ईरान-अमेरिका तनाव बढ़ने से दुनिया की बढ़ी चिंता, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत पर भी पड़ सकता है असर
Iran-US War Update: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी चिंता का कारण बन गया है। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका उसके खिलाफ कथित ‘आर्थिक युद्ध’ जारी रखता है, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और फारस की खाड़ी के दूसरे हिस्सों से तेल का निर्यात पूरी तरह रोक सकता है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसेन रेजाई की इस चेतावनी के बाद दुनिया की नजर एक बार फिर होर्मुज पर टिक गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर होर्मुज के रास्ते तेल की आवाजाही लंबे समय के लिए बाधित होती है, तो इसका असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ भारत में पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों पर कितना पड़ेगा।
‘एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होगा’
ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसेन रेजाई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि यदि अमेरिका आर्थिक युद्ध जारी रखता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य या फारस की खाड़ी के किसी अन्य हिस्से से एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होने दिया जाएगा।
रेजाई ने उन देशों को भी चेतावनी दी है, जो ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक अभियान का समर्थन या उसमें सहयोग करते हैं। उनके मुताबिक, ईरान ऐसे किसी भी देश की भागीदारी को युद्ध की कार्रवाई के तौर पर देख सकता है।
अमेरिका की नई आर्थिक कार्रवाई की तैयारी
ईरान की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका उसके खिलाफ और कड़े आर्थिक कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। Reuters के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट की ओर से ईरान और उसके साथ व्यापार करने वाले देशों को निशाना बनाने वाली नई आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया जा सकता है।
Financial Times में लिखे एक लेख में बेसेंट ने आने वाले कदमों को किसी विरोधी देश के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय कार्रवाइयों में से एक बताया है। हालांकि, अमेरिका ने संभावित प्रतिबंधों की पूरी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की है।
संकेत यह भी हैं कि ईरान के साथ आर्थिक और वित्तीय संबंध रखने वाले दूसरे देशों पर भी अमेरिका दबाव बढ़ा सकता है। यही वजह है कि ईरान की ओर से भी बयानबाजी और चेतावनियां तेज हो गई हैं।
चीन पर भी बढ़ रहा अमेरिकी दबाव
ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों को लेकर अमेरिका का दबाव बढ़ रहा है। Reuters के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव ने चीन से भी अमेरिका के साथ सहयोग करने का आग्रह किया है।
चीन के लिए यह मुद्दा खास तौर पर अहम है, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों में खाड़ी क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अपने तेल आयात का करीब आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक किसी तरह की बाधा चीन समेत कई बड़े तेल आयातक देशों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है।
हालांकि, चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति पर आपत्ति जताई है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि दबाव और प्रतिबंध समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं और कूटनीति के रास्ते को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
ईरान ने अमेरिकी दबाव को बताया सैन्य संघर्ष से जुड़ा कदम
ईरान की ओर से भी अमेरिका के खिलाफ बयान लगातार तीखे होते जा रहे हैं। ईरानी सेना यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने अमेरिकी आर्थिक दबाव की आलोचना की है।
वहीं, ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि ईरान के लिए युद्ध और प्रतिबंध कोई नई स्थिति नहीं है और देश लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता आया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में शामिल है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा इसी समुद्री रास्ते से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है।
यही कारण है कि होर्मुज में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बड़ी बाधा वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकती है। यदि तेल टैंकरों के लिए इस मार्ग पर जोखिम बढ़ता है, तो कंपनियों की परिवहन लागत, बीमा खर्च और सप्लाई की अनिश्चितता भी बढ़ सकती है।
ईरान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव में है। इसके अलावा सैन्य तनाव और बुनियादी ढांचे को होने वाले संभावित नुकसान से उत्पादन, व्यापार और पुनर्निर्माण पर भी दबाव बढ़ सकता है।
ईरान के पास मिसाइल और ड्रोन क्षमता भी मौजूद है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने पर तेल टैंकरों और दूसरे समुद्री जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज का संकट?
ईरान-अमेरिका तनाव भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और LPG का आयात करता है।
अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर तेजी का दबाव बन सकता है। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होने पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों के अलावा परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत पर भी असर पड़ सकता है। वहीं, LPG की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आयात लागत में बढ़ोतरी का असर घरेलू गैस बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
सिर्फ तेल नहीं, पूरी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है असर
होर्मुज संकट का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहेगा। खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा के अलावा कई दूसरी वस्तुओं का भी समुद्री व्यापार होता है। अगर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो शिपिंग समय और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।
इसका असर आगे चलकर एयरलाइन ईंधन, माल ढुलाई, औद्योगिक उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान और अमेरिका के बीच आर्थिक दबाव और जवाबी कार्रवाई किस स्तर तक पहुंचती है। अगर तनाव केवल बयानबाजी और प्रतिबंधों तक सीमित रहता है, तो ऊर्जा बाजार पर असर अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है। लेकिन अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही वास्तव में बाधित होती है, तो वैश्विक तेल बाजार में बड़ा झटका देखने को मिल सकता है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी। इसलिए आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों, खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही और अमेरिका-ईरान के अगले कदमों पर बाजार की नजर बनी रहेगी।


