Crude Oil Supply: ग्लोबल ऑयल मार्केट पर सप्लाई संकट का दबाव लगातार बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, दुनिया के तेल बाजार से 1.1 अरब बैरल से अधिक कच्चा तेल एक समय पर बाजार तक नहीं पहुंच पाया। यह मात्रा करीब 10 दिनों की सामान्य वैश्विक तेल खपत के बराबर है। चिंता की बात यह है कि इस संकट के दौरान तेल बाजार को संभालने वाले कई महत्वपूर्ण बफर अब काफी हद तक कम हो चुके हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर बड़ा खतरा पैदा किया। इस अहम समुद्री मार्ग से सामान्य परिस्थितियों में हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं। यह दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा है।
इसके बावजूद तेल की कीमतों में शुरुआती तेजी के बाद वह 90-100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रही। IMF के अनुसार, इसका कारण यह नहीं था कि सप्लाई संकट छोटा था, बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में मौजूद कुछ बफर ने इस झटके को absorb किया।
आखिर तेल की कीमतें इतनी तेजी से क्यों नहीं बढ़ीं?
होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई बाधित होने के बावजूद खाड़ी के कुछ बड़े तेल उत्पादकों ने वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल किया। इससे बाजार को कुछ राहत मिली।
सऊदी अरब ने लाल सागर के किनारे स्थित यानबू तक अपनी पाइपलाइन का इस्तेमाल कर तेल भेजने की कोशिश की। वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने फुजैराह में मौजूद अपनी एक्सपोर्ट सुविधाओं का इस्तेमाल लगभग पूरी क्षमता के करीब किया।
हालांकि, ये वैकल्पिक रास्ते होर्मुज स्ट्रेट से सामान्य तौर पर गुजरने वाले तेल की पूरी मात्रा की भरपाई करने में सक्षम नहीं थे। यानी सप्लाई संकट खत्म नहीं हुआ, बल्कि दूसरे माध्यमों और उपलब्ध भंडार की मदद से उसे कुछ समय के लिए संभाला गया।
रिफाइंड ईंधन की सप्लाई भी प्रभावित हुई। खास तौर पर डीजल और जेट फ्यूल पर दबाव देखने को मिला। वैश्विक रिफाइंड फ्यूल सप्लाई में खाड़ी देशों की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी है।
1.1 अरब बैरल से ज्यादा तेल बाजार से गायब
IMF के मुताबिक मई के अंत तक 1.1 अरब बैरल से अधिक कच्चा तेल बाजार तक नहीं पहुंच पाया था। यह मात्रा लगभग 10 दिनों की सामान्य वैश्विक खपत के बराबर है।
यह कमी ऐतिहासिक घटनाओं के दौरान दर्ज सप्लाई शॉर्टेज से भी बड़ी बताई गई है। 1973 का ऑयल शॉक, ईरान-इराक युद्ध और खाड़ी युद्ध जैसे बड़े संकटों के दौरान भी तेल बाजार को भारी सप्लाई झटकों का सामना करना पड़ा था।
ऐसे में सवाल यह है कि इतनी बड़ी कमी के बावजूद दुनिया में तेल की सप्लाई पूरी तरह क्यों नहीं चरमराई?
