पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक बार फिर बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो तेल कंपनियों और सरकार पर दबाव और बढ़ेगा।
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही इसका असर सीधे देश के ईंधन बिल और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
15 मई के बाद बढ़ सकती हैं कीमतें
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मौजूदा हालात में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है। Infomerics Ratings के मुख्य अर्थशास्त्री मनोरंजन शर्मा के मुताबिक अगर ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो 15 मई के बाद ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना काफी मजबूत है।
विशेषज्ञों के अनुसार पेट्रोल और डीजल 4 से 5 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो सकते हैं, जबकि LPG सिलेंडर 40 से 50 रुपये तक महंगा हो सकता है।
तेल कंपनियों पर बढ़ रहा दबाव
जानकारों का कहना है कि फिलहाल सरकारी तेल कंपनियां बाजार भाव से कम कीमत पर ईंधन बेच रही हैं। इसके कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियों यानी OMCs पर भारी वित्तीय दबाव बन रहा है।
मनोरंजन शर्मा के मुताबिक तेल कंपनियां हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेल रही हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुकाबले घरेलू ईंधन कीमतें अभी पूरी तरह नहीं बढ़ाई गई हैं। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो कंपनियों के लिए यह बोझ उठाना मुश्किल हो सकता है।
क्या एकदम से बढ़ेंगे दाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल अचानक बड़ा झटका देने से बचना चाहेगी क्योंकि इससे महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। इसीलिए एक बार में बड़ी बढ़ोतरी की बजाय धीरे-धीरे छोटी बढ़ोतरी की संभावना ज्यादा मानी जा रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक शुरुआत में 2 से 4 रुपये प्रति लीटर तक की क्रमिक बढ़ोतरी हो सकती है। अगर वैश्विक हालात लंबे समय तक खराब रहते हैं तो बाद में और बढ़ोतरी संभव है।
पीएम मोदी की अपील का क्या मतलब है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से पेट्रोल-डीजल की बचत, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल, कार पूलिंग, वर्क फ्रॉम होम और गैर-जरूरी विदेश यात्राओं से बचने की अपील की थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अपील सीधे बढ़ती तेल कीमतों और विदेशी मुद्रा पर दबाव से जुड़ी हुई है। सरकार चाहती है कि तेल की खपत कम हो, डॉलर की बचत हो और आयात बिल नियंत्रित रखा जा सके।
क्या यह सिर्फ अस्थायी संकट है?
Geojit Investments के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वीके विजयकुमार का मानना है कि यह स्थिति स्थायी नहीं भी हो सकती। उनके मुताबिक अगर पश्चिम एशिया तनाव कम होता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सामान्य रूप से खुल जाता है तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं। हालांकि जब तक तनाव बना रहेगा, तब तक सरकार और कंपनियों पर दबाव बना रहेगा।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
पेट्रोल और डीजल महंगे होने का असर सिर्फ वाहन चलाने की लागत तक सीमित नहीं रहता। इसके कारण ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है, खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं, एयरफेयर बढ़ सकता है और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन महंगा होने का असर धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था में फैलता है।
महंगाई पर कितना असर पड़ेगा?
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो महंगाई बढ़ सकती है, रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और भारत का आयात बिल तेजी से ऊपर जा सकता है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक यही वजह है कि सरकार फिलहाल ईंधन बचत, विदेशी मुद्रा संरक्षण और घरेलू खपत नियंत्रण पर जोर दे रही है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पश्चिम एशिया तनाव कम होगा, क्या तेल कीमतें नीचे आएंगी और क्या सरकार ईंधन कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी करेगी?
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम रहेंगे। अगर कच्चा तेल ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो भारत में पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।
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