Success Story of Dr. Murali K. Divi: स्कूल की परीक्षा में असफल होना अक्सर लोगों को निराश कर देता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो असफलता को अपनी पहचान नहीं बनने देते। भारत के दिग्गज उद्योगपति और दिवीज लैबोरेटरीज के संस्थापक डॉ. मुरली के. डीवी ऐसी ही शख्सियत हैं। एक समय था जब वे 12वीं की परीक्षा में लगातार दो बार फेल हो गए थे। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में जन्मे इस युवक ने न केवल अपनी किस्मत बदली, बल्कि भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान भी दिलाई।
आज डॉ. मुरली डीवी भारत के सबसे धनी उद्योगपतियों में शामिल हैं। उनकी कंपनी दिवीज लैबोरेटरीज का बाजार पूंजीकरण लगभग ₹1.76 लाख करोड़ के आसपास पहुंच चुका है और उनकी व्यक्तिगत संपत्ति 10 अरब डॉलर से अधिक आंकी जाती है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, शिक्षा और दूरदृष्टि की ताकत का उदाहरण है।
गरीबी और संघर्ष में बीता बचपन
डॉ. मुरली के. डीवी का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। वे 13 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी और सीमित संसाधनों में ही सभी बच्चों की पढ़ाई और परवरिश होती थी। उनके पिता सरकारी सेवा से जुड़े थे, लेकिन इतने बड़े परिवार का खर्च उठाना आसान नहीं था। ग्रामीण परिवेश और सीमित अवसरों के बीच पले-बढ़े मुरली डीवी के सामने शुरुआत से ही कई चुनौतियां थीं। हालांकि परिवार ने शिक्षा का महत्व समझाया, लेकिन शुरुआती पढ़ाई में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
12वीं में दो बार असफल, फिर भी नहीं मानी हार
डॉ. डीवी की सफलता की कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू यह है कि वे 12वीं की परीक्षा में दो बार असफल रहे। इतना ही नहीं, फार्मेसी की पढ़ाई के दौरान भी उन्हें शुरुआती कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कई लोग ऐसी परिस्थितियों में पढ़ाई छोड़ देते हैं या आत्मविश्वास खो बैठते हैं। लेकिन मुरली डीवी ने अपनी कमियों पर काम किया। उन्होंने लगातार मेहनत की और बाद में बी.फार्मा तथा एम.फार्मा की पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने फार्मास्युटिकल साइंस में उच्च शिक्षा प्राप्त की और शोध के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बनाई। यह उपलब्धि बताती है कि शुरुआती असफलताएं भविष्य की सफलता को तय नहीं करतीं।
अमेरिका में सीखा वैश्विक फार्मा उद्योग का मॉडल
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद मुरली डीवी अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने करीब 15 वर्षों तक फार्मास्युटिकल उद्योग में काम किया। इस दौरान उन्हें रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और वैश्विक दवा बाजार की गहरी समझ मिली। अमेरिका में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि आने वाले वर्षों में दवा निर्माण के क्षेत्र में भारत बड़ी भूमिका निभा सकता है। उस समय भारतीय फार्मा उद्योग तेजी से विकसित हो रहा था, लेकिन वैश्विक स्तर पर उसकी उपस्थिति अभी सीमित थी। यहीं से उनके मन में भारत लौटकर अपना उद्योग स्थापित करने का विचार मजबूत हुआ।
भारत वापसी और दिवीज लैबोरेटरीज की नींव
भारत लौटने के बाद उन्होंने कुछ वर्षों तक फार्मा उद्योग में काम किया और उद्योग की जरूरतों को करीब से समझा। इसके बाद 12 अक्टूबर 1990 को उन्होंने हैदराबाद में दिविस रिसर्च सेंटर की स्थापना की, जो आगे चलकर दिवीज लैबोरेटरीज के रूप में विकसित हुई। शुरुआत में कंपनी का फोकस रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर था। कई वर्षों तक कंपनी ने केवल अनुसंधान और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर ध्यान दिया। यही रणनीति बाद में उसकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई। 1995 में कंपनी ने अपना पहला उत्पादन संयंत्र शुरू किया और धीरे-धीरे वैश्विक ग्राहकों के लिए एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट (API) का निर्माण शुरू किया।
क्या होता है API और क्यों महत्वपूर्ण है यह कारोबार?
