भारत और नेपाल के बीच गोरखा सैनिकों का रिश्ता करीब दो सदियों पुराना है। भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों की सबसे खास कड़ियों में रही है। लेकिन जून 2022 में भारत की अग्निपथ योजना लागू होने के बाद नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में नई भर्ती का रास्ता बंद हो गया। अब चार साल से जारी इस गतिरोध को खत्म करने की मांग नेपाल के अंदर से ही तेज होने लगी है।
मामला ऐसे समय में फिर सुर्खियों में है, जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ 17 से 19 अगस्त 2026 तक नेपाल के दौरे पर हैं। उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री बालेंद्र (बालेन) शाह से मुलाकात कर द्विपक्षीय रक्षा सहयोग पर चर्चा की है। उनके दौरे के दौरान पोखरा में गोरखा भूतपूर्व सैनिकों की रैली भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों ने उठाई आवाज
नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने भारतीय सेना में नेपाली युवाओं की भर्ती फिर से शुरू करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। 12 अगस्त को इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल की ओर से आयोजित प्रदर्शन में सरकार को दो सूत्री ज्ञापन भी सौंपा गया। इसमें नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में अग्निपथ के तहत भर्ती शुरू करने की मांग प्रमुख थी।
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि भारतीय सेना में अग्निवीर के तौर पर चार साल की नौकरी भी नेपाल के युवाओं के लिए खाड़ी देशों में रोजगार की तुलना में बेहतर अवसर हो सकती है। यही वजह है कि अब यह मामला केवल भारत और नेपाल की सरकारों के बीच कूटनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नेपाल के पूर्व सैनिक और युवा भी सरकार पर फैसला लेने का दबाव बना रहे हैं।
200 साल से ज्यादा पुराना है गोरखाओं और भारतीय सेना का रिश्ता
भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का इतिहास 200 साल से भी अधिक पुराना है। एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती का सिलसिला शुरू हुआ। आजादी के बाद भी यह परंपरा जारी रही।
1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते ने गोरखा सैनिकों की भर्ती और सेवा से जुड़े ढांचे को नया आधार दिया। इसके बाद गोरखा रेजीमेंट भारतीय सेना का अहम हिस्सा बनीं। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसके कारण नेपाल में अग्निपथ के तहत भर्ती को केवल भारत की सामान्य सैन्य भर्ती व्यवस्था में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाता।
अग्निपथ पर नेपाल को क्या आपत्ति है?
भारत ने 14 जून 2022 को अग्निपथ योजना की घोषणा की थी। इस व्यवस्था के तहत अग्निवीरों की शुरुआती सेवा अवधि चार साल होती है। चार साल की सेवा पूरी होने के बाद करीब 25 फीसदी युवाओं को नियमित सैन्य सेवा में बनाए रखने का प्रावधान है, जबकि बाकी अग्निवीरों को सेवा निधि पैकेज के साथ आगे बढ़ना होता है।
यहीं से नेपाल की मुख्य आपत्ति शुरू होती है। पारंपरिक गोरखा भर्ती व्यवस्था में सैनिक लंबे समय तक सेना में सेवा कर सकते थे और उन्हें पेंशन समेत दीर्घकालिक सेवा लाभ मिलते थे। अग्निपथ का चार वर्षीय मॉडल इस व्यवस्था से काफी अलग है।
नेपाल में यह सवाल भी उठता रहा है कि 1947 के ऐतिहासिक ढांचे के बाद भर्ती और सेवा शर्तों में इतना बड़ा बदलाव किस तरह लागू किया जाए। इसी वजह से नेपाल ने अग्निपथ के तहत अपने नागरिकों की भर्ती को लेकर सहमति नहीं दी और प्रक्रिया 2022 से अटकी हुई है।
हर साल करीब 1400 नेपाली युवाओं को मिलता था मौका
भर्ती रुकने का असर नेपाल के उन परिवारों पर भी पड़ा है जिनके लिए भारतीय सेना रोजगार और सामाजिक सम्मान का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। रिपोर्टों के अनुसार, भर्ती रुकने से पहले हर साल करीब 1,400 नेपाली युवाओं के भारतीय सेना में शामिल होने की परंपरा थी।
अब पूर्व सैनिकों का कहना है कि लंबे समय तक भर्ती बंद रहने से युवाओं के सामने रोजगार के विकल्प सीमित हुए हैं। पोखरा में हुए प्रदर्शन में इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जल्द से जल्द गतिरोध दूर करने की मांग की है।
क्या भारतीय सेना पर भी पड़ा है इसका असर?
