भारत में आइसक्रीम आज करोड़ों रुपये का कारोबार बन चुकी है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इसे सिर्फ अमीरों की चीज माना जाता था। उस दौर में न तो बड़े-बड़े रेफ्रिजरेटर थे और न ही आधुनिक फैक्ट्रियां। ऐसे समय में अहमदाबाद की एक छोटी सी सोडा दुकान से शुरू हुई एक कंपनी आज दुनिया के 45 से ज्यादा देशों तक पहुंच चुकी है। हम बात कर रहे हैं देश की सबसे पुरानी और मशहूर आइसक्रीम कंपनियों में शामिल वाडीलाल (Vadilal) की।
1907 में शुरू हुई इस कंपनी की कहानी सिर्फ आइसक्रीम बेचने की नहीं, बल्कि भारत में फूड इंडस्ट्री के विकास की भी कहानी मानी जाती है। हाथ से चलने वाली मशीनों से शुरू हुआ यह कारोबार आज हजारों करोड़ रुपये के ब्रांड में बदल चुका है।
सड़क किनारे छोटी दुकान से हुई शुरुआत
वाडीलाल की शुरुआत ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1907 में हुई थी। अहमदाबाद में वाडीलाल गांधी ने एक छोटी सी सोडा फाउंटेन दुकान खोली थी। उस समय आइसक्रीम बनाना बेहद कठिन काम माना जाता था क्योंकि बिजली और आधुनिक कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं।
उस दौर में आइसक्रीम को हाथ से चलने वाली मशीनों और ‘कोठी’ नाम के बड़े बर्तनों में तैयार किया जाता था। बर्फ और नमक की मदद से तापमान कम किया जाता था, जिसके बाद आइसक्रीम बनाई जाती थी। यही वजह थी कि आइसक्रीम आम लोगों की पहुंच से काफी दूर थी।
लेकिन वाडीलाल गांधी ने इसे बड़े बिजनेस में बदलने का सपना देखा और धीरे-धीरे ग्राहकों के बीच अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
जर्मनी से मशीन मंगवाना उस दौर का सबसे बड़ा कदम था
कंपनी की असली ग्रोथ तब शुरू हुई जब वाडीलाल गांधी के बेटे रणछोड़ लाल गांधी ने कारोबार संभाला। उन्होंने सिर्फ दुकान चलाने तक खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि बिजनेस को आधुनिक बनाने पर जोर दिया।
साल 1926 में उन्होंने अहमदाबाद में भारत का पहला व्यवस्थित आइसक्रीम पार्लर शुरू किया। यह उस समय बेहद बड़ा कदम माना गया। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने जर्मनी से आइसक्रीम बनाने की मशीन मंगवाई।
आज के समय में मशीन इंपोर्ट करना आम बात लग सकती है, लेकिन उस दौर में विदेशी मशीन लाना किसी बड़े उद्योगपति के लिए भी आसान नहीं था। इससे कंपनी की उत्पादन क्षमता बढ़ी और आइसक्रीम की गुणवत्ता में भी सुधार आया।
रणछोड़ लाल गांधी ने ग्राहकों तक आइसक्रीम पहुंचाने के लिए होम डिलीवरी जैसी सुविधा भी शुरू की, जो उस समय काफी आधुनिक सोच मानी जाती थी।
भारत को पहली बार चखाया ‘कसाटा’ का स्वाद
वाडीलाल ने भारतीय बाजार में कई नए प्रयोग किए। साल 1950 में कंपनी ने भारतीय ग्राहकों को पहली बार ‘कसाटा’ आइसक्रीम से परिचित कराया।
लेयर्ड डिजाइन वाली यह आइसक्रीम देखते ही देखते लोगों की पसंद बन गई। आज भी कसाटा भारतीय आइसक्रीम बाजार में सबसे लोकप्रिय फ्लेवरों में गिनी जाती है।
उस समय तक कंपनी अहमदाबाद में चार बड़े आउटलेट खोल चुकी थी और स्थानीय बाजार में मजबूत पकड़ बना चुकी थी।
पांच पीढ़ियों ने मिलकर बनाया बड़ा ब्रांड
वाडीलाल की सबसे बड़ी ताकत इसका पारिवारिक बिजनेस मॉडल माना जाता है। पांच पीढ़ियों ने मिलकर इस कंपनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
1970 के दशक में कंपनी ने तेजी से विस्तार करना शुरू किया। इसके बाद वीरेंद्र गांधी, राजेश गांधी, शैलेश गांधी और देवांशु गांधी ने कारोबार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
