Putin SCO Development Bank Proposal: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के बीच एक अलग SCO डेवलपमेंट बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस पहल का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग बढ़ाने के साथ-साथ पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम करना है। रूस के मुताबिक, ऐसा बैंक SCO देशों के बीच व्यापार और भुगतान व्यवस्था को और मजबूत कर सकता है।
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित SCO शिखर सम्मेलन 2026 में पुतिन ने इस प्रस्ताव को सामने रखा। उन्होंने कहा कि नए बैंक को ऐसे वित्तीय ढांचे के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो किसी एक देश या पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था के प्रभाव से स्वतंत्र तरीके से काम कर सके।
क्या है SCO डेवलपमेंट बैंक का आइडिया?
डेवलपमेंट बैंक सामान्य तौर पर लंबे समय के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं। इनका इस्तेमाल सड़क, रेलवे, ऊर्जा, बंदरगाह, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे बड़े विकास कार्यों के लिए किया जाता है।
अगर SCO डेवलपमेंट बैंक का प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो इसका इस्तेमाल सदस्य देशों के बीच सीमा पार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और व्यापार से जुड़ी परियोजनाओं को फाइनेंस करने के लिए किया जा सकता है।
इससे SCO के सदस्य देशों को ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए एक अतिरिक्त वित्तीय स्रोत मिल सकता है, जिन्हें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से फंडिंग हासिल करने में मुश्किल आती है।
रूस क्यों चाहता है ऐसा बैंक?
इस प्रस्ताव के पीछे रूस की सबसे बड़ी चिंता पश्चिमी प्रतिबंध और मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इसके चलते मॉस्को ने पिछले कुछ वर्षों में डॉलर, पश्चिमी बैंकिंग चैनलों और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश तेज की है।
पुतिन का ताजा प्रस्ताव इसी रणनीति का विस्तार माना जा रहा है। रूस चाहता है कि SCO के भीतर व्यापार करने वाले देशों के पास फाइनेंसिंग और पेमेंट का वैकल्पिक नेटवर्क मौजूद हो।
98 फीसदी से ज्यादा कारोबार स्थानीय मुद्राओं में
पुतिन के मुताबिक, रूस और SCO देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। उन्होंने बताया कि पिछले साल SCO देशों के साथ रूस का व्यापार 400 अरब डॉलर से अधिक रहा।
रूस के अनुसार, इस व्यापार में 98 फीसदी से ज्यादा भुगतान स्थानीय राष्ट्रीय मुद्राओं में किया जा रहा है।
अगर यह ट्रेंड आगे भी जारी रहता है तो रूस और उसके साझेदार देशों के लिए डॉलर में भुगतान की जरूरत धीरे-धीरे कम हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी डॉलर तुरंत वैश्विक व्यापार से बाहर हो जाएगा।
क्या SCO बैंक डॉलर को खत्म कर सकता है?
यह सवाल इस पूरे प्रस्ताव का सबसे अहम हिस्सा है।
एक अलग बैंक और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली SCO देशों को आपसी व्यापार में अधिक स्वतंत्रता दे सकती है। लेकिन इससे अमेरिकी डॉलर का वैश्विक दबदबा तुरंत खत्म होना मुश्किल है।
डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक वित्तीय बाजारों में प्रमुख भूमिका निभाता है। भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी अमेरिका और यूरोप के बाजारों तथा वैश्विक बैंकिंग सिस्टम से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
इसलिए SCO बैंक को डॉलर के सीधे विकल्प के बजाय एक अतिरिक्त वित्तीय व्यवस्था के तौर पर देखना ज्यादा व्यावहारिक होगा।
भारत के लिए क्या हो सकता है फायदा?