इसका जवाब तीन बड़े बफर में छिपा है।
बाजार को संभालने वाले तीन बड़े बफर
1. तेल की मांग में आई कमी
तेल की कीमतों में तेजी और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के कारण दुनिया के कई हिस्सों में तेल की मांग कम हुई। खास तौर पर एशिया में उपभोक्ताओं और कारोबारों ने ईंधन की खपत घटाने की कोशिश की।
कई जगहों पर कोयला और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश हुई। हालांकि परिवहन क्षेत्र में तेल की मांग को कम करना आसान नहीं रहा।
सरकारों की ओर से फ्यूल सब्सिडी, प्राइस कैप और टैक्स में राहत जैसे कदमों ने भी आम उपभोक्ताओं पर तेल की बढ़ती कीमतों का असर सीमित किया। लेकिन इसके बदले सरकारों के खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।
2. खाड़ी के बाहर के देशों ने बढ़ाया उत्पादन
दूसरा बड़ा सहारा खाड़ी क्षेत्र के बाहर मौजूद तेल उत्पादकों से मिला।
2025 के स्तर की तुलना में खाड़ी के बाहर तेल उत्पादन में करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन की वृद्धि हुई। अमेरिका इस अतिरिक्त उत्पादन में प्रमुख योगदानकर्ता रहा। इसके अलावा वेनेजुएला, गुयाना और रूस से भी अतिरिक्त तेल सप्लाई बाजार में आई।
इस अतिरिक्त उत्पादन ने खाड़ी क्षेत्र से आने वाली सप्लाई में हुई कमी की कुछ भरपाई की। हालांकि यह वृद्धि इतनी बड़ी नहीं थी कि होर्मुज के जरिए होने वाली पूरी सप्लाई को बदल सके।
3. दुनिया ने अपने तेल भंडार का इस्तेमाल किया
तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण बफर था ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री।
मार्च से मई के बीच बाजार को हर दिन करीब 40 लाख बैरल की सप्लाई कमी का सामना करना पड़ा। इस कमी को काफी हद तक दुनिया के जमा किए गए तेल भंडार ने पूरा किया।
इसमें चीन के कमर्शियल स्टॉक के साथ-साथ विभिन्न देशों के रणनीतिक तेल भंडार भी शामिल रहे।
यानी दुनिया ने वास्तव में सप्लाई संकट को खत्म नहीं किया। उसने अपने पास पहले से जमा तेल का इस्तेमाल करके उस संकट को कुछ समय के लिए संभाल लिया।
अब IMF को क्यों सता रही है बड़ी चिंता?
यही वह स्थिति है जिस पर IMF ने चेतावनी दी है।
युद्ध से पहले वैश्विक तेल सप्लाई मांग से करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन अधिक थी। इस अतिरिक्त क्षमता के कारण बाजार के पास किसी सप्लाई झटके को संभालने के लिए कुछ गुंजाइश थी।
लेकिन अब यह अतिरिक्त सरप्लस काफी हद तक खत्म हो चुका है।
एक तरफ अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल हो चुका है। दूसरी तरफ महंगे तेल के कारण मांग में पहले ही कुछ एडजस्टमेंट हो चुका है। वहीं तीसरी तरफ ग्लोबल ऑयल इन्वेंट्री भी घट गई है।
इसका सीधा मतलब है कि अगर आगे कोई नया सप्लाई झटका आता है तो बाजार के पास उससे निपटने के लिए पहले जैसी सुरक्षा नहीं होगी।
होर्मुज स्ट्रेट खुल भी जाए तो तुरंत सामान्य नहीं होगी सप्लाई
होर्मुज स्ट्रेट अगर पूरी तरह से खुल जाता है, तब भी तेल की सप्लाई तुरंत सामान्य स्तर पर पहुंचने की गारंटी नहीं है।
इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, रास्ता खुलने के बाद तेल की सप्लाई का बड़ा हिस्सा दो से तीन महीने में ही सामान्य स्थिति में लौट सकता है। इसकी वजह केवल समुद्री रास्ते का खुलना नहीं है।
टैंकरों की उपलब्धता, शिपिंग अरेंजमेंट, इंश्योरेंस, सुरक्षा और ऑपरेटरों का भरोसा भी दोबारा स्थापित करना होगा।
अगर लंबे समय तक बंद रहने के कारण कुछ तेल कुओं को बंद कर दिया गया है और उन्हें आर्थिक रूप से दोबारा शुरू करना मुश्किल होता है, तो उत्पादन पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
इसलिए केवल होर्मुज स्ट्रेट का खुलना ही समस्या का तत्काल समाधान नहीं माना जा सकता।
अगर एक और सप्लाई झटका आया तो क्या होगा?
