China-India Rice Trade: चीन ने भारतीय चावल निर्यातकों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए सात कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है। चीन ने भारतीय चावल की खेपों में जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म (GMO) पाए जाने का दावा किया है। भारत ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि देश में GMO खाद्य फसलों की व्यावसायिक खेती नहीं होती। इस पूरे विवाद के बीच APEDA ने चीन को चावल निर्यात करने वाले एक्सपोर्टर्स के लिए जांच और सर्टिफिकेशन से जुड़े नियम भी सख्त कर दिए हैं।
Highlights
- चीन ने सात भारतीय चावल निर्यातकों का रजिस्ट्रेशन रद्द किया।
- चीन ने भारतीय चावल की खेपों में GMO पाए जाने का आरोप लगाया है।
- भारत ने चीन की कार्रवाई पर आपत्ति जताई है।
- मई 2026 के अंत तक कई भारतीय गैर-बासमती चावल की खेपों को चीन ने GMO के आधार पर रोका।
- APEDA ने चीन को चावल भेजने से पहले GMO टेस्ट को जरूरी किया है।
- अब केवल चीन के कस्टम विभाग GACC में रजिस्टर्ड निर्यातक ही वहां चावल भेज सकेंगे।
भारतीय चावल पर चीन की कार्रवाई से बढ़ा विवाद
भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों में कई मुद्दों को लेकर पहले से ही तनाव देखने को मिलता रहा है। अब चावल के निर्यात को लेकर दोनों देशों के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। चीन ने भारतीय चावल निर्यातकों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए सात कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है।
चीन की ओर से इस कार्रवाई के पीछे भारतीय चावल में जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म यानी GMO पाए जाने का दावा किया गया है। रजिस्ट्रेशन रद्द होने के बाद संबंधित भारतीय कंपनियों के लिए चीन को चावल निर्यात करना मुश्किल हो गया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन भारतीय चावल का एक बड़ा संभावित बाजार है। ऐसे में अगर भारतीय निर्यातकों के लिए वहां लगातार तकनीकी और नियामकीय अड़चनें बढ़ती हैं, तो इसका असर चावल के कारोबार पर पड़ सकता है।
चीन के GACC ने किया रजिस्ट्रेशन रद्द
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय चावल निर्यातकों के खिलाफ यह कार्रवाई चीन के General Administration of Customs of China (GACC) की ओर से की गई है। कुल सात भारतीय निर्यातकों का रजिस्ट्रेशन रद्द किया गया है। इनमें से तीन कंपनियों के खिलाफ इसी साल की शुरुआत में ही कार्रवाई की जा चुकी थी।
प्रभावित निर्यातकों में छत्तीसगढ़, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से जुड़ी कंपनियां शामिल हैं। चीन के कस्टम विभाग की ओर से की गई कार्रवाई के बाद इन कंपनियों के लिए चीन के बाजार में चावल की सप्लाई जारी रखना संभव नहीं रहेगा, जब तक नियामकीय स्तर पर स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
भारत की ओर से चीन के इस कदम को लेकर सवाल उठाए गए हैं। भारतीय पक्ष का कहना है कि अगर चावल की गुणवत्ता या GMO को लेकर कोई समस्या है, तो उसके लिए निर्धारित तकनीकी और वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत जांच तथा बातचीत होनी चाहिए।
भारत ने चीन के दावे पर जताई आपत्ति
भारत सरकार की ओर से चीन को यह जानकारी दी जा चुकी है कि देश में GMO खाद्य फसलों की व्यावसायिक खेती नहीं की जाती। इसके बावजूद भारतीय गैर-बासमती चावल की कई खेपों को चीन की ओर से GMO का हवाला देकर रोके जाने का मामला सामने आया है।
मई 2026 के अंत तक चीन कम से कम 70 भारतीय गैर-बासमती चावल की खेपों को GMO के आधार पर खारिज कर चुका था। लगातार खेपों के रिजेक्ट होने के बाद भारतीय चावल निर्यातकों की चिंता बढ़ गई।
भारतीय पक्ष का तर्क है कि जब देश में GMO खाद्य फसलों की व्यावसायिक खेती नहीं हो रही है, तब भारतीय चावल की खेपों में GMO पाए जाने के दावों की वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीके से जांच जरूरी है। इसी वजह से भारत ने चीन की ओर से की जा रही कार्रवाई पर आपत्ति दर्ज कराई है।
क्या चीन की कार्रवाई के पीछे व्यापारिक वजह भी है?
इस विवाद के बीच सरकारी सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि चीन की कार्रवाई केवल तकनीकी या खाद्य सुरक्षा से जुड़े कारणों तक सीमित नहीं हो सकती है। भारतीय पक्ष में कुछ लोगों का मानना है कि इसके पीछे व्यापारिक हित भी भूमिका निभा सकते हैं।
बताया गया है कि चीन ने अपनी घरेलू जरूरतों के लिए चावल का पर्याप्त स्टॉक पहले ही तैयार कर लिया था। ऐसे में भारतीय चावल की मांग कम होने के कारण वहां के बाजार में आयात पर अतिरिक्त सख्ती की जा सकती है।
हालांकि, चीन की ओर से उठाए गए कदम का आधिकारिक आधार GMO से जुड़ी चिंताएं बताई गई हैं। इसलिए इस मामले में अंतिम स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब दोनों देशों के बीच तकनीकी और व्यापारिक स्तर पर बातचीत आगे बढ़ेगी।
APEDA ने क्यों सख्त किए चावल निर्यात के नियम?