जब कोई दवा बनाई जाती है तो उसका मुख्य सक्रिय तत्व API कहलाता है। यही वह घटक होता है जो दवा को प्रभावी बनाता है। दुनिया की अधिकांश बड़ी फार्मा कंपनियां API की आपूर्ति के लिए विशेष निर्माताओं पर निर्भर रहती हैं। दिवीज लैबोरेटरीज ने इसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। कंपनी ने उच्च गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और नियामकीय मानकों के पालन को अपनी पहचान बनाया। यही कारण है कि अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों की कई प्रमुख दवा कंपनियां इसके ग्राहक बनीं।
चीन को चुनौती देने वाली भारतीय कंपनी
पिछले दो दशकों में API उत्पादन के क्षेत्र में चीन का दबदबा रहा है। दुनिया के कई देश दवा निर्माण के लिए चीनी कंपनियों पर निर्भर रहे हैं। हालांकि कोविड-19 महामारी और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बाद कई देशों ने अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाने की रणनीति अपनाई। अमेरिका और यूरोप की कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने लगीं। इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ भारतीय कंपनियों को मिला और दिवीज लैबोरेटरीज इस अवसर का फायदा उठाने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल रही। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी की गुणवत्ता, नियामकीय अनुपालन और मजबूत उत्पादन क्षमता ने उसे वैश्विक ग्राहकों की पहली पसंद बनाया है।
शेयर बाजार में शानदार सफर
2003 में कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई। उस समय बहुत कम निवेशकों ने अनुमान लगाया होगा कि यह कंपनी आने वाले वर्षों में भारत की सबसे मूल्यवान फार्मा कंपनियों में शामिल हो जाएगी। आज कंपनी का बाजार पूंजीकरण लगभग ₹1.76 लाख करोड़ के आसपास है। इसके उत्पादन संयंत्र अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं और हजारों कर्मचारी इसके साथ जुड़े हुए हैं। कंपनी की एक और बड़ी खासियत यह है कि उसके राजस्व का बड़ा हिस्सा निर्यात से आता है। इससे उसे वैश्विक बाजार में स्थिरता और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलती है।
डॉ. मुरली डीवी की नेटवर्थ कितनी है?
फोर्ब्स की अरबपति सूची के अनुसार डॉ. मुरली डीवी की संपत्ति 10 अरब डॉलर से अधिक आंकी जाती है। भारतीय मुद्रा में यह राशि ₹83,000 करोड़ से ज्यादा बैठती है। इस संपत्ति के साथ वे भारत के शीर्ष अरबपतियों में शामिल हैं। हैदराबाद के सबसे धनी व्यक्तियों में भी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। हालांकि उनकी पहचान केवल एक अरबपति उद्योगपति के रूप में नहीं है। वे भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने वाले प्रमुख उद्यमियों में गिने जाते हैं।
सफलता से मिलने वाले बड़े सबक
डॉ. मुरली डीवी की कहानी कई महत्वपूर्ण सीख देती है। पहली सीख यह है कि किसी परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है। दूसरी सीख यह है कि ज्ञान और कौशल पर लगातार काम करने से परिस्थितियां बदली जा सकती हैं। तीसरी सीख यह है कि दीर्घकालिक सोच और गुणवत्ता पर फोकस किसी भी व्यवसाय को वैश्विक स्तर तक पहुंचा सकता है। आज जब युवा स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी और उद्यमिता की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब मुरली डीवी की कहानी बताती है कि रिसर्च आधारित उद्योग भी असाधारण सफलता दिला सकते हैं।
निष्कर्ष
13 भाई-बहनों वाले साधारण परिवार से निकलकर 12वीं में दो बार असफल होने वाले युवक का भारत के सबसे धनी उद्योगपतियों में शामिल होना किसी चमत्कार से कम नहीं है। डॉ. मुरली के. डीवी ने साबित किया कि सफलता का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार असफलताएं ही भविष्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों की नींव बनती हैं। आज दिवीज लैबोरेटरीज केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि भारतीय फार्मा उद्योग की वैश्विक ताकत का प्रतीक बन चुकी है। डॉ. मुरली डीवी की कहानी लाखों युवाओं को यह संदेश देती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर हो, तो कोई भी बाधा सफलता के रास्ते में स्थायी नहीं बन सकती।
Also Read:


