मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बीच सरकारी तेल कंपनी Bharat Petroleum Corporation Limited (BPCL) ने अपनी कच्चे तेल की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी ने रूस से कच्चे तेल का आयात तेजी से बढ़ाया है, जिससे अब उसके कुल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी करीब 41 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
तेल बाजार में लगातार बढ़ती अस्थिरता, शिपिंग रूट्स पर खतरे और पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात के बीच भारत की तेल कंपनियां अब सप्लाई सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता मान रही हैं। यही वजह है कि बीपीसीएल ने सिर्फ रूस ही नहीं बल्कि अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल खरीद बढ़ा दी है।
रूस बना BPCL का सबसे बड़ा सप्लायर
बीपीसीएल के डायरेक्टर फाइनेंस वीआरके गुप्ता के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी के कुल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 41 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बदलाव काफी बड़ा माना जा रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में रूसी तेल की हिस्सेदारी केवल 25 प्रतिशत थी। यानी महज दो तिमाहियों में कंपनी ने रूस से तेल आयात में जबरदस्त बढ़ोतरी की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से मिलने वाला डिस्काउंटेड क्रूड भारतीय कंपनियों के लिए अभी भी काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस एशियाई बाजारों को आकर्षक कीमतों पर तेल बेच रहा है और भारत इसका सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है।
मध्य पूर्व संकट ने बढ़ाई चिंता
मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक क्षेत्र रहा है। लेकिन हाल के महीनों में ईरान, इजरायल और अन्य क्षेत्रीय संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं तो दुनिया की तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऐसे संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय तेल कंपनियां अब “स्रोतों में विविधता” यानी diversification strategy पर तेजी से काम कर रही हैं।
अमेरिका और वेनेजुएला से भी खरीद
बीपीसीएल ने साफ किया है कि कंपनी सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं रहना चाहती। कंपनी अमेरिका और वेनेजुएला जैसे देशों से भी लगातार तेल खरीद रही है।
वीआरके गुप्ता ने कॉन्फ्रेंस कॉल में बताया कि कंपनी ने इस साल कच्चे तेल के आठ नए ग्रेड शामिल किए हैं, जो चार अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से आते हैं। इससे कंपनी को सप्लाई जोखिम कम करने में मदद मिलेगी। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, यह रणनीति इसलिए अहम है क्योंकि किसी एक क्षेत्र में युद्ध या प्रतिबंध लगने पर कंपनी के पास वैकल्पिक सप्लाई चैन मौजूद रहेगी।
जुलाई 2026 तक सप्लाई सुरक्षित
बीपीसीएल प्रबंधन ने यह भी कहा कि जुलाई 2026 तक के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली गई है। ऐसे समय में जब वैश्विक बाजार में तेल कीमतों को लेकर भारी अनिश्चितता बनी हुई है, यह बयान निवेशकों और बाजार के लिए राहत भरा माना जा रहा है।
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व संकट और गहराता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच सकती हैं। इसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और रुपये पर भी दिखाई दे सकता है।
BPCL ने बढ़ाया कैपेक्स
बीपीसीएल ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 25,000 करोड़ रुपये के पूंजीगत खर्च (Capex) का लक्ष्य रखा है। यह पिछले वित्त वर्ष के 20,400 करोड़ रुपये के मुकाबले काफी अधिक है।
कंपनी इस निवेश का उपयोग रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने, पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट्स, गैस कारोबार और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स में करने की तैयारी कर रही है। सरकारी तेल कंपनियां अब धीरे-धीरे पारंपरिक ईंधन के साथ-साथ ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) पर भी फोकस बढ़ा रही हैं। आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन हाइड्रोजन और बायोफ्यूल सेक्टर में भी निवेश बढ़ने की संभावना है।
कैसे रहे BPCL के तिमाही नतीजे?
बीपीसीएल ने मार्च तिमाही में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है। कंपनी का कंसोलिडेटेड मुनाफा सालाना आधार पर 28 प्रतिशत बढ़कर 5,624.54 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल समान तिमाही में कंपनी का मुनाफा 4,391.83 करोड़ रुपये था।
हालांकि तिमाही आधार पर कंपनी के मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में कंपनी का मुनाफा 7,188.40 करोड़ रुपये था, जिसके मुकाबले मार्च तिमाही में करीब 22 प्रतिशत की कमी आई है।
विश्लेषकों के मुताबिक, ग्लोबल क्रूड प्राइस में उतार-चढ़ाव और मार्केटिंग मार्जिन में बदलाव का असर कंपनी की कमाई पर दिखाई दिया है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह रणनीति?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। ऐसे में किसी भी वैश्विक संकट का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर तेल कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो: पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ सकती है, महंगाई में तेजी आ सकती है, रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है
इसी वजह से भारत अब तेल आयात के लिए एक ही क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते कर रहा है।
क्या कहते हैं बाजार विशेषज्ञ?
ऊर्जा बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से सस्ता तेल खरीदना फिलहाल भारतीय कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है। इससे कंपनियों की refining margins बेहतर रहती हैं और घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
हालांकि भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी बड़ा खतरा बने हुए हैं। अगर पश्चिमी देशों ने रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाए या मिडिल ईस्ट संकट गहरा गया, तो भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा बड़ी चुनौती बन सकती है।
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