गर्मी के मौसम में लीची सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले फलों में शामिल होती है। पानी से भरपूर होने के कारण इसे शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखने वाला फल माना जाता है। यही वजह है कि मई-जून आते ही बाजारों में लीची की मांग तेजी से बढ़ जाती है। लेकिन इस बार देश के कई शहरों में लीची की कीमतें पिछले साल की तुलना में काफी अधिक देखने को मिल रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा लीची उत्पादक देश है, तो फिर आम लोगों को यह फल इतनी महंगी कीमत पर क्यों खरीदना पड़ रहा है?
दरअसल, इसके पीछे सिर्फ एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं। उत्पादन में गिरावट, बढ़ती घरेलू मांग, कमजोर कोल्ड चेन नेटवर्क और सीमित निर्यात क्षमता ने मिलकर लीची की कीमतों को ऊपर पहुंचा दिया है। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. बिकास दास ने इस पूरे मामले पर विस्तार से जानकारी दी है।
भारत में कितना होता है लीची उत्पादन?
भारत लंबे समय से दुनिया के प्रमुख लीची उत्पादक देशों में शामिल रहा है। चीन के बाद भारत का स्थान दूसरे नंबर पर माना जाता है। सामान्य तौर पर देश में हर साल करीब 7.2 लाख से 8 लाख टन तक लीची का उत्पादन होता रहा है। हालांकि पिछले साल मौसम में बदलाव और कई क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित होने के कारण कुल पैदावार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
डॉ. बिकास दास के मुताबिक, बीते साल देशभर में करीब 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती हुई और कुल उत्पादन लगभग 5 लाख टन के आसपास रहा। यानी सामान्य उत्पादन की तुलना में काफी कमी दर्ज की गई। यही गिरावट इस साल बाजार में कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजहों में से एक मानी जा रही है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा होती है लीची की खेती?
भारत में लीची उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बिहार है। खासकर मुजफ्फरपुर की लीची देशभर में प्रसिद्ध है। यहां की शाही लीची को जीआई टैग भी मिल चुका है। पिछले साल बिहार में करीब 1 लाख 36 हजार टन लीची का उत्पादन हुआ, जिससे यह देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बना रहा।
इसके अलावा पंजाब में भी हाल के वर्षों में लीची उत्पादन तेजी से बढ़ा है। आंकड़ों के अनुसार पंजाब में करीब 75 हजार टन उत्पादन दर्ज किया गया। पश्चिम बंगाल में लगभग 73 हजार टन लीची पैदा हुई। इसके बाद झारखंड में 63 हजार टन, असम में 62 हजार टन और छत्तीसगढ़ में करीब 61 हजार टन उत्पादन हुआ।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और असामान्य गर्मी का असर इस बार फलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों पर पड़ा है। कई क्षेत्रों में समय से पहले गर्मी बढ़ने से फल छोटे रह गए और पैदावार घट गई।
भारत इतना उत्पादन करता है, फिर निर्यात इतना कम क्यों?
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा लीची उत्पादक देश होने के बावजूद भारत का लीची निर्यात बेहद कम है। पिछले साल भारत ने केवल लगभग 25 करोड़ रुपये की लीची का निर्यात किया। यह आंकड़ा उत्पादन के मुकाबले बेहद छोटा माना जाता है।
डॉ. बिकास दास के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह लीची की बेहद कम शेल्फ लाइफ है। सामान्य परिस्थितियों में लीची अधिकतम दो दिन तक ही ताजा रह पाती है। यही कारण है कि इसे लंबी दूरी तक भेजना आसान नहीं होता।
भारत में अभी भी आधुनिक कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर सीमित है। कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट और प्रोसेसिंग सुविधाओं की कमी के कारण भारत मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट के सीमित बाजारों तक ही लीची निर्यात कर पाता है। यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में निर्यात के लिए बेहद सख्त क्वालिटी और फूड सेफ्टी नियम होते हैं, जिन्हें पूरा करना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
घरेलू मांग क्यों बढ़ रही है?
भारत में पिछले कुछ वर्षों में फलों की खपत तेजी से बढ़ी है। हेल्थ कॉन्शियस लोगों की संख्या बढ़ने और गर्मी में प्राकृतिक हाइड्रेशन वाले फलों की मांग बढ़ने से लीची की खपत भी बढ़ी है। इसके अलावा ऑनलाइन ग्रोसरी प्लेटफॉर्म और क्विक कॉमर्स कंपनियों के जरिए अब छोटे शहरों तक भी प्रीमियम फलों की पहुंच बढ़ गई है।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में इस बार लीची की कीमत कई जगह 180 से 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। पिछले साल यही कीमत कई बाजारों में 100 से 140 रुपये प्रति किलो के बीच थी।
इस साल लीची महंगी होने की बड़ी वजहें
1. उत्पादन में गिरावट
इस बार कई राज्यों में मौसम अनुकूल नहीं रहा, जिससे उत्पादन घटा। कम सप्लाई का सीधा असर कीमतों पर पड़ा।
2. बढ़ती मांग
गर्मी बढ़ने के साथ बाजार में लीची की मांग तेजी से बढ़ी, जबकि सप्लाई सीमित रही।
3. कोल्ड चेन की कमी
उत्पादन वाले क्षेत्रों से बड़े शहरों तक लीची पहुंचाने में नुकसान ज्यादा होता है। इससे ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है।
4. जल्दी खराब होने वाला फल
कम शेल्फ लाइफ के कारण व्यापारी भी जोखिम को देखते हुए ऊंचे दाम रखते हैं।
5. एक्सपोर्ट और प्रीमियम मार्केट
हालांकि निर्यात सीमित है, लेकिन प्रीमियम क्वालिटी लीची बड़े शहरों और विदेशी बाजारों में अधिक दाम पर बिकती है, जिससे घरेलू कीमतें भी प्रभावित होती हैं।
क्या आगे और बढ़ सकती हैं कीमतें?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अगले कुछ हफ्तों में सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो प्रमुख शहरों में लीची की कीमतें और बढ़ सकती हैं। खासकर प्रीमियम वैरायटी की मांग बनी रहने से खुदरा बाजार में कीमतें ऊंची रह सकती हैं।
हालांकि जून के मध्य तक कुछ राज्यों में नई खेप आने से बाजार में थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन फिलहाल उत्पादन में कमी और बढ़ती मांग के कारण लीची आम उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
भारत के लिए क्या है सबसे बड़ी चुनौती?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती लीची के लिए मजबूत कोल्ड चेन नेटवर्क तैयार करना है। अगर आधुनिक स्टोरेज, प्रोसेसिंग और निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाता है, तो भारत वैश्विक बाजार में चीन को बड़ी चुनौती दे सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और घरेलू बाजार में भी सप्लाई बेहतर हो सकेगी।
फिलहाल स्थिति यह है कि उत्पादन में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल होने के बावजूद भारत अपनी पूरी क्षमता का फायदा नहीं उठा पा रहा है। यही कारण है कि भरपूर खेती के बावजूद लीची आम लोगों को महंगी मिल रही है।
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