सबसे बड़ी चिंता अब ऑयल इन्वेंट्री को लेकर है।
जैसे-जैसे सप्लाई धीरे-धीरे बहाल होगी, अगर बाजार में मांग और उपलब्ध तेल के बीच अंतर बना रहता है तो स्टॉक लगातार कम हो सकता है। एक समय ऐसा भी आ सकता है जब इन्वेंट्री ऑपरेशनल मिनिमम के करीब पहुंच जाए।
ऑपरेशनल मिनिमम वह स्तर है जहां भौतिक तेल व्यवस्था पर दबाव बढ़ना शुरू हो सकता है।
ऐसी स्थिति में किसी नई पाइपलाइन, समुद्री मार्ग, तेल उत्पादन क्षेत्र या रिफाइनरी में छोटी सी भी बड़ी रुकावट का असर काफी ज्यादा हो सकता है।
कम स्टॉक और सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता का मतलब है कि बाजार भविष्य के झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाएगा। इसका असर सीधे क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ सकता है।
IMF ने बताए तेल संकट से बचने के उपाय
IMF के अनुसार, भविष्य में इस तरह के संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर तैयारी जरूरी है।
तेल भंडार को दोबारा भरना जरूरी
सबसे पहले रणनीतिक और कमर्शियल ऑयल स्टॉक को फिर से मजबूत करना होगा। पर्याप्त इन्वेंट्री बाजार को अचानक आने वाले सप्लाई शॉक से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
होर्मुज जैसे चोकपॉइंट पर निर्भरता घटानी होगी
दूसरी चुनौती तेल की सप्लाई के महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम करना है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम एनर्जी चोकपॉइंट्स में से एक है।
वैकल्पिक पाइपलाइन, अलग शिपिंग रूट और अलग-अलग ऊर्जा स्रोत विकसित करके इस जोखिम को कम किया जा सकता है। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
सब्सिडी को टारगेटेड रखना होगा
तेल संकट के समय सरकारें उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए फ्यूल सब्सिडी और टैक्स में छूट दे सकती हैं। लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ सकता है।
IMF का संकेत है कि ऐसी मदद जरूरतमंद लोगों और प्रभावित क्षेत्रों तक सीमित और अस्थायी होनी चाहिए। साथ ही ऊर्जा बचाने के उपायों को भी बढ़ावा देना जरूरी है।
आगे तेल बाजार के लिए क्या मायने रखता है?
ग्लोबल ऑयल मार्केट ने अब तक बहुत बड़े सप्लाई झटके को संभाल लिया है। लेकिन इसके पीछे तीन प्रमुख वजहें रहीं—तेल की मांग में कमी, खाड़ी के बाहर उत्पादन में वृद्धि और दुनिया के जमा तेल भंडार का इस्तेमाल।
समस्या यह है कि इन तीनों बफर की क्षमता अब पहले जैसी नहीं रही।
इसलिए भविष्य में अगर होर्मुज स्ट्रेट, किसी बड़े तेल उत्पादक देश, पाइपलाइन या किसी अन्य अहम सप्लाई रूट से जुड़ा एक और बड़ा संकट पैदा होता है, तो उसका असर ज्यादा तेज हो सकता है।
यही वजह है कि होर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी तेल बाजार के लिए जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। आने वाले महीनों में तेल के दाम केवल मौजूदा सप्लाई पर नहीं, बल्कि इन्वेंट्री, अतिरिक्त उत्पादन क्षमता और भू-राजनीतिक तनाव पर भी निर्भर करेंगे।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए इसका महत्व और ज्यादा है। कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों के साथ-साथ महंगाई, परिवहन लागत और कंपनियों की लागत पर भी असर पड़ सकता है।


