Kaziranga National Park: असम सरकार काजीरंगा नेशनल पार्क के आसपास लागू इको-सेंसिटिव जोन यानी ESZ की डिफॉल्ट 10 किलोमीटर सीमा को घटाकर 1 किलोमीटर करने की तैयारी में है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा सीमा के कारण बोकाखाट समेत आसपास के इलाकों में जरूरी विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मुश्किल आ रही है। वहीं, पर्यावरणविदों को डर है कि ESZ कम होने से काजीरंगा के वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास पर दबाव बढ़ सकता है।
असम का Kaziranga National Park एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह यहां मौजूद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों में से एक और खास तौर पर एक सींग वाले गैंडे का संरक्षण है। काजीरंगा के आसपास के इको-सेंसिटिव जोन यानी ESZ की सीमा को लेकर असम सरकार और पर्यावरणविदों के बीच मतभेद सामने आए हैं।
असम सरकार अगले दो महीनों में केंद्र सरकार के सामने प्रस्ताव रखने की योजना बना रही है कि काजीरंगा नेशनल पार्क के आसपास लागू 10 किलोमीटर की डिफॉल्ट ESZ सीमा को घटाकर 1 किलोमीटर किया जाए। राज्य सरकार का कहना है कि इससे बोकाखाट और आसपास के इलाकों में विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
Assam wants to shrink Kaziranga’s eco-sensitive zone from 10km to 1km for a stadium and other development. Yet every monsoon floods force elephants and rhinos towards higher ground through these very corridors.
Let’s build stadiums elsewhere as we cannot build another Kaziranga. pic.twitter.com/w9DREv9BLw
— Harsh Goenka (@hvgoenka) August 11, 2026 लेकिन पर्यावरणविद इस प्रस्ताव को लेकर चिंतित हैं। उनका तर्क है कि काजीरंगा सिर्फ एक राष्ट्रीय उद्यान नहीं, बल्कि ऐसे वन्यजीवों का प्राकृतिक घर है जिन्हें सुरक्षित रखने के लिए पार्क की सीमाओं के बाहर भी पर्याप्त जगह और सुरक्षित गलियारों की जरूरत होती है।
क्या है असम सरकार की योजना?
‘असम ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि राज्य सरकार काजीरंगा के आसपास ESZ की सीमा को कम करने के लिए केंद्र सरकार से संपर्क करेगी।
मुख्यमंत्री के मुताबिक बोकाखाट में कई विकास कार्य लंबे समय से चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें स्टेडियम का निर्माण, शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार और दूसरी जरूरी नागरिक परियोजनाएं शामिल हैं।
सरकार का कहना है कि मौजूदा 10 किलोमीटर की डिफॉल्ट सीमा के कारण इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में कई तरह की पाबंदियां सामने आती हैं। ऐसे में राज्य सरकार चाहती है कि वैज्ञानिक आधार पर ESZ की सीमा को 1 किलोमीटर तक निर्धारित किया जाए।
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि इस विषय पर केंद्र सरकार के साथ शुरुआती स्तर पर बातचीत हो चुकी है। काजीरंगा के लिए अंतिम ESZ नोटिफिकेशन जारी होने के बाद राज्य सरकार औपचारिक प्रस्ताव तैयार कर केंद्र के सामने रखेगी।
यानी फिलहाल 1 किलोमीटर की सीमा लागू नहीं हुई है। यह राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित बदलाव है, जिस पर केंद्र सरकार का फैसला अहम होगा।
अभी 10 किलोमीटर की सीमा क्यों चर्चा में है?
काजीरंगा के लिए अंतिम ESZ अधिसूचना की प्रक्रिया लंबे समय से पूरी नहीं हो सकी है। इसी वजह से यहां 10 किलोमीटर का डिफॉल्ट ESZ नियम चर्चा का विषय बना हुआ है।
मार्च में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने भी इस मामले को लेकर स्थिति पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत के सामने यह बात आई थी कि असम सरकार की ओर से केंद्र को न तो ESZ की अंतिम अधिसूचना भेजी गई है और न ही इसका ड्राफ्ट प्रस्ताव सौंपा गया है।
ऐसे में जब तक अंतिम अधिसूचना जारी नहीं होती, 10 किलोमीटर वाला डिफॉल्ट दायरा लागू रहने की बात सामने आती है।
यही वह स्थिति है जिसे असम सरकार बदलना चाहती है। राज्य का तर्क है कि एक समान डिफॉल्ट सीमा के कारण पार्क के आसपास के उन इलाकों में भी विकास गतिविधियों पर असर पड़ रहा है जहां आबादी रहती है और जहां बुनियादी ढांचे की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
बोकाखाट में क्यों अटकी हैं विकास परियोजनाएं?
