश्विक बाजार में चीनी की कीमतें बेहतर हैं और भारत को निर्यात से फायदा मिल सकता है, तो निर्यात पर रोक लगाना उद्योग और किसानों दोनों के हितों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि जब सरकार घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी नहीं कर रही और निर्यात का रास्ता भी बंद कर रही है, तो चीनी उद्योग के पास आर्थिक रूप से टिके रहने के विकल्प बेहद सीमित हो जाते हैं। इसका असर अंततः किसानों के भुगतान पर पड़ता है, क्योंकि चीनी मिलें नकदी संकट का हवाला देकर भुगतान टालने लगती हैं।

गन्ना किसानों का बढ़ता बकाया बना बड़ी चिंता

राजू शेट्टी ने दावा किया कि देशभर में गन्ना किसानों का बकाया लगभग 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इनमें से करीब 3,000 करोड़ रुपये का भुगतान केवल महाराष्ट्र में लंबित है। उन्होंने कहा कि किसानों की पूरी खेती व्यवस्था समय पर मिलने वाले भुगतान पर निर्भर करती है। यदि मिलें समय पर पैसा नहीं देंगी, तो किसान अगली फसल की तैयारी तक नहीं कर पाएंगे।

उन्होंने गन्ना नियंत्रण आदेश, 1966 का हवाला देते हुए कहा कि नियमों के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के भीतर किसानों का भुगतान करना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता, तो मिलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। लेकिन उनका आरोप है कि इन नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा और कई डिफॉल्टर मिलों पर राजनीतिक संरक्षण होने के कारण कार्रवाई भी नहीं होती।

चीनी उद्योग पहले से दबाव में

भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में गन्ना और चीनी उद्योग की अहम भूमिका है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है। डीजल, बिजली, मजदूरी और उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी ने किसानों का खर्च काफी बढ़ा दिया है।

राजू शेट्टी ने कहा कि किसानों को एक तरफ उर्वरकों का कम इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है, जबकि दूसरी तरफ उन्हें उनकी फसल का भुगतान भी समय पर नहीं मिल रहा। इससे खेती की लागत और आय के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

सरकार ने निर्यात पर रोक क्यों लगाई?

केंद्र सरकार का कहना है कि इस साल कम उत्पादन और घरेलू मांग को देखते हुए चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। सरकार को आशंका है कि यदि निर्यात जारी रहा, तो घरेलू बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। खासकर त्योहारों के मौसम से पहले सरकार किसी भी तरह की खाद्य महंगाई से बचना चाहती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार महंगाई नियंत्रण और किसानों की आय के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन उद्योग से जुड़े लोग कहते हैं कि यदि निर्यात पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय सीमित कोटा प्रणाली लागू की जाती, तो किसानों और मिलों को कुछ राहत मिल सकती थी।

किसानों पर क्या पड़ेगा असर?

चीनी मिलों की कमाई का बड़ा हिस्सा निर्यात और उप-उत्पादों से आता है। यदि निर्यात रुकता है, तो मिलों की नकदी स्थिति कमजोर हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों के भुगतान पर पड़ेगा। कई किसान पहले से पुराने बकाये का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में नए सीजन में देरी से भुगतान होने की आशंका और बढ़ सकती है।

किसान संगठनों का कहना है कि गन्ना खेती पहले ही महंगी होती जा रही है। सिंचाई, मजदूरी और खाद की लागत लगातार बढ़ रही है। यदि समय पर भुगतान नहीं मिला, तो कई छोटे किसान कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं।

राजनीतिक मुद्दा बनने के आसार

महाराष्ट्र में गन्ना और चीनी उद्योग हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय रहा है। कई बड़ी चीनी मिलें राजनीतिक नेताओं या उनके करीबी समूहों से जुड़ी रही हैं। ऐसे में राजू शेट्टी जैसे किसान नेताओं के बयान आने वाले समय में इस मुद्दे को और गर्मा सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार जल्द कोई संतुलित समाधान नहीं निकालती, तो किसान संगठनों द्वारा आंदोलन तेज किया जा सकता है। खासकर महाराष्ट्र और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में इसका असर राजनीतिक स्तर पर भी देखने को मिल सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

अब उद्योग और किसान दोनों की नजर केंद्र सरकार पर टिकी है। यदि घरेलू चीनी कीमतों में स्थिरता बनी रहती है और उत्पादन अनुमान सुधरता है, तो सरकार भविष्य में निर्यात पर कुछ राहत दे सकती है। हालांकि फिलहाल उद्योग और किसान संगठनों में चिंता का माहौल बना हुआ है।

राजू शेट्टी ने साफ कहा है कि यदि किसानों के हितों की अनदेखी की गई, तो इसका विरोध और तेज होगा। उनका कहना है कि गन्ना किसान पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे हैं और ऐसे फैसले उनकी मुश्किलों को और बढ़ा सकते हैं।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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