चीन की ओर से भारतीय चावल की खेपों को लगातार रोके जाने के बाद भारतीय चावल निर्यातकों ने Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) से हस्तक्षेप की मांग की थी।
इसके बाद APEDA ने चीन को चावल निर्यात करने के लिए नियमों को और सख्त किया। नए प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चीन भेजे जाने वाले चावल की खेपों में GMO को लेकर किसी तरह का विवाद न हो।
अब चीन को चावल निर्यात करने से पहले चावल की GMO जांच APEDA से मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में कराना जरूरी किया गया है। इससे निर्यातकों के पास अपनी खेप के संबंध में एक आधिकारिक जांच रिपोर्ट उपलब्ध रहेगी।
इस प्रक्रिया से भारतीय निर्यातकों को चीन के कस्टम विभाग के सामने अपनी खेप की गुणवत्ता और GMO स्थिति साबित करने में मदद मिल सकती है।
चीन को चावल भेजने के लिए GACC रजिस्ट्रेशन भी जरूरी
सिर्फ GMO टेस्ट ही पर्याप्त नहीं है। चीन को चावल निर्यात करने वाली कंपनियों, राइस मिलों और प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए चीन के कस्टम विभाग GACC में रजिस्ट्रेशन भी जरूरी है।
इसका मतलब है कि भारत से चीन भेजी जाने वाली चावल की खेप अब ज्यादा सख्त जांच प्रक्रिया से होकर गुजरेगी। निर्यातक को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी कंपनी और संबंधित प्रोसेसिंग यूनिट चीन की आवश्यकताओं को पूरा करती हो।
यह नियम भारतीय निर्यातकों के लिए अतिरिक्त अनुपालन लागत बढ़ा सकता है, लेकिन दूसरी तरफ इससे भविष्य में खेपों को GMO के आधार पर रोके जाने के मामलों को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
भारतीय चावल निर्यातकों पर क्या होगा असर?
चीन की ओर से सात निर्यातकों का रजिस्ट्रेशन रद्द किए जाने का सीधा असर संबंधित कंपनियों के कारोबार पर पड़ेगा। इन कंपनियों को चीन के बाजार में अपने निर्यात को रोकना पड़ सकता है या नए नियमों के तहत दोबारा आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है।
अगर GMO के आरोपों के कारण आगे भी भारतीय चावल की खेपें रोकी जाती हैं, तो इसका असर सिर्फ संबंधित कंपनियों पर नहीं बल्कि पूरे भारतीय चावल निर्यात क्षेत्र पर पड़ सकता है।
निर्यातकों को अब चीन भेजी जाने वाली हर खेप के लिए गुणवत्ता नियंत्रण, लैब टेस्टिंग, दस्तावेज और रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों का अधिक सावधानी से पालन करना होगा।
भारत के पास क्या है जवाब?
भारत की ओर से फिलहाल इस विवाद का जवाब सीधे तौर पर व्यापारिक प्रतिबंधों के रूप में देने के बजाय नियामकीय और कूटनीतिक स्तर पर दिया जा रहा है। भारत ने चीन के GMO संबंधी दावों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है और यह बताया है कि देश में GMO खाद्य फसलों की व्यावसायिक खेती नहीं की जाती।
साथ ही APEDA के माध्यम से निर्यातकों के लिए सख्त टेस्टिंग व्यवस्था लागू की गई है। इसका मकसद भारतीय चावल की खेपों को चीन के नियमों के अनुरूप बनाना और भविष्य में किसी भी तरह के विवाद की गुंजाइश कम करना है।
आगे भारत और चीन के बीच तकनीकी बातचीत इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। अगर दोनों देश GMO टेस्टिंग के मानकों, लैब रिपोर्ट और खेपों की जांच की प्रक्रिया पर सहमति बना लेते हैं, तो चावल व्यापार में पैदा हुई मौजूदा बाधा को कम किया जा सकता है।
आगे क्या होगा?
भारतीय चावल निर्यातकों के लिए चीन का बाजार महत्वपूर्ण है, लेकिन मौजूदा विवाद ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ उत्पादन और कीमत ही नहीं, बल्कि आयातक देश के खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन भी बेहद जरूरी है।
चीन की ओर से सात भारतीय निर्यातकों का रजिस्ट्रेशन रद्द किए जाने के बाद अब APEDA के नए नियमों का महत्व और बढ़ गया है। GMO टेस्टिंग, प्रमाणित लैब रिपोर्ट और GACC रजिस्ट्रेशन के जरिए भारत अपने निर्यातकों को चीन के नियमों के अनुरूप तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि चीन भारतीय चावल की खेपों को लेकर अपनी नीति में कोई बदलाव करता है या नहीं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देशों के बीच तकनीकी बातचीत के बाद GMO से जुड़े विवाद का कोई स्थायी समाधान निकलता है या नहीं।
फिलहाल, भारतीय चावल निर्यातकों के लिए चीन का बाजार चुनौतीपूर्ण हो गया है। भारत की कोशिश यही रहेगी कि वैज्ञानिक जांच, सख्त गुणवत्ता नियंत्रण और कूटनीतिक बातचीत के जरिए भारतीय चावल के निर्यात पर पड़ रही इन बाधाओं को कम किया जाए।


