Maharatna Companies in India: भारत की सरकारी कंपनियों को आपने अक्सर महारत्न, नवरत्न और मिनीरत्न जैसे दर्जे के साथ सुना होगा। इनमें ‘महारत्न’ सबसे ऊंची श्रेणी मानी जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि देश में महारत्न कैटेगरी की शुरुआत कब हुई, सबसे पहले किन कंपनियों को यह दर्जा मिला और आखिर इस पूरी व्यवस्था के पीछे किसका दिमाग था?
महारत्न का दर्जा केवल किसी सरकारी कंपनी को दिया जाने वाला सम्मान नहीं है। इसका असली मकसद बड़ी और बेहतर प्रदर्शन करने वाली सरकारी कंपनियों को ज्यादा वित्तीय और परिचालन स्वायत्तता देना है, ताकि वे बड़े निवेश, रणनीतिक साझेदारी और देश-विदेश में विस्तार से जुड़े फैसले तेजी से ले सकें।
सरकार ने महारत्न योजना को फरवरी 2010 में लागू किया था। इसका उद्देश्य बड़ी Navratna कंपनियों के बोर्ड को अतिरिक्त अधिकार देकर उन्हें घरेलू और वैश्विक बाजार में विस्तार के लिए सक्षम बनाना था।
Highlights
- महारत्न भारत की सबसे ऊंची CPSE कैटेगरी है
- योजना फरवरी 2010 में लागू की गई थी
- IOC, NTPC, ONGC और SAIL शुरुआती महारत्न कंपनियों में शामिल थीं
- महारत्न बनने के लिए बड़े कारोबार, नेटवर्थ और मुनाफे के मानक जरूरी हैं
- मौजूदा सूची में 14 महारत्न CPSE शामिल हैं
महारत्न कैटेगरी क्या है?
भारत सरकार की Central Public Sector Enterprises यानी CPSEs को उनके प्रदर्शन, आकार और कारोबारी क्षमता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है। महारत्न इनमें सबसे ऊंची श्रेणी है।
इस दर्जे का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कंपनी के बोर्ड को सामान्य सरकारी कंपनियों की तुलना में कई अहम कारोबारी फैसलों में ज्यादा अधिकार मिलते हैं। इससे कंपनियां बड़े निवेश, ज्वाइंट वेंचर, रणनीतिक गठजोड़, अधिग्रहण और अंतरराष्ट्रीय विस्तार जैसे फैसलों पर तेजी से काम कर सकती हैं।
Department of Public Enterprises यानी DPE इन कंपनियों से जुड़ी नीतियों और दिशानिर्देशों के लिए प्रमुख सरकारी विभाग है। DPE फिलहाल वित्त मंत्रालय के तहत काम करता है।
भारत में महारत्न योजना कब शुरू हुई?
महारत्न योजना की शुरुआत का फैसला दिसंबर 2009 में किया गया था और इसके बाद फरवरी 2010 में योजना को औपचारिक रूप से लागू किया गया। DPE की आधिकारिक वेबसाइट पर भी महारत्न योजना की शुरुआत से जुड़ा दस्तावेज फरवरी 2010 का उपलब्ध है।
इस योजना के पीछे मूल सोच यह थी कि जो सरकारी कंपनियां पहले से ही बड़े स्तर पर कारोबार कर रही हैं और अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें हर बड़े कारोबारी फैसले के लिए सरकार की अनुमति पर निर्भर न रहना पड़े।
यानी सरकार ऐसी कंपनियों को केवल सरकारी संस्थान के तौर पर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाली बड़ी कंपनियों के रूप में विकसित करना चाहती थी।
भारत की पहली महारत्न कंपनियां कौन थीं?
महारत्न व्यवस्था के शुरुआती दौर में जिन चार बड़ी सरकारी कंपनियों को यह दर्जा मिला, उनमें शामिल थीं:
- इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL)
- नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (NTPC)
- ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ONGC)
- स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL)
इन कंपनियों का चयन उनकी बड़ी कारोबारी क्षमता, रणनीतिक महत्व, वित्तीय प्रदर्शन और विस्तार की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था।
बाद में BHEL, BPCL, Coal India, GAIL और दूसरी बड़ी सरकारी कंपनियां भी इस श्रेणी में शामिल होती गईं।
आखिर ‘महारत्न’ का आइडिया किसका था?
