नई दिल्ली: हॉस्पिटैलिटी स्टार्टअप OYO की पैरेंट कंपनी PRISM और Zostel के बीच वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद में Zostel को एक और बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने Zostel की ताजा याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही इस विवाद में अदालतों से राहत पाने की Zostel की लगातार 9वीं कोशिश भी नाकाम हो गई है।
यह मामला 2018 से अलग-अलग अदालतों में चल रहा है। इस दौरान Zostel ने गुरुग्राम जिला अदालत, दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कई बार दस्तक दी, लेकिन अब तक उसे कोई ठोस कानूनी राहत नहीं मिल सकी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट की दो जजों की डिवीजन बेंच ने Zostel की याचिका खारिज करते हुए मामले का निपटारा कर दिया। इससे पहले मई 2025 में भी हाई कोर्ट ने उस आर्बिट्रल अवॉर्ड (मध्यस्थता निर्णय) को रद्द कर दिया था, जिस पर Zostel अपने दावे आधारित कर रहा था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि दोनों पक्षों के बीच हुई टर्म शीट का अधिकांश हिस्सा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं था और आवश्यक व्यावसायिक शर्तों पर अंतिम सहमति नहीं बनी थी। ऐसे में अनुबंध के पालन (Specific Performance) का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने आर्बिट्रेशन अवॉर्ड भी रद्द कर दिया, जिससे PRISM पर किसी तरह की लागू होने वाली कानूनी जिम्मेदारी नहीं बची।
सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
हाई कोर्ट के फैसले के बाद Zostel ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन वहां भी उसे कोई राहत नहीं मिली। बाद में कंपनी ने अपनी स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) वापस ले ली और कानूनी विकल्प खुले रखने की अनुमति के साथ मामला वापस लिया।
IPO विवाद भी बना चर्चा का विषय
हाल के दिनों में Zostel ने PRISM/OYO के प्रस्तावित IPO से जुड़े खुलासों को लेकर SEBI के समक्ष भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि अदालत में सुनवाई के दौरान Zostel के वकील ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य IPO प्रक्रिया को रोकना नहीं, बल्कि अपने कथित अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि IPO से जुड़े डिस्क्लोजर की जांच SEBI के अधिकार क्षेत्र में आती है, जबकि अनुबंध संबंधी विवादों का फैसला केवल न्यायपालिका ही कर सकती है। ऐसे में दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग हैं।
PRISM का दावा- सभी कानूनी नियमों का किया पालन
PRISM की ओर से कहा गया कि कंपनी ने IPO से जुड़े सभी आवश्यक खुलासे लागू कानूनों और नियामकीय नियमों के अनुसार किए हैं। कंपनी का कहना है कि जिस आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को अदालत पहले ही रद्द कर चुकी है, उसके आधार पर IPO प्रक्रिया में बाधा डालने की कोई गुंजाइश नहीं बनती।
कानूनी विशेषज्ञों का भी कहना है कि जिन मामलों पर अदालत में सुनवाई चल रही है, उनका समाधान न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए, न कि समानांतर नियामकीय मंचों के जरिए।
WinZO के सह-संस्थापक पावन नंदा का भी जिक्र
इस पूरे विवाद के बीच Zostel के सह-संस्थापक रहे और बाद में ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म WinZO के को-फाउंडर बने पावन नंदा भी चर्चा में रहे। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नवंबर 2025 में कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें और WinZO की सह-संस्थापक सौम्या सिंह राठौर को गिरफ्तार किया था। बाद में ED ने उनसे जुड़ी संस्थाओं की करीब ₹505 करोड़ की विदेशी संपत्तियां अस्थायी रूप से अटैच करने की जानकारी भी दी थी।
Zostel बनाम OYO विवाद की पूरी टाइमलाइन
- फरवरी 2018: गुरुग्राम जिला अदालत ने अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए Zostel की पहली याचिका खारिज की।
- जनवरी 2020: दिल्ली हाई कोर्ट ने मामला आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को भेजा, लेकिन कोई अंतरिम राहत नहीं दी।
- जुलाई 2020: आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने Zostel की प्रमुख अंतरिम मांगें, जिसमें बैंक गारंटी भी शामिल थी, खारिज कर दीं।
- 14 फरवरी 2022: OYO के प्रस्तावित IPO पर रोक और कथित 7% हिस्सेदारी सुरक्षित रखने की मांग हाई कोर्ट ने खारिज कर दी।
- 13 मई 2025: दिल्ली हाई कोर्ट ने PRISM की याचिका स्वीकार करते हुए आर्बिट्रल अवॉर्ड पूरी तरह रद्द कर दिया।
- 29 जुलाई 2025: Zostel ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी SLP वापस ले ली।
- 12 अगस्त 2025: प्रवर्तन कार्यवाही से जुड़ी अपील भी वापस ले ली गई।
- मई 2025 के फैसले के खिलाफ धारा 37 की अपील अभी भी दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है।
- जुलाई 2026: दिल्ली हाई कोर्ट ने Zostel की नई याचिका भी खारिज कर दी, जिससे अदालतों में राहत पाने की उसकी लगातार 9वीं कोशिश विफल हो गई।
निष्कर्ष
करीब आठ वर्षों से चल रहे इस विवाद में फिलहाल कानूनी बढ़त PRISM (OYO की पैरेंट कंपनी) के पक्ष में दिखाई दे रही है। दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले ने Zostel के दावों को एक और बड़ा झटका दिया है। हालांकि, धारा 37 के तहत दायर अपील अभी भी लंबित है, इसलिए इस लंबे कानूनी विवाद का अंतिम अध्याय अभी लिखा जाना बाकी है।


