भारत में सोना सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि निवेश, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी संपत्ति माना जाता है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक भारतीय परिवार वर्षों से सोने में बचत करते आए हैं। यही वजह है कि देश में लाखों टन सोना घरों, मंदिरों और लॉकरों में निष्क्रिय पड़ा हुआ है। अब जब सोने की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और सरकार ने गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी को प्रभावी रूप से 15% तक बढ़ा दिया है, तब एक बार फिर गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम (Gold Monetisation Scheme) चर्चा में आ गई है।
दिल्ली सराफा बाजार के अध्यक्ष योगेश सिंघल समेत देशभर के कई ज्वैलर्स सरकार से मांग कर रहे हैं कि इस स्कीम को नए और आसान मॉडल के साथ दोबारा मजबूत तरीके से लागू किया जाए। उनका तर्क है कि अगर घरों में पड़ा निष्क्रिय सोना बैंकिंग सिस्टम में आए तो देश का गोल्ड इंपोर्ट कम हो सकता है, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और करंट अकाउंट डेफिसिट पर भी दबाव घटेगा।
भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ता देशों में शामिल है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल और सरकारी अनुमानों के मुताबिक भारतीय परिवारों और संस्थानों के पास करीब 25,000 टन सोना मौजूद है। इसके बावजूद घरेलू मांग पूरी करने के लिए भारत हर साल 700 टन से ज्यादा सोना आयात करता है। यही वजह है कि सरकार लंबे समय से लोगों को निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करती रही है।
क्या है Gold Monetisation Scheme?
गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम (GMS) को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2015 में शुरू किया था। इस योजना का मकसद घरों, मंदिरों और संस्थानों में पड़े निष्क्रिय सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाना था।
सरल भाषा में समझें तो इस स्कीम के तहत कोई भी भारतीय नागरिक अपने सोने के गहने, गोल्ड बार या कॉइन बैंक में जमा कर सकता है। बैंक उस सोने को स्वीकार करके ग्राहक को ब्याज देता है। मैच्योरिटी पूरी होने पर ग्राहक चाहे तो कैश ले सकता है या सोने के रूप में भुगतान ले सकता है।
सरकार का मानना था कि अगर लोग लॉकरों में रखा सोना बैंक में जमा करेंगे तो देश की इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी। इससे डॉलर की बचत होगी और अर्थव्यवस्था को फायदा मिलेगा।
कैसे काम करती है यह स्कीम?
गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम के तहत सबसे पहले ग्राहक को किसी अधिकृत बैंक में गोल्ड डिपॉजिट अकाउंट खोलना होता है। इसके बाद ग्राहक अपना सोना बैंक द्वारा अधिकृत Collection and Purity Testing Centre (CPTC) में जमा करता है।
यहां सोने की शुद्धता की जांच होती है। जांच के बाद सोने को तौला जाता है, उसकी प्योरिटी तय की जाती है, ग्राहक की सहमति मिलने पर सोने को पिघलाकर बार में बदल दिया जाता है इसके बाद बैंक ग्राहक के खाते में उतनी मात्रा का गोल्ड जमा दर्ज कर देता है।
फिलहाल अधिकतर बैंक Short Term Bank Deposit (STBD) के तहत 1 से 3 साल की अवधि वाले विकल्प दे रहे हैं। मार्च 2025 से Medium Term और Long Term Deposit विकल्प बंद कर दिए गए हैं, जिसके बाद इस स्कीम की लोकप्रियता और कम हो गई।
सरकार इस स्कीम को क्यों बढ़ावा देना चाहती है?
भारत में सोने की मांग लगातार बढ़ रही है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, लोग गोल्ड में निवेश बढ़ा देते हैं। लेकिन भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
सोने का ज्यादा आयात होने से डॉलर की मांग बढ़ती है, करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ता है, रुपये पर दबाव पड़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ सकता है हाल ही में सरकार ने गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी को बढ़ाकर प्रभावी रूप से 15% कर दिया है। इसमें 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी, 5% एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस शामिल है।
सरकार चाहती है कि लोग नया सोना खरीदने के बजाय पुराने सोने का इस्तेमाल बढ़ाएं। इसी वजह से गोल्ड मोनिटाइजेशन स्कीम को फिर से चर्चा में लाया जा रहा है।
स्कीम के बड़े फायदे
1. निष्क्रिय सोने से कमाई
आमतौर पर घर या लॉकर में रखा सोना कोई रिटर्न नहीं देता। लेकिन इस स्कीम में जमा सोने पर ब्याज मिलता है।
2. सुरक्षा का फायदा
घर में सोना रखने पर चोरी या नुकसान का खतरा रहता है। बैंक में जमा करने से सुरक्षा बढ़ जाती है।
3. लॉकर खर्च से राहत
बैंक लॉकर के सालाना चार्ज बच सकते हैं।
4. देश को आर्थिक फायदा
अगर इंपोर्ट कम होता है तो देश का विदेशी मुद्रा खर्च घट सकता है।
5. ज्वैलरी इंडस्ट्री को फायदा
बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध सोने का इस्तेमाल ज्वैलर्स और रिफाइनरी सेक्टर कर सकते हैं।
फिर लोकप्रिय क्यों नहीं हो पाई यह स्कीम?
