कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उत्तराखंड वाले बयान ने मानसून सत्र खत्म होने के बाद भी राजनीतिक बहस को हवा दे दी है। पार्टी अब इसे महज एक व्यक्तिगत विवाद के बजाय दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है।
मानसून सत्र खत्म हुए 15 दिन से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़ा उत्तराखंड विवाद अब धीरे-धीरे बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप लेता दिख रहा है। सत्र के आखिरी दिन खड़गे ने उत्तराखंड की बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया था कि हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद बीजेपी की राज्य इकाई की ओर से ‘शुद्धिकरण’ कार्यक्रम किया गया।
खड़गे ने इसे अपने दलित होने से जोड़ते हुए सवाल उठाया था। शुरुआत में कांग्रेस ने इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत सीमित प्रतिक्रिया दी। हालांकि, सोनिया गांधी के साथ खड़गे ने राज्यसभा के चेयरमैन से मुलाकात कर घटना को लेकर औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई।
अब पार्टी इस विवाद को ज्यादा व्यापक राजनीतिक संदर्भ में पेश करने की कोशिश करती नजर आ रही है। सवाल यही है कि आखिर कांग्रेस इस मुद्दे को इतना महत्व क्यों दे रही है?
खड़गे के मुद्दे से आगे बढ़ रही कांग्रेस
कांग्रेस की रणनीति को केवल पार्टी अध्यक्ष के समर्थन तक सीमित नहीं माना जा रहा है। पार्टी इस घटना को दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर व्यापक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के भीतर हुई चर्चा में यह बात भी सामने आई कि पार्टी के कई नेताओं ने खड़गे के आरोप को उस स्तर पर नहीं उठाया, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी। इसके बाद राहुल गांधी के सार्वजनिक रूप से मुद्दा उठाने के साथ कांग्रेस का रुख ज्यादा आक्रामक होता दिखाई दिया।
यानी पार्टी अब इस पूरे मामले को सिर्फ उत्तराखंड की राजनीति तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर दलित राजनीति से जोड़ना चाहती है।
‘संविधान खतरे में है’ के बाद ‘दलित खतरे में हैं’?
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘संविधान खतरे में है’ को अपने प्रमुख चुनावी संदेशों में शामिल किया था। पार्टी का मानना रहा है कि इस नैरेटिव ने बीजेपी के खिलाफ दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के एक हिस्से को लामबंद करने में भूमिका निभाई।
अब उत्तराखंड की घटना को इसी तरह के एक नए राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की कोशिश की जा सकती है।
‘दलित खतरे में हैं’ का संदेश सीधे तौर पर सामाजिक सम्मान, भेदभाव और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों से जुड़ता है। कांग्रेस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि देश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 16 फीसदी है।
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी का हिस्सा करीब 20 फीसदी है, जबकि पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 32 फीसदी बताई जाती है। ऐसे में इन राज्यों की चुनावी राजनीति में दलित मतदाताओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस की नजर यूपी और पंजाब पर
कांग्रेस की इस रणनीति के पीछे आने वाले विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2029 का लोकसभा चुनाव भी बड़ा लक्ष्य हो सकता है।
उत्तर प्रदेश देश की सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाला राज्य है। यहां दलित वोट चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। दूसरी तरफ पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है।
ऐसे में कांग्रेस अगर दलित मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने में सफल होती है, तो इसका असर इन दोनों राज्यों में पार्टी की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।
लेकिन कांग्रेस के सामने आसान राह नहीं
दलित वोटों को अपने पक्ष में लामबंद करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा। इस सामाजिक समूह के बीच पहले से ही कई राजनीतिक दल अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी (BSP) लंबे समय से दलित राजनीति का प्रमुख चेहरा रही है। वहीं चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी दलित युवाओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
इसलिए कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बीजेपी का मुकाबला करने की नहीं है। उसे दलित मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता और राजनीतिक प्रासंगिकता भी मजबूत करनी होगी।
बीजेपी का अपना जवाबी नैरेटिव
बीजेपी की ओर से दलित राजनीति को लेकर अलग राजनीतिक संदेश दिया जाता रहा है। पार्टी का जोर इस बात पर रहता है कि दलित समुदाय को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में देखने के बजाय सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ सीधे लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।
इसलिए आने वाले समय में कांग्रेस के ‘दलित सम्मान’ वाले नैरेटिव के जवाब में बीजेपी विकास, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा अपना पक्ष और मजबूती से सामने रख सकती है।
पंजाब से कांग्रेस को मिल चुका है सबक
कांग्रेस के लिए पंजाब का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। इसके बावजूद कांग्रेस सत्ता बरकरार रखने में सफल नहीं हो सकी।
इससे यह संकेत मिलता है कि केवल किसी दलित नेता को आगे करने या दलित मुद्दों को चुनावी अभियान का हिस्सा बनाने से वोटों का पूरा समर्थन हासिल होना जरूरी नहीं है।
मतदाताओं के लिए स्थानीय मुद्दे, सरकार का प्रदर्शन, संगठन की स्थिति, नेतृत्व और दूसरे सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
खड़गे क्यों बन रहे इस नैरेटिव का चेहरा?
इस पूरे राजनीतिक अभियान में खड़गे की भूमिका खास है। वह कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और दलित समुदाय से आते हैं। इसलिए पार्टी के लिए उनके साथ कथित भेदभाव के आरोप को व्यक्तिगत घटना से आगे बढ़ाकर सामाजिक सम्मान के मुद्दे के रूप में पेश करना राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
कांग्रेस के लिए चुनौती यह होगी कि वह इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखे। अगर पार्टी इसे व्यापक सामाजिक न्याय के एजेंडे से जोड़ती है, तो इसका असर लंबे समय तक रह सकता है।
2029 की तैयारी अभी से?
कांग्रेस की मौजूदा रणनीति को 2029 के लोकसभा चुनाव की लंबी तैयारी के हिस्से के तौर पर भी देखा जा सकता है। 2024 में संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दों के जरिए बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को फायदा मिला था। अब दलित सम्मान और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों को उसी व्यापक राजनीतिक फ्रेम में लाने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस इस मुद्दे को कितनी मजबूती से जमीन पर ले जा पाती है और क्या वह दलित मतदाताओं के बीच बीजेपी, BSP तथा अन्य दलों के मुकाबले अपनी अलग विश्वसनीयता बना पाती है।
यानी खड़गे का उत्तराखंड विवाद अब सिर्फ एक राज्य की राजनीतिक घटना नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रही है—जिसकी असली परीक्षा आने वाले विधानसभा चुनावों और अंततः 2029 के लोकसभा चुनाव में होगी।


