प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इटली दौरे के दौरान जब इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni को पार्ले की मशहूर मेलोडी टॉफी गिफ्ट की, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह साधारण सा तोहफा पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन जाएगा। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने न सिर्फ “मेलोडी इतनी चॉकोलेटी क्यों है?” वाली लाइन को फिर से ट्रेंड में ला दिया, बल्कि भारतीय FMCG ब्रांड्स की ग्लोबल ताकत को भी दुनिया के सामने दिखा दिया।
आज के दौर में जहां बड़े-बड़े ब्रांड अपने प्रोडक्ट्स के प्रमोशन के लिए फिल्म स्टार्स और स्पोर्ट्स आइकन पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, वहीं पार्ले प्रोडक्ट्स को यह प्रचार लगभग मुफ्त में मिल गया। यही वजह है कि मार्केटिंग एक्सपर्ट इसे भारत के सबसे बड़े “सॉफ्ट पावर मार्केटिंग मोमेंट्स” में से एक बता रहे हैं।
विले पार्ले की छोटी फैक्ट्री से शुरू हुई थी कहानी
पार्ले की शुरुआत साल 1929 में मुंबई के विले पार्ले इलाके से हुई थी। कंपनी की नींव मोहनलाल चौहान ने रखी थी। शुरुआती दौर में कंपनी सिर्फ टॉफियां और कैंडी बनाती थी। उस समय भारत में ज्यादातर कन्फेक्शनरी उत्पाद विदेशों से आते थे। ऐसे में पार्ले ने भारतीय बाजार के लिए स्वदेशी विकल्प तैयार करने की शुरुआत की।
इसके बाद कंपनी ने “पार्ले ग्लूको” बिस्किट लॉन्च किया, जिसे बाद में 1939 में नया नाम मिला — पार्ले-जी। धीरे-धीरे यह भारत का सबसे लोकप्रिय बिस्किट ब्रांड बन गया।
आज स्थिति यह है कि पार्ले-जी दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले ग्लूकोज बिस्किट ब्रांड्स में गिना जाता है। भारत के गांवों से लेकर विदेशों तक इसकी पहचान है।
कोरोना काल में पार्ले-जी बना था गरीबों का सहारा
पार्ले-जी सिर्फ एक बिस्किट नहीं रहा, बल्कि कई मौकों पर यह लोगों की जरूरत बनकर उभरा। कोरोना लॉकडाउन के दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए यह सबसे आसान और सस्ता भोजन साबित हुआ।
कम कीमत, लंबी शेल्फ लाइफ और आसानी से उपलब्ध होने की वजह से सरकारी एजेंसियों और NGOs ने भी राहत सामग्री में इसके लाखों पैकेट बांटे थे। यही कारण है कि पार्ले-जी भारतीय भावनाओं से जुड़ा हुआ ब्रांड बन चुका है।
कैसे अलग-अलग हिस्सों में बंट गया पार्ले समूह?
1970 के दशक में चौहान परिवार ने कारोबार को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया। इसके बाद पार्ले नाम से तीन प्रमुख कंपनियां सामने आईं—
1. पार्ले प्रोडक्ट्स
यह कंपनी बिस्किट और टॉफी कारोबार संभालती है। मेलोडी, पार्ले-जी, मोनैको, क्रैकजैक और हाइड एंड सीक जैसे ब्रांड इसी के पास हैं।
2. पार्ले एग्रो
यह कंपनी पेय पदार्थों के बिजनेस में है। फ्रूटी, ऐपी फिज और स्मूदी जैसे ब्रांड इसके पोर्टफोलियो में आते हैं।
3. बिसलेरी से जुड़ा कारोबार
बोतलबंद पानी के कारोबार में भी पार्ले नाम लंबे समय तक जुड़ा रहा।
हालांकि ये कंपनियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, लेकिन “पार्ले” नाम आज भी भारतीय FMCG सेक्टर में भरोसे का प्रतीक माना जाता है।
मोदी-मेलोनी मोमेंट ने मेलोडी को बना दिया इंटरनेशनल स्टार
इटली में मोदी और मेलोनी की मुलाकात पहले से ही सोशल मीडिया पर चर्चा में थी। दोनों नेताओं के बीच पहले भी वायरल तस्वीरें और वीडियो सामने आते रहे हैं। लेकिन इस बार जब पीएम मोदी ने मेलोडी टॉफी गिफ्ट की, तो यह एक बड़ा मार्केटिंग मोमेंट बन गया।
