Partition of India 1947 Monetary System: 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो सिर्फ जमीन और सीमाओं का बंटवारा नहीं हुआ था। सरकारी संपत्ति, सेना, पुलिस, प्रशासनिक ढांचा, रेलवे और यहां तक कि दफ्तरों के सामान तक का विभाजन किया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक बेहद दिलचस्प आर्थिक पहलू भी था। पाकिस्तान एक अलग देश तो बन गया, लेकिन उसके पास शुरुआत में अपना केंद्रीय बैंक नहीं था। यही वजह थी कि आजादी के बाद करीब 11 महीनों तक पाकिस्तान की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI के सहारे चलती रही।
यह सुनने में भले ही हैरान करने वाला लगे, लेकिन विभाजन के समय परिस्थितियां इतनी असाधारण थीं कि पाकिस्तान को अपना केंद्रीय बैंक तैयार करने में समय लगा। इस संक्रमणकाल में RBI ने पाकिस्तान के लिए केंद्रीय बैंक जैसी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। यहां तक कि पाकिस्तान में शुरुआती दौर में इस्तेमाल होने वाले करेंसी नोट भी भारत में जारी किए गए नोटों पर आधारित थे।
1947 में पाकिस्तान बना, लेकिन केंद्रीय बैंक कहां था?
भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई थी। उस समय RBI अविभाजित ब्रिटिश भारत का केंद्रीय बैंक था। इसका काम मुद्रा जारी करना, बैंकिंग व्यवस्था को नियंत्रित करना और सरकार के बैंक के रूप में काम करना था।
जब 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तब एक नई समस्या सामने थी। नया देश बनने के साथ उसे अपनी अलग वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था भी चाहिए थी, लेकिन इसके लिए जरूरी संस्थागत ढांचा तत्काल तैयार नहीं था।
केंद्रीय बैंक सिर्फ एक इमारत या बैंक का नाम नहीं होता। उसे मुद्रा जारी करने की व्यवस्था, सरकारी खातों का संचालन, बैंकों की निगरानी, विदेशी मुद्रा प्रबंधन और वित्तीय प्रणाली के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों जैसी कई चीजों की जरूरत होती है।
पाकिस्तान के पास स्वतंत्रता के समय ऐसी पूरी व्यवस्था मौजूद नहीं थी। इसलिए एक अंतरिम व्यवस्था बनाई गई, जिसके तहत RBI को पाकिस्तान की मौद्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ी।
पाकिस्तान के लिए RBI ने कैसे किया काम?
विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्थाओं को लेकर विशेष प्रावधान किए गए थे। इसी संक्रमणकाल में RBI ने पाकिस्तान के लिए केंद्रीय बैंक से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराईं।
इस व्यवस्था का मकसद यह था कि पाकिस्तान के पास अपना केंद्रीय बैंक तैयार होने तक वहां बैंकिंग और मुद्रा व्यवस्था अचानक ठप न हो जाए।
यानी राजनीतिक तौर पर दोनों देश अलग हो चुके थे, लेकिन आर्थिक और बैंकिंग ढांचा कुछ समय तक साझा विरासत के रूप में काम करता रहा।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि उस समय RBI आज की तरह पूरी तरह सरकारी स्वामित्व वाला संस्थान नहीं था। RBI का राष्ट्रीयकरण 1949 में हुआ, यानी पाकिस्तान के लिए केंद्रीय बैंकिंग भूमिका निभाने के समय यह शेयरधारकों के स्वामित्व वाला बैंक था।
पाकिस्तान के पास अपने नोट नहीं थे, तो क्या चलता था?
