पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान संकट और कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है, रुपया रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने बाजार और नीति विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ईंधन की खपत कम करने, गैर-जरूरी सोने की खरीद से बचने, कारपूलिंग अपनाने और वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने जैसी बातें कही थीं। अब विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक सामान्य अपील नहीं बल्कि आने वाले संभावित आर्थिक कदमों का संकेत भी हो सकता है।
दिग्गज वित्तीय संस्था नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) आने वाले समय में रुपये को संभालने, डॉलर की मांग कम करने और ईंधन संकट से निपटने के लिए कई बड़े कदम उठा सकते हैं।
क्यों बढ़ गई है सरकार की चिंता?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल और लगभग 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है। ऐसे में जब वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है तो उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगे तेल की वजह से आयात बिल बढ़ता है, डॉलर की मांग बढ़ती है, रुपया कमजोर होता है, महंगाई बढ़ती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है।
अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि पूरे साल बनी रहती है, तो भारत का आयात बिल करीब 13-14 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह देश की GDP का लगभग 0.4 फीसदी माना जा रहा है।
क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं?
सरकार अभी तक पेट्रोल-डीजल कीमतों को पूरी तरह बढ़ाने से बचती रही है। लेकिन तेल विपणन कंपनियों पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है, रुपया कमजोर बना रहता है और सप्लाई संकट जारी रहता है तो सरकार को अंततः पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
फिलहाल इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियां भारी लागत दबाव का सामना कर रही हैं।
क्या फिर लौट सकता है Work From Home मॉडल?
सरकार अब ईंधन खपत कम करने के लिए “वर्क फ्रॉम होम” मॉडल को फिर से बढ़ावा देने पर विचार कर सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जिन सेक्टर्स में कर्मचारियों की फिजिकल प्रेजेंस जरूरी नहीं है, वहां कर्मचारियों को हफ्ते में कम दिन ऑफिस बुलाने पर चर्चा हो रही है।
इसका मकसद पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना, ट्रांसपोर्ट लागत घटाना और विदेशी मुद्रा बचाना बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक कई बड़ी कंपनियां भी अपनी वर्कप्लेस पॉलिसी की समीक्षा कर रही हैं।
टाटा और रिलायंस जैसी कंपनियां भी कर रहीं समीक्षा
रिपोर्ट्स के अनुसार टाटा ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी कंपनियां भी सप्लाई चेन संकट और ईंधन लागत को देखते हुए अपनी कार्य व्यवस्था का मूल्यांकन कर रही हैं। अगर तेल संकट लंबा खिंचता है तो हाइब्रिड वर्क मॉडल, सीमित ऑफिस डे और डिजिटल ऑपरेशन जैसे विकल्प फिर तेजी से बढ़ सकते हैं।
क्या सरकार अचानक कोई बड़ा आर्थिक फैसला ले सकती है?
वित्त मंत्रालय ने पश्चिम एशिया संकट को लेकर आंतरिक चर्चाएं शुरू कर दी हैं। सरकार उद्योग जगत और विभिन्न हितधारकों से लगातार बातचीत कर रही है। हालांकि अधिकारियों ने साफ किया है कि फिलहाल किसी “अचानक” या “झटके वाले” फैसले पर विचार नहीं किया जा रहा है क्योंकि इससे बाजार में घबराहट फैल सकती है। सरकार का फिलहाल मुख्य फोकस ऊर्जा बचत, विदेशी मुद्रा संरक्षण और सप्लाई स्थिरता पर बना हुआ है।
क्या सोने पर फिर सख्ती हो सकती है?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि सरकार सोने के आयात पर फिर से सख्ती कर सकती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इंपोर्टर्स में शामिल है। ज्यादा सोना आयात होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है, चालू खाते का घाटा बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है।
हालांकि सरकारी अधिकारियों ने फिलहाल साफ किया है कि सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने या नई पाबंदियां लगाने जैसे कदमों पर अभी विचार नहीं हो रहा है।
क्या विदेश पैसे भेजने की लिमिट घटेगी?
वर्तमान में लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत भारतीय नागरिक सालाना 2.5 लाख डॉलर तक विदेश भेज सकते हैं। 2013 के मुद्रा संकट के दौरान इस सीमा को कम किया गया था। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल ऐसी किसी रोक पर विचार नहीं हो रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार अचानक प्रतिबंध लगाती है तो निवेशकों में गलत संदेश जाएगा, विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है और बाजार में डर बढ़ सकता है। इसी वजह से सरकार फिलहाल संतुलित रणनीति अपनाना चाहती है।
गिरते रुपये को संभालने के लिए RBI के 4 बड़े विकल्प
भारतीय रुपया 2026 में एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो चुका है। ऐसे में RBI के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। विश्लेषकों के मुताबिक RBI के पास फिलहाल चार बड़े विकल्प मौजूद हैं।
1. NRI Deposit और विशेष बॉन्ड
RBI पहले भी 1998 और 2013 में ऐसे कदम उठा चुका है। विशेष योजनाओं के जरिए प्रवासी भारतीयों से डॉलर जुटाए जा सकते हैं और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत किया जा सकता है। 2013 में इसी तरह की योजना से करीब 26 अरब डॉलर आए थे।
2. विदेशी निवेश नियम आसान करना
सरकार भारतीय कंपनियों के लिए विदेशी कर्ज लेने के नियम आसान बना सकती है। इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) की सीमा बढ़ाई जा सकती है ताकि ज्यादा विदेशी निवेश भारत में आ सके और डॉलर इनफ्लो बढ़े।
3. तेल कंपनियों को सीधे डॉलर देना
बाजार पर दबाव कम करने के लिए RBI सीधे अपने विदेशी मुद्रा भंडार से तेल कंपनियों को डॉलर उपलब्ध करा सकता है। इससे खुले बाजार में डॉलर की मांग कम होगी और रुपये पर दबाव घट सकता है। विशेषज्ञ इसे शॉर्ट-टर्म राहत वाला कदम मानते हैं।
4. ब्याज दरों में बढ़ोतरी
अगर महंगाई और रुपये पर दबाव ज्यादा बढ़ता है तो RBI ब्याज दरें भी बढ़ा सकता है। बाजार को उम्मीद है कि अगले साल तक करीब 70 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है क्योंकि इससे लोन महंगे हो जाएंगे, निवेश धीमा पड़ सकता है और आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है।
सरकार का सबसे बड़ा डर क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल किसी “1991 जैसे संकट” की स्थिति नहीं मान रही, लेकिन लंबे समय तक महंगा तेल, कमजोर रुपया, विदेशी मुद्रा दबाव और बढ़ता आयात बिल गंभीर खतरे के रूप में देखे जा रहे हैं। इसी वजह से सरकार अभी से ऊर्जा बचत, डॉलर प्रबंधन और आर्थिक स्थिरता पर फोकस बढ़ा रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है पीएम मोदी की अपील?
प्रधानमंत्री की अपील को सिर्फ “ईंधन बचाओ” संदेश के तौर पर नहीं देखा जा रहा। विश्लेषकों का मानना है कि यह संकेत है कि सरकार हालात को गंभीर मान रही है। ऊर्जा सुरक्षा अब प्राथमिकता बन चुकी है। विदेशी मुद्रा बचाने पर फोकस बढ़ सकता है और आने वाले महीनों में कई नीतिगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यानी आने वाला समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी अहम माना जा रहा है।
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