नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों के लिए आने वाले समय में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिका के चार प्रभावशाली सीनेटर ट्रंप प्रशासन के साथ एक ऐसे संशोधित प्रतिबंध विधेयक पर सहमत हुए हैं, जिसका उद्देश्य रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाना है। यदि यह कानून लागू होता है, तो रूस से बड़ी मात्रा में तेल आयात करने वाले भारत जैसे देशों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी सीनेटरों में बनी सहमति
अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल, लिंडसे ग्राहम, जीन शाहीन और रोजर विकर ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़े अपडेटेड कानून को आगे बढ़ाने के लिए ट्रंप प्रशासन के साथ सहमति बन गई है।
सीनेटरों के अनुसार, रूस द्वारा यूक्रेन में जारी सैन्य कार्रवाई और नागरिकों पर हमलों को देखते हुए उन देशों पर भी दबाव बढ़ाना जरूरी है जो रूसी तेल और प्राकृतिक गैस खरीदकर मॉस्को की अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रहे हैं।
रूस से व्यापार करने वाले देशों पर हो सकता है एक्शन
प्रस्तावित कानून के तहत उन देशों पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है जो रूस के साथ व्यापार जारी रखेंगे। खासतौर पर रूस के ऊर्जा निर्यात—कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस—के बड़े खरीदार इस कानून के दायरे में आ सकते हैं।
अमेरिकी सांसदों का कहना है कि रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए उसके ऊर्जा निर्यात से होने वाली कमाई पर चोट करना जरूरी है।
ग्राहम ने जेलेंस्की से की मुलाकात
सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कीव में यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से मुलाकात के बाद कहा कि व्हाइट हाउस अब इस विधेयक के उस संस्करण का समर्थन करेगा जिसे कांग्रेस में आगे बढ़ाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि इससे राष्ट्रपति ट्रंप को रूस पर दबाव बनाने और यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए अतिरिक्त कूटनीतिक साधन मिलेंगे।
रूस पर दबाव बढ़ाने की रणनीति
रूस ने फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमला किया था और तब से पश्चिमी देशों ने उस पर कई दौर के प्रतिबंध लगाए हैं। अब अमेरिका प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाकर उन देशों तक पहुंचाना चाहता है जो रूस से ऊर्जा खरीद रहे हैं।
इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाने की जरूरत बताई। उनका कहना है कि रूस पर जितना अधिक आर्थिक दबाव होगा, शांति वार्ता की संभावना उतनी मजबूत होगी।
ट्रंप और जेलेंस्की के रिश्तों में आई नरमी
हाल ही में ट्रंप और जेलेंस्की की मुलाकात भी चर्चा में रही। पहले जहां ट्रंप ने जेलेंस्की की आलोचना की थी, वहीं अब दोनों नेताओं के संबंधों में सुधार देखने को मिला है।
ट्रंप ने यूक्रेन को पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर के निर्माण का लाइसेंस देने की बात कही और दोनों देशों के बीच बेहतर सहयोग का संकेत दिया।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत वर्तमान में रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल है। रूस से मिलने वाला डिस्काउंट वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए लागत कम करने और घरेलू ईंधन कीमतों को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
यदि अमेरिका का यह नया कानून लागू होता है, तो भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं—
- रूस से सस्ता कच्चा तेल आयात प्रभावित हो सकता है।
- भारतीय कंपनियों पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध या अतिरिक्त टैरिफ का जोखिम बढ़ सकता है।
- भारत को ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।
- सरकार को वैकल्पिक तेल स्रोतों की तलाश तेज करनी पड़ सकती है।
हालांकि, प्रस्तावित विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर 180 दिनों तक छूट (Waiver) देने का अधिकार भी दिया गया है। ऐसे में भारत को कूटनीतिक बातचीत के जरिए राहत मिलने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा रही है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल यह विधेयक कानून नहीं बना है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के समर्थन के बाद इसके पारित होने की संभावना बढ़ गई है। यदि यह लागू होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और भारत-अमेरिका-रूस के त्रिकोणीय संबंधों पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।