बोकाखाट काजीरंगा के आसपास का महत्वपूर्ण इलाका है। राज्य सरकार के मुताबिक यहां शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई काम ESZ से संबंधित नियमों के कारण प्रभावित हो रहे हैं।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से स्टेडियम निर्माण का जिक्र किया है। इसके अलावा शहर के बुनियादी ढांचे को बेहतर करने और दूसरी नागरिक सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
सरकार का मानना है कि अगर ESZ की सीमा को वैज्ञानिक तरीके से कम किया जाता है तो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
यही सरकार के प्रस्ताव का सबसे अहम आधार है—विकास परियोजनाओं के लिए जगह उपलब्ध कराना, लेकिन काजीरंगा के वन्यजीवों और पर्यावरण की सुरक्षा को बनाए रखना।
हालांकि, पर्यावरणविद इस संतुलन को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
पर्यावरणविद क्यों जता रहे हैं चिंता?
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि काजीरंगा के वन्यजीवों के लिए सिर्फ राष्ट्रीय पार्क की आधिकारिक सीमा ही पर्याप्त नहीं है। हाथी, गैंडे और दूसरे जंगली जानवर अपने भोजन, पानी और सुरक्षित स्थानों की जरूरत के अनुसार पार्क के आसपास के क्षेत्रों में भी आवाजाही करते हैं।
विशेष रूप से मानसून के दौरान ब्रह्मपुत्र और आसपास के इलाकों में बाढ़ की स्थिति काजीरंगा के वन्यजीवों के लिए बड़ी चुनौती बनती है। जब पार्क के निचले इलाकों में पानी भरता है तो जानवर ऊंचे और अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों की ओर जाने की कोशिश करते हैं।
यही वजह है कि पर्यावरणविदों का कहना है कि पार्क के आसपास मौजूद प्राकृतिक रास्ते और घास के मैदान केवल पार्क की सीमा के भीतर सीमित नहीं किए जा सकते।
अगर आसपास के इलाकों में निर्माण और दूसरी गतिविधियां तेजी से बढ़ती हैं तो वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित होने का खतरा पैदा हो सकता है।
एक सींग वाले गैंडे के लिए क्यों अहम है काजीरंगा?
काजीरंगा की पहचान सबसे ज्यादा एक सींग वाले भारतीय गैंडे से जुड़ी है। यह पार्क इस प्रजाति के संरक्षण के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में शामिल है।
इसी वजह से पर्यावरणविद ESZ में संभावित कटौती को केवल निर्माण और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ा प्रशासनिक फैसला नहीं मान रहे हैं। उनके अनुसार, इसका सीधा संबंध वन्यजीवों के भविष्य और उनके प्राकृतिक आवास से है।
गोलाघाट के पर्यावरण कार्यकर्ता और पत्रकार अपूर्व बल्लभ गोस्वामी ने ‘द फेडरल’ से बातचीत में चिंता जताई कि ESZ कम होने से काजीरंगा के वन्यजीवों, खासकर एक सींग वाले गैंडे के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
उनका सवाल यह है कि अगर पार्क के बाहर सुरक्षित बफर क्षेत्र लगातार छोटा होता गया तो जानवरों को सुरक्षित आवाजाही और प्राकृतिक संसाधनों के लिए पर्याप्त जगह कैसे मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश का भी दिया जा रहा हवाला
पर्यावरण कार्यकर्ता दिलीप नाथ ने प्रस्तावित बदलाव को सुप्रीम कोर्ट के 2022 के ESZ संबंधी आदेश के संदर्भ में भी देखा है।
उनका कहना है कि वन्यजीव संरक्षण में केवल पार्क की मुख्य सीमा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि जानवरों के लिए पर्याप्त आवास, प्रजनन क्षेत्र और भोजन उपलब्ध कराने वाले प्राकृतिक इलाकों की सुरक्षा भी जरूरी है।
काजीरंगा जैसे इलाके में घास के मैदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये कई शाकाहारी वन्यजीवों के भोजन का प्रमुख स्रोत हैं। यदि पार्क के आसपास का प्राकृतिक क्षेत्र लगातार निर्माण गतिविधियों में बदलता है तो घास के मैदानों पर दबाव बढ़ सकता है।
पर्यावरणविदों को आशंका है कि इसका असर धीरे-धीरे वन्यजीवों की संख्या और उनके प्राकृतिक व्यवहार पर भी पड़ सकता है।
दिलीप नाथ ने चेतावनी दी है कि अगर ESZ का दायरा कम किया जाता है और इससे वन्यजीवों के लिए उपलब्ध प्राकृतिक क्षेत्र प्रभावित होता है, तो पर्यावरण कार्यकर्ता कानूनी रास्ता अपनाने पर मजबूर हो सकते हैं।
हर्ष गोयनका की पोस्ट ने क्यों छेड़ी बहस?
