श्रीलंका ने पाम तेल की खेती पर लगे प्रतिबंध को हटाने की दिशा में बड़ा संकेत दिया है। इस फैसले को भारत और एशियाई खाद्य तेल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एशियन पाम ऑयल अलायंस (APOA) ने श्रीलंका सरकार के इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि टिकाऊ खेती के जरिए खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों लक्ष्यों को साथ लेकर चला जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल कृषि नीति में बदलाव नहीं, बल्कि एशिया में खाद्य तेल सुरक्षा और आयात निर्भरता को लेकर बदलती रणनीति का संकेत भी है।
आखिर श्रीलंका ने पाम तेल पर बैन क्यों लगाया था?
श्रीलंका ने साल 2021 में पाम ऑयल की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार का तर्क था कि पाम खेती से पर्यावरण को नुकसान, जैव विविधता पर असर और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
इसके बाद देश में नए पाम ऑयल प्लांटेशन पर रोक लगा दी गई थी और पुराने बागानों को धीरे-धीरे खत्म करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि बाद में श्रीलंका को खाद्य तेल आयात पर भारी निर्भरता और बढ़ती कीमतों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
अब क्यों बदल रहा है श्रीलंका का रुख?
एशियन पाम ऑयल अलायंस के चेयरमैन Atul Chaturvedi ने कहा कि पाम तेल दुनिया की सबसे ज्यादा उत्पादक वनस्पति तेल फसलों में से एक है।
उन्होंने कहा कि “आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। असली चुनौती टिकाऊ खेती मॉडल अपनाने की है।” विशेषज्ञों के मुताबिक श्रीलंका अब खाद्य तेल आयात बिल घटाने, किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने पर फोकस कर रहा है। इसी वजह से सरकार पाम ऑयल खेती पर लगे प्रतिबंध की समीक्षा कर रही है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य एशियाई देशों से आयात करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि श्रीलंका जैसे देशों में पाम तेल उत्पादन बढ़ने से एशिया में सप्लाई चेन मजबूत हो सकती है।
इसके अलावा भारत लंबे समय से खाद्य तेल सुरक्षा, घरेलू उत्पादन और क्षेत्रीय सहयोग को लेकर एशियाई देशों के साथ रणनीतिक बातचीत कर रहा है। यही वजह है कि श्रीलंका के इस कदम को भारत की बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
एपीओए ने क्या कहा?
एशियन पाम ऑयल अलायंस और सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने संयुक्त बयान में कहा कि टिकाऊ पाम तेल उत्पादन, जिम्मेदार खेती और वैज्ञानिक नीति के जरिए एशियाई देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
एपीओए के महासचिव B. V. Mehta ने कहा कि श्रीलंका की नई सोच यह दिखाती है कि खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए पाम तेल समाधान का अहम हिस्सा बन सकता है।
पाम तेल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
विशेषज्ञों के मुताबिक पाम तेल सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला वनस्पति तेल और सबसे ज्यादा उत्पादन देने वाली फसल मानी जाती है। पाम ऑयल का इस्तेमाल खाद्य उत्पादों, बिस्किट, स्नैक्स, साबुन, कॉस्मेटिक्स और बायोफ्यूल तक में होता है। कम जमीन पर ज्यादा उत्पादन होने की वजह से इसे आर्थिक रूप से काफी प्रभावी फसल माना जाता है।
क्या पूरी तरह हट जाएगा बैन?
फिलहाल श्रीलंका सरकार ने केवल प्रतिबंध पर पुनर्विचार का संकेत दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अंतिम मंजूरी, पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय और टिकाऊ खेती के नियम तय होने के बाद ही बड़ा फैसला लिया जाएगा।
हालांकि उद्योग जगत इसे पाम तेल सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत मान रहा है।
एशिया में बदल रही खाद्य तेल रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि महंगे खाद्य तेल, वैश्विक सप्लाई चेन संकट और बढ़ती आबादी के कारण एशियाई देश अब खाद्य तेल आत्मनिर्भरता पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
भारत समेत कई देश घरेलू उत्पादन बढ़ाने, नई खेती तकनीक अपनाने और क्षेत्रीय साझेदारी मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। श्रीलंका का यह फैसला उसी बदलती रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
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