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Reading: नगर सेठ से जगत सेठ तक..! 200 साल पहले इस भारतीय परिवार के पास था बैंक ऑफ इंग्लैंड से ज्यादा पैसा
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नगर सेठ से जगत सेठ तक..! 200 साल पहले इस भारतीय परिवार के पास था बैंक ऑफ इंग्लैंड से ज्यादा पैसा

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 11:30 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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भारत में जब बैंकिंग सिस्टम नहीं था, तब देश की अर्थव्यवस्था बड़े साहूकार घरानों और व्यापारिक परिवारों के भरोसे चलती थी। 18वीं शताब्दी में एक ऐसा ही परिवार था, जिसकी दौलत और प्रभाव इतना विशाल था कि उसे “जगत सेठ” यानी “दुनिया का बैंकर” कहा जाने लगा। यह परिवार सिर्फ बंगाल के नवाबों का खजांची ही नहीं था, बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी तक को कर्ज देता था। कई इतिहासकारों का दावा है कि उस दौर में इस परिवार के पास ब्रिटेन के बैंक ऑफ इंग्लैंड से भी ज्यादा धन-संपत्ति थी।

Contents
राजस्थान से शुरू हुई थी कहानीकैसे मिली ‘नगर सेठ’ और ‘जगत सेठ’ की उपाधिबंगाल के नवाबों का खजांची था यह परिवारहुंडी सिस्टम से चलती थी पूरी अर्थव्यवस्थाईस्ट इंडिया कंपनी भी लेती थी कर्जबैंक ऑफ इंग्लैंड से ज्यादा थी दौलत?प्लासी की लड़ाई और बदलती किस्मतधीरे-धीरे खत्म हो गया साम्राज्यआज भी मौजूद है इतिहास की आखिरी निशानीभारत की आर्थिक ताकत की मिसाल था जगत सेठ परिवार

आज भले ही यह नाम इतिहास के पन्नों तक सीमित हो चुका हो, लेकिन कभी जगत सेठ परिवार भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था।


राजस्थान से शुरू हुई थी कहानी

जगत सेठ परिवार की जड़ें राजस्थान के नागौर क्षेत्र से जुड़ी थीं। यह एक मारवाड़ी जैन व्यापारी परिवार था। परिवार के सदस्य हीरानंद साहू व्यापार के सिलसिले में बिहार के पटना पहुंचे थे। उस समय पटना व्यापार और वित्त का बड़ा केंद्र माना जाता था।

धीरे-धीरे परिवार ने साहूकारी और व्यापार का विस्तार शुरू किया। हीरानंद साहू के बेटे माणिक चंद ने कारोबार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने ढाका और बाद में बंगाल की नई राजधानी मुर्शिदाबाद में व्यापारिक नेटवर्क तैयार किया। उस दौर में मुर्शिदाबाद भारत के सबसे समृद्ध शहरों में गिना जाता था। बंगाल की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत थी कि यूरोपीय कंपनियां भी यहां व्यापार के लिए प्रतिस्पर्धा करती थीं।


कैसे मिली ‘नगर सेठ’ और ‘जगत सेठ’ की उपाधि

माणिक चंद की आर्थिक ताकत और प्रभाव को देखते हुए मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने साल 1712 में उन्हें “नगर सेठ” की उपाधि दी। उस समय नगर सेठ का मतलब किसी शहर का सबसे बड़ा व्यापारी और वित्तीय प्रमुख होता था।

1714 में माणिक चंद की मृत्यु के बाद उनके भतीजे और गोद लिए बेटे फतेह चंद ने कारोबार संभाला। फतेह चंद की व्यापारिक क्षमता और वित्तीय ताकत इतनी ज्यादा थी कि मुगल सम्राट मोहम्मद शाह ने 1723 में उन्हें “जगत सेठ” की उपाधि से सम्मानित किया। यहीं से यह परिवार इतिहास में “जगत सेठ” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।


बंगाल के नवाबों का खजांची था यह परिवार

18वीं शताब्दी में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रांत माना जाता था। बंगाल के नवाबों के खजाने और टैक्स व्यवस्था का बड़ा हिस्सा जगत सेठ परिवार के नियंत्रण में था।

यह परिवार: टैक्स कलेक्शन करता था, व्यापारियों को कर्ज देता था, शाही खजाना संभालता था, बड़े व्यापारिक सौदों का वित्तपोषण करता था. इतिहासकारों के अनुसार, बंगाल के नवाब भी कई बार वित्तीय जरूरतों के लिए इस परिवार पर निर्भर रहते थे।