नेपाल से नई भर्ती रुकने के बावजूद भारतीय सेना ने अपनी मौजूदा गोरखा यूनिट्स को जारी रखा है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जनवरी 2025 में कहा था कि नए नेपाली गोरखा रंगरूटों की अनुपस्थिति से मौजूदा गोरखा बटालियनों की ऑपरेशनल तैयारी पर तत्काल असर नहीं पड़ा है।
हालांकि, अगर लंबे समय तक नेपाल से भर्ती नहीं होती है तो भविष्य में इन रेजीमेंटों की संरचना, पारंपरिक पहचान और मानव संसाधन की निरंतरता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। गोरखा रेजीमेंट में नेपाल से भर्ती का ऐतिहासिक महत्व देखते हुए यह मुद्दा दोनों देशों के लिए संवेदनशील बना हुआ है।
अब बालेन शाह सरकार के सामने क्या विकल्प हैं?
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के सामने इस मुद्दे पर आसान फैसला नहीं है। एक तरफ पूर्व गोरखा सैनिक और नेपाली युवा भर्ती प्रक्रिया दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ नेपाल की पुरानी चिंता यह है कि अग्निपथ की सेवा शर्तें पारंपरिक गोरखा भर्ती व्यवस्था से अलग हैं।
भारतीय पक्ष का रुख भी स्पष्ट है कि अब सेना में नई भर्ती के लिए अग्निपथ ही मानक व्यवस्था है। पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने भी अगस्त 2026 में कहा था कि नेपाली गोरखाओं की भर्ती का फैसला अब नेपाल को करना है और भारतीय सेना में भर्ती के लिए अग्निपथ ही रास्ता होगा।
ऐसे में बालेन शाह सरकार के पास मूल रूप से तीन रास्ते दिखाई देते हैं—भारत के साथ बातचीत कर अग्निपथ के तहत भर्ती पर सहमति बनाना, नेपाल की चिंताओं के समाधान के लिए कुछ विशेष व्यवस्था तलाशना, या मौजूदा गतिरोध को जारी रखना।
जनरल धीरज सेठ का दौरा क्यों अहम है?
भारतीय सेना प्रमुख का नेपाल दौरा इस पूरे मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण बना रहा है क्योंकि दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों की पुरानी परंपरा को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। जनरल धीरज सेठ ने बालेन शाह से मुलाकात की है और रक्षा सहयोग बढ़ाने के मुद्दे पर चर्चा की है। नेपाल की ओर से उन्हें मानद जनरल की उपाधि दिए जाने की परंपरा भी दोनों सेनाओं के बीच गहरे सैन्य संबंधों को दर्शाती है।
हालांकि, अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक ऐलान सामने नहीं आया है कि नेपाली युवाओं की अग्निपथ के तहत भारतीय सेना में भर्ती तत्काल शुरू होने जा रही है। इसलिए फिलहाल इसे गतिरोध खत्म करने की दिशा में बढ़ते दबाव और बातचीत के नए अवसर के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
क्या फिर शुरू होगी नेपाली गोरखाओं की भर्ती?
सबसे बड़ा सवाल यही है। मौजूदा घटनाक्रम से इतना जरूर स्पष्ट है कि नेपाल में भर्ती दोबारा शुरू करने की मांग अब तेज हो गई है। पूर्व सैनिक खुले तौर पर सरकार से फैसला लेने को कह रहे हैं और युवाओं के रोजगार का मुद्दा भी इससे जुड़ गया है।
लेकिन अंतिम फैसला नेपाल सरकार की सहमति और भारत-नेपाल के बीच होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा। अग्निपथ की चार वर्षीय सेवा व्यवस्था और 1947 के ऐतिहासिक गोरखा भर्ती ढांचे के बीच सामंजस्य बनाना इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी चुनौती है।
इसलिए जनरल धीरज सेठ का नेपाल दौरा और बालेन शाह सरकार पर बढ़ता घरेलू दबाव आने वाले दिनों में इस 200 साल पुराने सैन्य रिश्ते के अगले अध्याय के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।