मेलोनी ने खुद इसका वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया। इसके बाद इंटरनेट पर मीम्स, पोस्ट्स और रील्स की बाढ़ आ गई। लाखों लोगों ने पहली बार मेलोडी ब्रांड के बारे में जाना।
मार्केटिंग की दुनिया में इसे “ऑर्गेनिक ग्लोबल ब्रांडिंग” कहा जाता है। यानी ऐसा प्रचार, जिसमें ब्रांड को विज्ञापन पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ा, लेकिन उसे करोड़ों लोगों तक पहुंच मिल गई।
स्टार्स लेते हैं करोड़ों रुपये
आज बड़े सेलिब्रिटी किसी ब्रांड का विज्ञापन करने के लिए भारी रकम लेते हैं।
- Shah Rukh Khan और Amitabh Bachchan जैसे सितारे एक बड़े विज्ञापन अभियान के लिए 5-15 करोड़ रुपये तक चार्ज करते हैं।
- Cristiano Ronaldo और Lionel Messi जैसे ग्लोबल स्टार्स किसी इंटरनेशनल ब्रांड प्रमोशन के लिए 100-200 करोड़ रुपये तक फीस लेते हैं।
- सिर्फ इंस्टाग्राम पोस्ट के लिए भी कई सेलिब्रिटी करोड़ों रुपये चार्ज करते हैं।
ऐसे समय में दो विश्व नेताओं द्वारा मेलोडी का जिक्र होना पार्ले के लिए किसी “गोल्डन मार्केटिंग कैंपेन” से कम नहीं माना जा रहा।
पार्ले को क्यों मिला सबसे बड़ा फायदा?
इस घटना से पार्ले को तीन बड़े फायदे मिल सकते हैं:
1. यूरोप में ब्रांड रिकॉल बढ़ेगा
मेलोडी पहले से 100 से ज्यादा देशों में मौजूद है, लेकिन यूरोपीय देशों में इसकी पहचान सीमित थी। अब यह तेजी से बढ़ सकती है।
2. युवा ऑडियंस के बीच वायरलिटी
Gen-Z और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच मीम कल्चर की वजह से ब्रांड की नई पहचान बन रही है।
3. भारतीय ब्रांड्स की सॉफ्ट पावर मजबूत
जिस तरह जापान की किटकैट या कोरिया के फूड ब्रांड्स ग्लोबल पॉप कल्चर का हिस्सा बने, उसी तरह भारतीय FMCG ब्रांड्स भी अब इंटरनेशनल चर्चा में आ रहे हैं।
शेयर बाजार में भी दिखा असर
दिलचस्प बात यह रही कि इस खबर के बाद एक अलग लिस्टेड कंपनी Parle Industries Limited के शेयरों में अपर सर्किट लग गया। हालांकि इसका मुख्य कारोबार मेलोडी या पार्ले प्रोडक्ट्स से जुड़ा नहीं है, लेकिन निवेशकों ने नाम की वजह से खरीदारी शुरू कर दी।
यह दिखाता है कि सोशल मीडिया और वायरल ब्रांड मोमेंट्स अब शेयर बाजार की भावनाओं को भी प्रभावित करने लगे हैं।
“मेलोडी इतनी चॉकोलेटी क्यों है?” फिर हुआ वायरल
1980 और 1990 के दशक में टीवी पर आने वाला मेलोडी का विज्ञापन भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुका था। उसका मशहूर टैगलाइन—
“मेलोडी इतनी चॉकोलेटी क्यों है?”
आज भी लोगों की यादों में ताजा है।
मोदी-मेलोनी वीडियो के बाद यही लाइन फिर से सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी। यही किसी भी पुराने ब्रांड की सबसे बड़ी ताकत होती है—नॉस्टेल्जिया।
भारत की सॉफ्ट पावर का नया उदाहरण
यह सिर्फ एक टॉफी का मामला नहीं है। यह उस बदलते भारत की कहानी है, जहां भारतीय उत्पाद अब ग्लोबल मंच पर पहचान बना रहे हैं। जिस मेलोडी टॉफी का जन्म मुंबई की एक फैक्ट्री में हुआ था, वही आज अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की चर्चा का हिस्सा बन गई है। मार्केटिंग एक्सपर्ट मानते हैं कि पार्ले को मिला यह प्रचार पैसे से खरीदना लगभग असंभव था।
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