विभाजन के बाद पाकिस्तान को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। उसके पास तुरंत अपनी करेंसी छापने और जारी करने की स्वतंत्र व्यवस्था नहीं थी।
इसलिए शुरुआती समय में वहां भारतीय मुद्रा व्यवस्था का ही इस्तेमाल जारी रहा। लेकिन पाकिस्तान को अपने अलग राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान भी दिखानी थी। इसके लिए भारतीय नोटों पर विशेष ओवरप्रिंट किया गया।
इन नोटों पर “Government of Pakistan” यानी पाकिस्तान सरकार का उल्लेख किया गया। कुछ नोटों पर उर्दू में भी पाकिस्तान सरकार का उल्लेख दिखाई देता था।
इसका मतलब यह था कि नोट का मूल डिजाइन और उसकी छपाई की व्यवस्था अभी भारतीय प्रणाली से जुड़ी हुई थी, लेकिन उस पर पाकिस्तान सरकार की पहचान जोड़ दी गई थी।
यही शुरुआती नोट आज विभाजन के आर्थिक इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज माने जाते हैं।
भारतीय नोट पर पाकिस्तान की मुहर क्यों लगाई गई?
यह व्यवस्था असल में मजबूरी और व्यावहारिक जरूरत का परिणाम थी। किसी नए देश के लिए रातों-रात नई करेंसी डिजाइन करना, नोट छापना और उन्हें पूरे देश में वितरित करना आसान नहीं था।
इसके अलावा नई मुद्रा जारी करने के लिए सिर्फ कागज और प्रिंटिंग प्रेस पर्याप्त नहीं होते। नकली नोट रोकने के लिए सुरक्षा तकनीक, बैंकिंग चैनल, करेंसी वितरण नेटवर्क और केंद्रीय बैंक की संस्थागत व्यवस्था भी जरूरी होती है।
इसलिए पाकिस्तान ने शुरुआत में मौजूदा भारतीय नोटों को ही अपनी सरकारी पहचान के साथ इस्तेमाल किया।
दिलचस्प बात यह थी कि नोटों का मूल स्वरूप भारतीय व्यवस्था से जुड़ा हुआ था, लेकिन उन पर पाकिस्तान सरकार की पहचान दिखाई देती थी। इससे साफ पता चलता है कि राजनीतिक विभाजन के बावजूद दोनों देशों की आर्थिक व्यवस्थाएं तत्काल पूरी तरह अलग नहीं हो सकी थीं।
1948 में पाकिस्तान ने अपना केंद्रीय बैंक तैयार किया
पाकिस्तान ने जल्द ही अपनी स्वतंत्र केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम उठाया। 12 मई 1948 को State Bank of Pakistan Order जारी किया गया।
इसके बाद पाकिस्तान के अपने केंद्रीय बैंक के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी और 1 जुलाई 1948 को State Bank of Pakistan का उद्घाटन किया गया।
कराची में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी मौजूद थे। जाहिद हुसैन को State Bank of Pakistan का पहला गवर्नर बनाया गया।
इस तरह करीब 11 महीने के संक्रमणकाल के बाद पाकिस्तान को अपना स्वतंत्र केंद्रीय बैंक मिल गया।
यही वह क्षण था जब पाकिस्तान की मौद्रिक संप्रभुता को संस्थागत रूप से अलग पहचान मिली।
1 जुलाई 1948 क्यों है पाकिस्तान के इतिहास की अहम तारीख?