यह सवाल काफी दिलचस्प है कि आखिर महारत्न जैसी कैटेगरी बनाने का विचार किस व्यक्ति के दिमाग से आया था?
इसका जवाब किसी एक नेता या अधिकारी के नाम से देना सही नहीं होगा। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार महारत्न योजना एक संस्थागत सरकारी नीति के तौर पर विकसित हुई थी। इसका ढांचा और इससे जुड़े नियम Department of Public Enterprises (DPE) की नीति प्रक्रिया के तहत तैयार हुए और केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी दी।
DPE का काम ही CPSEs की कार्यप्रणाली, प्रदर्शन और स्वायत्तता से जुड़ी नीतियां तैयार करना है। इसलिए महारत्न योजना को किसी एक व्यक्ति की ‘दिमागी उपज’ बताने के बजाय सरकार और DPE की नीति पहल कहना ज्यादा सटीक है।
इसका व्यापक उद्देश्य था कि बेहतर प्रदर्शन करने वाली सरकारी कंपनियों को ज्यादा Managerial और Commercial Autonomy मिले और वे तेजी से कारोबारी फैसले ले सकें।
महारत्न दर्जा देने की जरूरत क्यों पड़ी?
सरकारी कंपनियों में एक बड़ी चुनौती यह रही है कि कई महत्वपूर्ण कारोबारी फैसलों में सरकारी प्रक्रियाओं और मंजूरियों के कारण समय लग सकता है। दूसरी तरफ वैश्विक कंपनियां बाजार में बदलाव के अनुसार तेजी से फैसले लेती हैं।
ऐसे में सरकार ने सोचा कि जो CPSE पहले से मजबूत हैं, उन्हें ज्यादा अधिकार दिए जाएं।
महारत्न योजना का मकसद मुख्य रूप से तीन स्तरों पर देखा जा सकता है—
पहला, कंपनियों को बड़े निवेश के फैसले लेने में ज्यादा स्वतंत्रता देना।
दूसरा, भारतीय सरकारी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में विस्तार करने के लिए सक्षम बनाना।
तीसरा, उन्हें वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने लायक बनाना।
यही वजह है कि महारत्न का दर्जा केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं है, बल्कि इसके साथ वास्तविक वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार भी जुड़े हैं।
अभी भारत में कितनी महारत्न कंपनियां हैं?
सरकारी रिकॉर्ड में महारत्न CPSEs की सूची समय के साथ बढ़ती रही है। हालिया सरकारी दस्तावेजों में 14 महारत्न कंपनियां सूचीबद्ध हैं।
| क्रम | महारत्न कंपनी | स्थापना वर्ष |
|---|---|---|
| 1 | भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) | 1964 |
| 2 | भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) | 1952 |
| 3 | कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) | 1975 |
| 4 | गेल (इंडिया) लिमिटेड (GAIL) | 1984 |
| 5 | हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) | 1974 |
| 6 | इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) | 1959 |
| 7 | नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (NTPC) | 1975 |
| 8 | ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ONGC) | 1956 |
| 9 | पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (PFC) | 1986 |
| 10 | पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (POWERGRID) | 1989 |
| 11 | स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) | 1954 |
| 12 | ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड (REC) | 1969 |
| 13 | ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) | 1959 |
| 14 | हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) | 1964 |
महारत्न बनने पर क्या फायदे मिलते हैं?