हालांकि यह योजना सुनने में आकर्षक लगती है, लेकिन भारतीय परिवारों के लिए इससे जुड़ी सबसे बड़ी समस्या भावनात्मक है। भारत में गहने सिर्फ निवेश नहीं होते, बल्कि शादी की यादें, पारिवारिक विरासत, धार्मिक महत्व, भावनात्मक जुड़ाव भी रखते हैं।
जब सोना बैंक में जमा किया जाता है तो उसे पिघलाकर बार में बदल दिया जाता है। यानी ग्राहक को वही डिजाइन वाला गहना वापस नहीं मिलता। यही वजह है कि लोग अपने पारंपरिक गहने जमा करने से हिचकिचाते हैं।
स्कीम के नुकसान और जोखिम
1. वही गहना वापस नहीं मिलता
सबसे बड़ा डर यही है कि शादी या परिवार से जुड़े गहने हमेशा के लिए खत्म हो सकते हैं।
2. वजन कम हो सकता है
शुद्धता जांच के दौरान स्टोन, मीनाकारी या अन्य डिजाइन एलिमेंट हटाए जाते हैं, जिससे वजन कम हो सकता है।
3. ब्याज दरें आकर्षक नहीं
कई लोगों को लगता है कि गोल्ड की कीमत बढ़ने की तुलना में ब्याज काफी कम है।
4. समय से पहले निकासी के नियम जटिल
हर बैंक के नियम अलग-अलग हो सकते हैं।
5. प्रक्रिया आसान नहीं
Purity Testing और दस्तावेजी प्रक्रिया आम लोगों को जटिल लगती है।
ज्वैलर्स अब क्या चाहते हैं?
दिल्ली और देशभर के कई ज्वैलर्स चाहते हैं कि सरकार इस स्कीम को नए मॉडल के साथ दोबारा मजबूत बनाए। इंडस्ट्री का कहना है कि प्रक्रिया आसान हो, छोटे शहरों में CPTC सेंटर बढ़ें, बेहतर ब्याज मिले, लोगों को टैक्स लाभ दिए जाएं, ज्वैलर्स, बैंक और रिफाइनरी को जोड़कर नया इकोसिस्टम बनाया जाए
उनका मानना है कि अगर सरकार सही तरीके से स्कीम को री-डिजाइन करे तो लाखों टन निष्क्रिय सोना अर्थव्यवस्था में वापस लाया जा सकता है।
क्या आम लोगों को इस स्कीम में निवेश करना चाहिए?
यह पूरी तरह व्यक्ति की जरूरत पर निर्भर करता है। अगर आपके पास पुराना गोल्ड पड़ा है जिसे आप इस्तेमाल नहीं करते सिर्फ निवेश के रूप में रखा है लॉकर खर्च ज्यादा है तो यह स्कीम उपयोगी हो सकती है। लेकिन अगर गहनों से भावनात्मक जुड़ाव है या पारिवारिक महत्व है, तो उन्हें जमा करना कई लोगों के लिए सही फैसला नहीं माना जाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि निवेश के नजरिए से यह स्कीम तभी ज्यादा सफल होगी जब सरकार इसे सरल, पारदर्शी और ज्यादा रिटर्न वाला बनाए।
निष्कर्ष
Gold Monetisation Scheme का उद्देश्य भारत के निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में शामिल करना है ताकि गोल्ड इंपोर्ट कम हो और देश की विदेशी मुद्रा बच सके। हालांकि योजना का विचार मजबूत है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव, जटिल प्रक्रिया और सीमित फायदे इसकी लोकप्रियता में बड़ी बाधा बने हुए हैं।
अब जब गोल्ड इंपोर्ट महंगा हो चुका है और सरकार आयात कम करने की कोशिश कर रही है, तब ज्वैलरी इंडस्ट्री चाहती है कि इस स्कीम को नए मॉडल और बेहतर सुविधाओं के साथ दोबारा प्रभावी बनाया जाए। आने वाले समय में सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है, इस पर पूरे गोल्ड मार्केट की नजर बनी हुई है।
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