1 जुलाई 1948 को State Bank of Pakistan की शुरुआत सिर्फ एक नए बैंक की स्थापना नहीं थी। यह पाकिस्तान के लिए अपनी स्वतंत्र वित्तीय व्यवस्था की शुरुआत भी थी।
केंद्रीय बैंक बनने के बाद पाकिस्तान अपनी मुद्रा नीति, बैंकिंग व्यवस्था और मौद्रिक प्रबंधन को अपने हिसाब से संचालित करने की दिशा में आगे बढ़ सका।
इससे पहले तक विभाजन के कारण पैदा हुई परिस्थितियों में उसकी मौद्रिक व्यवस्था भारतीय उपमहाद्वीप की पुरानी केंद्रीय बैंकिंग प्रणाली से जुड़ी हुई थी।
इसलिए State Bank of Pakistan की स्थापना को पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
पाकिस्तान के नोटों का सफर भी काफी दिलचस्प रहा
पाकिस्तान की करेंसी व्यवस्था एक ही दिन में पूरी तरह तैयार नहीं हुई। इसे कई चरणों में विकसित किया गया।
पहले चरण में पाकिस्तान में भारतीय करेंसी का इस्तेमाल हुआ।
दूसरे चरण में भारतीय नोटों पर पाकिस्तान सरकार की पहचान वाला ओवरप्रिंट किया गया। इस तरह पुराने भारतीय नोटों को अंतरिम रूप से पाकिस्तान में वैध मुद्रा के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
तीसरे चरण में पाकिस्तान ने अपने लिए अस्थायी नोटों की व्यवस्था की। ब्रिटेन की प्रसिद्ध सिक्योरिटी प्रिंटिंग कंपनी Thomas De La Rue से नोट छपवाए गए। इन इमरजेंसी नोटों में 5, 10 और 100 रुपये के मूल्यवर्ग शामिल थे।
चौथे चरण में पाकिस्तान ने अपने केंद्रीय बैंक के माध्यम से आधिकारिक करेंसी जारी करना शुरू किया।
इस प्रक्रिया से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी नए देश के लिए स्वतंत्र मौद्रिक व्यवस्था तैयार करना कितना जटिल काम था।
पाकिस्तान के शुरुआती नोटों पर बंगाली भाषा क्यों थी?
पाकिस्तान की शुरुआती करेंसी से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय पाकिस्तान सिर्फ आज के पाकिस्तान तक सीमित नहीं था।
1947 में पूर्वी पाकिस्तान, यानी आज का बांग्लादेश भी पाकिस्तान का हिस्सा था। इसलिए शुरुआती दौर की कुछ पाकिस्तानी मुद्रा पर अंग्रेजी और उर्दू के साथ बंगाली भाषा का इस्तेमाल भी किया गया था।
यह उस समय की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति को दर्शाता है।
बाद में पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच राजनीतिक, भाषाई और आर्थिक मतभेद बढ़ते गए। आखिरकार 1971 में पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया।
इसलिए पाकिस्तान की शुरुआती करेंसी पर बंगाली भाषा का होना उसके इतिहास के उस दौर की याद दिलाता है, जब दोनों क्षेत्र एक ही देश का हिस्सा थे।
1949 में रुपये का रिश्ता भी टूट गया
State Bank of Pakistan की स्थापना के बाद भी भारत और पाकिस्तान की मुद्राओं के बीच शुरुआती दौर में करीबी संबंध बने रहे।
एक समय भारतीय रुपया और पाकिस्तानी रुपया समान मूल्य के आधार पर चलते थे। लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं रही।
1949 में भारत ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया, जबकि पाकिस्तान ने अपने रुपये के मूल्य में उसी तरह बदलाव करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद दोनों देशों की मुद्राओं के बीच पुराना मूल्य-संबंध समाप्त हो गया।
यह सिर्फ मुद्रा की कीमत बदलने का मामला नहीं था। इसका असर भारत-पाकिस्तान के व्यापार और आर्थिक संबंधों पर भी पड़ा।
इस घटना ने दोनों देशों की मौद्रिक व्यवस्थाओं के बीच वास्तविक दूरी को और बढ़ा दिया।
विभाजन के बाद वित्तीय ढांचा खड़ा करना इतना मुश्किल क्यों था?
1947 का विभाजन किसी सामान्य प्रशासनिक बदलाव जैसा नहीं था। सीमाएं अचानक बदलीं, आबादी का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा।
ऐसे माहौल में बैंकिंग व्यवस्था को अलग करना बेहद कठिन था।
कर्मचारियों का बंटवारा हुआ, बैंक शाखाओं का नियंत्रण बदला, सरकारी संपत्तियों और देनदारियों का हिसाब लगाया गया और दोनों देशों के लिए अलग-अलग वित्तीय व्यवस्था तैयार करनी पड़ी।
इसके अलावा पाकिस्तान को अपने नए प्रशासनिक केंद्रों के लिए संस्थान भी खड़े करने थे। केंद्रीय बैंक उनमें सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक था।
यही कारण है कि पाकिस्तान के बनने के तुरंत बाद उसका अपना केंद्रीय बैंक मौजूद नहीं था और एक अंतरिम व्यवस्था की जरूरत पड़ी।
क्या पाकिस्तान ने अपना बैंक बनाना ‘भूल’ गया था?