महारत्न कंपनियों को सबसे बड़ा फायदा बोर्ड स्तर पर बढ़ी हुई वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता का मिलता है।
सरकारी दिशानिर्देशों के तहत महारत्न CPSEs को ज्वाइंट वेंचर और सहायक कंपनियों से जुड़े निवेश, विलय-अधिग्रहण, तकनीकी साझेदारी और संगठनात्मक पुनर्गठन जैसे मामलों में अतिरिक्त अधिकार दिए गए हैं।
इसके अलावा बोर्ड को मानव संसाधन से जुड़े कई फैसले लेने की भी ज्यादा स्वतंत्रता मिलती है।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार महारत्न CPSEs को एक परियोजना में निवेश के लिए ₹5,000 करोड़ तक या संबंधित CPSE की नेटवर्थ के 15 प्रतिशत तक, जो भी कम हो, की सीमा के भीतर अधिकार दिए गए हैं। सभी परियोजनाओं को मिलाकर संबंधित निवेश की कुल सीमा नेटवर्थ के 30 प्रतिशत तक बताई गई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि महारत्न कंपनियों को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से बाहर कर दिया जाता है। उनके बोर्ड को दिए गए अधिकार भी निर्धारित नियमों और व्यापक सरकारी नीतियों के अधीन होते हैं।
महारत्न कंपनी बनने के लिए क्या क्राइटेरिया है?
हर सरकारी कंपनी को सीधे महारत्न का दर्जा नहीं मिल सकता। इसके लिए कई कड़े वित्तीय और परिचालन मानदंड तय किए गए हैं।
सरकारी दिशानिर्देशों के मुताबिक किसी CPSE को महारत्न के लिए पात्र होने के लिए:
- उसके पास पहले से Navratna का दर्जा होना चाहिए।
- कंपनी भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध होनी चाहिए और SEBI के नियमों के मुताबिक न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी की शर्त पूरी करनी चाहिए।
- पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक टर्नओवर ₹25,000 करोड़ से ज्यादा होना चाहिए।
- पिछले तीन वर्षों की औसत वार्षिक नेटवर्थ ₹15,000 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए।
- पिछले तीन वर्षों का औसत वार्षिक नेट प्रॉफिट ₹5,000 करोड़ से ज्यादा होना चाहिए।
- कंपनी की महत्वपूर्ण वैश्विक मौजूदगी या अंतरराष्ट्रीय कारोबार होना चाहिए।
ये शर्तें इसीलिए रखी गई हैं ताकि महारत्न का दर्जा केवल उन्हीं सरकारी कंपनियों को मिले जिनके पास बड़े पैमाने पर कारोबार संभालने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की वास्तविक क्षमता हो।
देश की अर्थव्यवस्था में क्या है इन कंपनियों का योगदान?
महारत्न कंपनियां ऊर्जा, तेल-गैस, बिजली, कोयला, स्टील, रक्षा और वित्त जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में काम करती हैं। इसलिए इनका प्रदर्शन केवल शेयर बाजार या कंपनी के मुनाफे तक सीमित नहीं रहता।
इन कंपनियों के बड़े निवेश से बिजली उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, औद्योगिक उत्पादन और रोजगार जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ता है।
यही वजह है कि महारत्न योजना का अंतिम उद्देश्य सिर्फ सरकारी कंपनियों को ज्यादा अधिकार देना नहीं, बल्कि देश की बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को मजबूत बनाकर भारत की आर्थिक और रणनीतिक क्षमता बढ़ाना है।
निष्कर्ष
भारत की महारत्न व्यवस्था को करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय हो चुका है। इसकी शुरुआत उस सोच के साथ हुई थी कि बड़ी और बेहतर प्रदर्शन करने वाली सरकारी कंपनियों को फैसले लेने में ज्यादा स्वतंत्रता दी जाए। IOC, NTPC, ONGC और SAIL जैसी शुरुआती कंपनियों से शुरू हुई यह व्यवस्था अब 14 महारत्न CPSEs तक पहुंच चुकी है।
इसलिए अगर सवाल हो कि ‘महारत्न का आइडिया किसके दिमाग की उपज था?’, तो इसका सबसे सटीक जवाब यही है कि यह किसी एक व्यक्ति की योजना नहीं, बल्कि भारत सरकार और Department of Public Enterprises की संस्थागत नीति पहल थी, जिसका लक्ष्य भारतीय सरकारी कंपनियों को बड़े पैमाने पर कारोबार करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरने के लिए अधिक सक्षम बनाना था।