भारत के लिए ऐसा बैंक कई स्तरों पर उपयोगी साबित हो सकता है। अगर इसकी संरचना पारदर्शी और व्यावसायिक तरीके से की जाती है तो भारतीय कंपनियों को SCO देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए नए वित्तीय अवसर मिल सकते हैं।
इसके अलावा, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कुछ मामलों में डॉलर कन्वर्जन से जुड़ी लागत और मुद्रा जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि यह व्यवस्था किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन का हिस्सा न बने, बल्कि व्यापार और विकास के लिए एक अतिरिक्त मंच के रूप में काम करे।
चीन की भूमिका भी होगी बेहद अहम
SCO बैंक को सफल बनाने में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। चीन SCO की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसके पास बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का अनुभव है।
हालांकि, भारत और चीन के बीच रणनीतिक और आर्थिक मतभेद भी हैं। ऐसे में बैंक की संरचना, पूंजी में हिस्सेदारी, लोन वितरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।
यही कारण है कि प्रस्ताव सामने आने के बाद भी इसे वास्तविक संस्थान में बदलने के लिए लंबी बातचीत और सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति की जरूरत होगी।
अमेरिकी प्रतिबंधों से बचना कितना आसान होगा?
SCO बैंक के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों में से एक सेकेंडरी सैंक्शंस का जोखिम हो सकता है।
भारत और चीन के बैंक तथा बड़ी कंपनियां अमेरिकी और यूरोपीय वित्तीय बाजारों से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में यदि कोई वैकल्पिक वित्तीय संस्था पूरी तरह पश्चिमी व्यवस्था से अलग होकर रूस जैसे प्रतिबंधित देशों के साथ बड़े पैमाने पर कारोबार करती है, तो उससे जुड़े संस्थानों को अतिरिक्त जोखिम उठाना पड़ सकता है।
इसलिए केवल नया बैंक बना देना पर्याप्त नहीं होगा। उसके लिए ऐसी भुगतान व्यवस्था, नियामकीय ढांचा और जोखिम प्रबंधन प्रणाली भी विकसित करनी होगी, जो सदस्य देशों के लिए व्यावहारिक हो।
SCO का लगातार बढ़ रहा प्रभाव
शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने, जबकि ईरान 2023 में संगठन का पूर्ण सदस्य बना।
आज SCO का दायरा पहले की तुलना में काफी बड़ा हो चुका है। इसके सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं, ऊर्जा संसाधन, जनसंख्या और व्यापारिक क्षमता इसे एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच बनाती हैं।
पुतिन इसी बढ़ते प्रभाव को बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के आधार के रूप में देखते हैं।
भारत के लिए असली रणनीतिक परीक्षा
SCO बैंक का विचार भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आता है। भारत एक तरफ रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार और कनेक्टिविटी बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ भी उसके मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं।
इसलिए भारत के लिए सबसे व्यावहारिक रास्ता यही होगा कि वह किसी एक वित्तीय ब्लॉक का हिस्सा बनने के बजाय विकल्पों का विस्तार करे।
अगर SCO बैंक भविष्य में अस्तित्व में आता है तो भारत के लिए इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसमें शासन व्यवस्था कितनी संतुलित होती है, फंडिंग किस आधार पर मिलती है और क्या यह संस्था सभी सदस्य देशों के लिए समान रूप से काम करती है।
निष्कर्ष
पुतिन का SCO डेवलपमेंट बैंक प्रस्ताव वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलते शक्ति संतुलन की ओर इशारा करता है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच अपने लिए वैकल्पिक वित्तीय रास्ते तलाश रहा है और SCO जैसे बड़े बहुपक्षीय संगठन को इसके लिए महत्वपूर्ण मंच मानता है।
हालांकि, SCO बैंक बनना और उसके जरिए डॉलर की वैश्विक बादशाहत खत्म होना दो अलग बातें हैं। बैंक बनने की स्थिति में भी अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने के लिए लंबे समय तक व्यापक वित्तीय नेटवर्क, स्थिर भुगतान प्रणाली और सदस्य देशों के बीच मजबूत आर्थिक एकीकरण की जरूरत होगी।
भारत के लिए यह पहल फिलहाल डॉलर से दूरी बनाने से ज्यादा व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं के लिए एक अतिरिक्त वित्तीय विकल्प के रूप में महत्वपूर्ण हो सकती है।