लोकप्रिय भाषा में यह कहना आकर्षक है कि “पाकिस्तान देश तो बना, लेकिन अपना बैंक बनाना भूल गया”, लेकिन ऐतिहासिक रूप से तस्वीर थोड़ी अलग है।
पाकिस्तान ने अपना केंद्रीय बैंक बनाने की योजना बनाई थी, लेकिन विभाजन की असाधारण परिस्थितियों के कारण उसे तुरंत स्थापित करना संभव नहीं हुआ।
इसलिए इसे भूल की बजाय संक्रमणकालीन व्यवस्था और संस्थागत तैयारी की चुनौती के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
फिर भी यह तथ्य अपने आप में बेहद रोचक है कि एक नया देश बनने के बाद लगभग 11 महीने तक उसकी केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था पुराने अविभाजित भारत की केंद्रीय बैंकिंग प्रणाली से जुड़ी रही।
विभाजन का यह अध्याय आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत-पाकिस्तान विभाजन को आमतौर पर जमीन, सीमाओं, शरणार्थियों और राजनीतिक घटनाओं के नजरिए से देखा जाता है। लेकिन इसका एक महत्वपूर्ण आर्थिक इतिहास भी है।
आज दोनों देशों के पास अपने-अपने केंद्रीय बैंक हैं। भारत में Reserve Bank of India और पाकिस्तान में State Bank of Pakistan अपनी-अपनी मौद्रिक नीतियां संचालित करते हैं।
लेकिन 1947-48 का दौर बताता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक संस्थानों को खड़ा करना भी उतना ही जरूरी होता है।
पाकिस्तान के शुरुआती नोटों पर भारतीय डिजाइन और पाकिस्तान सरकार की मुहर, RBI की संक्रमणकालीन भूमिका और फिर 1 जुलाई 1948 को State Bank of Pakistan की शुरुआत—ये सभी घटनाएं दिखाती हैं कि दो नए देशों के बीच आर्थिक अलगाव एक दिन में पूरा नहीं हुआ था।
निष्कर्ष
1947 का विभाजन राजनीतिक रूप से भारत और पाकिस्तान को अलग करने वाला ऐतिहासिक मोड़ था, लेकिन आर्थिक और वित्तीय स्तर पर दोनों देशों की व्यवस्थाओं को अलग होने में समय लगा।
पाकिस्तान के पास शुरुआत में अपना केंद्रीय बैंक नहीं था, इसलिए संक्रमणकाल में RBI की भूमिका महत्वपूर्ण रही। शुरुआती दौर में भारतीय नोटों पर “Government of Pakistan” का ओवरप्रिंट करके उनका इस्तेमाल किया गया। इसके बाद पाकिस्तान ने अस्थायी करेंसी व्यवस्था तैयार की और आखिरकार 1 जुलाई 1948 को State Bank of Pakistan की शुरुआत के साथ अपनी स्वतंत्र केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था स्थापित की।
इस तरह नया देश बनने के करीब 11 महीने बाद पाकिस्तान को अपना केंद्रीय बैंक मिला और उसकी मौद्रिक संप्रभुता की औपचारिक शुरुआत हुई।
यह इतिहास इस बात का दिलचस्प उदाहरण है कि देश की राजनीतिक सीमाएं एक दिन में खींची जा सकती हैं, लेकिन एक स्वतंत्र आर्थिक व्यवस्था तैयार करने में संस्थान, कानून, कर्मचारी और समय—सबकी जरूरत पड़ती है।


