प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार देशवासियों से खाने में तेल की मात्रा कम करने की अपील कर रहे हैं। तेलंगाना में अपने हालिया संबोधन में उन्होंने लोगों से एक साल तक गैर-जरूरी सोना न खरीदने, ईंधन की खपत कम करने, विदेश यात्राएं सीमित करने और खाने में तेल कम इस्तेमाल करने की सलाह दी। पीएम मोदी ने कहा कि अगर देशवासी थोड़ी सावधानी बरतें तो इससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा और रुपये पर दबाव कम किया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति से भी जुड़ा बड़ा मुद्दा है।
भारत इतना तेल आयात क्यों करता है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातक देशों में शामिल है। देश में खाने के लिए मुख्य रूप से पाम तेल, सोयाबीन तेल, सूरजमुखी तेल और सरसों तेल का इस्तेमाल होता है।
इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पाम तेल भारत बड़े पैमाने पर इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। इसके अलावा अर्जेंटीना और ब्राजील से सोयाबीन तेल, जबकि रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी तेल मंगाया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 1.85 लाख करोड़ रुपये का खाद्य तेल आयात किया। यही वजह है कि खाद्य तेल आयात देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर बड़ा दबाव डालता है।
तेल कम खाने से रुपये को कैसे फायदा होगा?
जब भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है, तब भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। अगर देश में तेल की खपत कम होती है तो आयात घटेगा, डॉलर की मांग कम होगी और रुपये पर दबाव कम पड़ सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि रुपया कई वैश्विक कारणों से प्रभावित होता है, लेकिन खाद्य तेल आयात में कमी आने से स्थिति बेहतर हो सकती है। यानी अगर करोड़ों भारतीय रोजाना थोड़ा कम तेल इस्तेमाल करें तो इसका असर देश के आयात बिल पर दिखाई दे सकता है।
स्वास्थ्य के लिए भी क्यों जरूरी है तेल कम करना?
डॉक्टरों के मुताबिक जरूरत से ज्यादा तेल खाना कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है। ज्यादा तेल खाने से मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में लाइफस्टाइल बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे तली-भुनी चीजों का बढ़ता सेवन भी बड़ी वजह है।
भारतीय खान-पान में तेल की भूमिका
भारतीय भोजन में तली हुई चीजों का उपयोग काफी ज्यादा होता है। समोसा, कचौड़ी, पूड़ी, भटूरे, पकौड़े और कई स्ट्रीट फूड आइटम में बड़ी मात्रा में तेल इस्तेमाल होता है। यही कारण है कि भारत में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की खपत लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वाद के लिए अत्यधिक तेल जरूरी नहीं होता। सही मसाले, सही पकाने का तरीका और संतुलित सामग्री भी खाने को स्वादिष्ट बना सकती है।
क्या हैं तेल के बेहतर विकल्प?
डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ खाने में तेल पूरी तरह बंद करने की सलाह नहीं देते, बल्कि इसकी मात्रा नियंत्रित करने पर जोर देते हैं। इसके लिए कुछ आसान विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
तली हुई चीजों की बजाय उबला हुआ भोजन खाना बेहतर माना जाता है। एयर फ्रायर का इस्तेमाल भी अच्छा विकल्प हो सकता है। कम तेल में हल्का भूनकर खाना बनाना, दही-टमाटर या मूंगफली की ग्रेवी का उपयोग करना और स्टीम या ग्रिल्ड फूड को प्राथमिकता देना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक धीरे-धीरे आदत बदलने से स्वाद और सेहत दोनों को संतुलित रखा जा सकता है।
क्या सिर्फ लोगों की आदत बदलने से फर्क पड़ेगा?
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत जैसे बड़े देश में अगर हर परिवार रोजाना कुछ ग्राम तेल की बचत भी करे तो इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर काफी बड़ा हो सकता है।
कम तेल खपत का फायदा आयात बिल में कमी, विदेशी मुद्रा बचत, बेहतर स्वास्थ्य और मेडिकल खर्च में कमी के रूप में दिखाई दे सकता है।
पीएम मोदी की अपील के पीछे बड़ा संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी की यह अपील केवल आर्थिक संकट से जुड़ी नहीं है, बल्कि “जिम्मेदार उपभोग” का संदेश भी है। सरकार फिलहाल बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता, पश्चिम एशिया तनाव, महंगे कच्चे तेल और विदेशी मुद्रा दबाव जैसी चुनौतियों से निपटने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में ऊर्जा और खाद्य तेल की बचत को राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में देखा जा रहा है।
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