हुंडी सिस्टम से चलती थी पूरी अर्थव्यवस्था

आज जिस तरह बैंकिंग सिस्टम और डिजिटल पेमेंट काम करते हैं, उस दौर में “हुंडी” का इस्तेमाल होता था। हुंडी एक तरह का वित्तीय दस्तावेज था, जिसके जरिए दूर-दराज के शहरों में सुरक्षित तरीके से पैसा ट्रांसफर किया जाता था।

जगत सेठ परिवार का पूरे भारत में इतना मजबूत नेटवर्क था कि उनकी हुंडी को लोग बिना किसी संदेह के स्वीकार कर लेते थे। दिल्ली, पटना, मुर्शिदाबाद, बनारस और सूरत जैसे व्यापारिक शहरों में इस परिवार का वित्तीय प्रभाव था।


ईस्ट इंडिया कंपनी भी लेती थी कर्ज

जगत सेठ परिवार की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनसे कर्ज लेती थी। कई ब्रिटिश दस्तावेजों और इतिहासकारों के लेखों में उल्लेख मिलता है कि कंपनी: सोना-चांदी खरीदने, व्यापारिक विस्तार, सैन्य खर्च के लिए जगत सेठ परिवार की मदद लेती थी।

ब्रिटिश इतिहासकार रॉबर्ट ओर्मे ने अपने लेखों में इस परिवार को मुगल भारत का सबसे धनी व्यापारी घराना बताया है।


बैंक ऑफ इंग्लैंड से ज्यादा थी दौलत?

कई इतिहासकारों का मानना है कि 18वीं शताब्दी में जगत सेठ परिवार की संपत्ति ब्रिटेन के बैंक ऑफ इंग्लैंड से भी अधिक थी। हालांकि उस दौर के सटीक वित्तीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इतिहासकार इस परिवार की आर्थिक शक्ति को असाधारण बताते हैं।

उस समय: बंगाल दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में था, भारत वैश्विक व्यापार का बड़ा केंद्र था. कपड़ा, मसाले और धातु व्यापार से भारी कमाई होती थी इसी आर्थिक ताकत का फायदा जगत सेठ परिवार को मिला।


प्लासी की लड़ाई और बदलती किस्मत

इतिहास में जगत सेठ परिवार का नाम प्लासी की लड़ाई से भी जुड़ता है। 1757 में नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए संघर्ष के दौरान कई बड़े व्यापारिक घरानों ने अंग्रेजों का समर्थन किया था।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जगत सेठ परिवार ने भी अंग्रेजों का साथ दिया था क्योंकि वे नवाब सिराजुद्दौला की नीतियों से खुश नहीं थे। प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल पर अंग्रेजों की पकड़ मजबूत होती गई और धीरे-धीरे भारत की आर्थिक व्यवस्था बदलने लगी।


धीरे-धीरे खत्म हो गया साम्राज्य

अंग्रेजों के शासन के विस्तार के साथ पारंपरिक भारतीय साहूकार और व्यापारिक घरानों की ताकत कमजोर होने लगी। नई बैंकिंग व्यवस्था और ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के कारण जगत सेठ परिवार का प्रभाव भी घटता चला गया। 19वीं शताब्दी के अंत तक यह परिवार सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हो चुका था।


आज भी मौजूद है इतिहास की आखिरी निशानी

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में आज भी जगत सेठ परिवार की हवेली मौजूद है। हजादुआरी पैलेस के पास स्थित यह भवन अब एक म्यूजियम में बदल चुका है। यह म्यूजियम उस दौर की: पुरानी मुद्राएं, व्यापारिक दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड, पारिवारिक इतिहास को संजोकर रखता है।


भारत की आर्थिक ताकत की मिसाल था जगत सेठ परिवार

जगत सेठ परिवार की कहानी सिर्फ एक अमीर घराने की कहानी नहीं है। यह उस दौर की भारतीय आर्थिक ताकत का भी प्रतीक है, जब भारत वैश्विक व्यापार और वित्त का बड़ा केंद्र हुआ करता था।

आज जब भारत डिजिटल बैंकिंग और फिनटेक क्रांति की बात करता है, तब यह इतिहास याद दिलाता है कि भारतीय व्यापारिक और वित्तीय व्यवस्था सदियों पहले भी दुनिया में बेहद मजबूत मानी जाती थी।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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