इसी विवाद के बीच RPG एंटरप्राइजेज के चेयरमैन Harsh Goenka की सोशल मीडिया पोस्ट ने बहस को और तेज कर दिया।
हर्ष गोयनका ने काजीरंगा के ESZ को 10 किलोमीटर से घटाकर 1 किलोमीटर करने के प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्टेडियम और दूसरे विकास कार्यों के लिए काजीरंगा के संवेदनशील क्षेत्र को कम करना उचित नहीं होगा।
उन्होंने खास तौर पर मानसून का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक हर साल बाढ़ के दौरान हाथी और गैंडे ऊंचे इलाकों की ओर जाने के लिए उन्हीं रास्तों का इस्तेमाल करते हैं।
गोयनका ने सुझाव दिया कि स्टेडियम को किसी दूसरी जगह बनाया जाना चाहिए, क्योंकि काजीरंगा जैसा प्राकृतिक विरासत स्थल दोबारा नहीं बनाया जा सकता।
उनकी पोस्ट का संदेश साफ था—विकास जरूरी है, लेकिन उसके लिए ऐसे प्राकृतिक क्षेत्र को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए जिसे दोबारा बनाया या कहीं और स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
यही बात सोशल मीडिया पर चर्चा का बड़ा कारण बनी है। एक तरफ विकास और स्थानीय जरूरतों का सवाल है, तो दूसरी तरफ वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा की चिंता है।
विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण की पुरानी बहस फिर सामने
काजीरंगा का मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है—क्या विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रतिबंधों में बदलाव किया जा सकता है और अगर हां, तो उसकी सीमा क्या होनी चाहिए?
सरकार के सामने स्थानीय आबादी के लिए बेहतर सड़क, स्टेडियम, शहरी सुविधाएं और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, काजीरंगा जैसे राष्ट्रीय उद्यान की प्रकृति ही ऐसी है कि इसके आसपास का पर्यावरण भी वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यही कारण है कि ESZ की सीमा को सिर्फ किलोमीटर में देखना पर्याप्त नहीं है। असल सवाल यह है कि 1 किलोमीटर का क्षेत्र वन्यजीवों की आवाजाही, प्राकृतिक आवास और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिहाज से पर्याप्त होगा या नहीं।
अगर वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर किसी इलाके को संवेदनशील क्षेत्र से बाहर किया जाता है तो उसके प्रभाव का आकलन भी जरूरी होगा। खासकर उन क्षेत्रों में जहां बाढ़ के समय वन्यजीव पार्क से बाहर निकलकर ऊंचे इलाकों की ओर जाते हैं।
सरकार के सामने अब क्या चुनौती है?
असम सरकार के प्रस्ताव के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका केंद्र सरकार की होगी। राज्य को अंतिम ESZ अधिसूचना की प्रक्रिया पूरी करनी होगी और उसके बाद 1 किलोमीटर की सीमा का प्रस्ताव औपचारिक रूप से रखा जा सकता है।
इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव, वन्यजीवों की आवाजाही, स्थानीय आबादी की जरूरत और विकास परियोजनाओं जैसे कई पहलुओं पर विचार करना अहम होगा।
काजीरंगा को लेकर किसी भी फैसले का असर केवल बोकाखाट की किसी एक परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा। यह फैसला भविष्य में राष्ट्रीय उद्यान के आसपास विकास और संरक्षण के संतुलन के लिए एक उदाहरण भी बन सकता है।
यही वजह है कि पर्यावरणविद चाहते हैं कि ESZ की सीमा तय करते समय केवल वर्तमान विकास परियोजनाओं को नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में वन्यजीवों और प्राकृतिक आवास पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाए।
क्या काजीरंगा के लिए विकास और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं?
काजीरंगा की मौजूदा बहस को सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। असली चुनौती यह है कि क्या ऐसी जगहों का विकास मॉडल तैयार किया जा सकता है जिसमें स्थानीय लोगों की जरूरतें पूरी हों और वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते भी सुरक्षित रहें।
स्टेडियम जैसी परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक स्थान तलाशना एक विकल्प हो सकता है। वहीं, शहरों के विकास के लिए ऐसी योजना बनाई जा सकती है जिसमें संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों पर न्यूनतम दबाव पड़े।
काजीरंगा की खासियत यही है कि यह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र है जिसमें बाढ़, घास के मैदान, वन क्षेत्र और वन्यजीवों की आवाजाही एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इसलिए ESZ को 10 किलोमीटर से 1 किलोमीटर करने का फैसला केवल नक्शे पर सीमा घटाने का मामला नहीं है। इसके पीछे यह सवाल भी जुड़ा है कि आने वाले दशकों में काजीरंगा और उसके आसपास के इलाकों का विकास किस तरह किया जाएगा।
फिलहाल असम सरकार केंद्र के सामने औपचारिक प्रस्ताव रखने की तैयारी कर रही है। अंतिम फैसला होने तक 10 किलोमीटर का डिफॉल्ट ESZ दायरा चर्चा के केंद्र में रहेगा। अब देखना होगा कि सरकार विकास परियोजनाओं की जरूरत और काजीरंगा के संवेदनशील पर्यावरण के बीच किस तरह संतुलन बनाती है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दिए गए तथ्य उपलब्ध रिपोर्टों और संबंधित पक्षों के बयानों पर आधारित हैं। ESZ की सीमा में बदलाव का प्रस्ताव अंतिम निर्णय नहीं है; इस पर संबंधित सरकारी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकरणों के फैसले महत्वपूर्ण होंगे।