साल 1985 में कंपनी ने भारत की पहली ऑटोमेटेड आइसक्रीम कैंडी लाइन शुरू की। यह भारतीय आइसक्रीम इंडस्ट्री के लिए बड़ा तकनीकी बदलाव माना गया।
इसके बाद 1989 में कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट हुई और IPO के जरिए पूंजी जुटाई। फिर 1993 में उत्तर प्रदेश के बरेली में बड़ा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाया गया, जिससे उत्तर भारत में कंपनी की पहुंच और मजबूत हो गई।
मजबूत डीलर नेटवर्क बना सबसे बड़ी ताकत
आज वाडीलाल की सफलता के पीछे उसका विशाल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क सबसे बड़ा कारण माना जाता है।
कंपनी के पास देशभर में 1.25 लाख से ज्यादा डीलर और रिटेल नेटवर्क मौजूद है। इसके अलावा कंपनी ने मजबूत कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया, जिसकी मदद से छोटे शहरों और कस्बों तक भी आइसक्रीम पहुंचाई जाने लगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे गर्म मौसम वाले देश में कोल्ड चेन सिस्टम ही किसी आइसक्रीम कंपनी की असली ताकत होता है। वाडीलाल ने इस क्षेत्र में शुरुआती बढ़त हासिल कर ली थी।
इसके अलावा कंपनी ने 100 प्रतिशत शाकाहारी उत्पादों और शुद्ध दूध के इस्तेमाल पर जोर दिया, जिससे ग्राहकों का भरोसा लगातार मजबूत होता गया।
मुश्किल दौर में भी नहीं रुकी कंपनी
हर पुराने बिजनेस की तरह वाडीलाल को भी कई मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा। 1995 के आसपास कंपनी को कारोबार और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
लेकिन कंपनी ने अपनी रणनीतियों में बदलाव किया और सिर्फ आइसक्रीम तक खुद को सीमित नहीं रखा। कंपनी ने फ्रोजन फूड्स जैसे नए क्षेत्रों में भी कदम रखा।
आज कंपनी फ्रोजन पराठा, स्नैक्स और रेडी-टू-कुक उत्पादों के क्षेत्र में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है।
आज 45 देशों तक पहुंच चुका है भारतीय स्वाद
वाडीलाल अब सिर्फ भारतीय कंपनी नहीं रह गई है। कंपनी अमेरिका समेत 45 से अधिक देशों में अपने उत्पाद बेच रही है।
भारतीय फ्लेवर और पारंपरिक स्वाद इसकी सबसे बड़ी पहचान माने जाते हैं। खास बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच वाडीलाल की काफी मजबूत पकड़ है।
वित्त वर्ष 2025 तक कंपनी का राजस्व 1,255 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। NSE के अनुसार कंपनी का मार्केट कैप करीब 3,047 करोड़ रुपये है।
लिम्का बुक में भी दर्ज हो चुका है नाम
वाडीलाल ने साल 2001 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी जगह बनाई थी। कंपनी ने हजारों लीटर आइसक्रीम से दुनिया का सबसे बड़ा आइसक्रीम संडे तैयार किया था।
इसे केवल 60 मिनट में 180 लोगों की टीम ने तैयार किया था। इस रिकॉर्ड ने कंपनी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भी मदद की।
क्या है वाडीलाल की सफलता का असली राज?
विशेषज्ञों के मुताबिक वाडीलाल की सफलता के पीछे कई बड़े कारण रहे समय के साथ तकनीक अपनाना, मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, गुणवत्ता पर लगातार फोकस, भारतीय स्वाद को बनाए रखना, परिवार द्वारा लंबे समय तक स्थिर नेतृत्व इसी वजह से 115 साल से ज्यादा पुरानी यह कंपनी आज भी भारतीय बाजार में मजबूती से खड़ी है।
भारत के बिजनेस इतिहास की प्रेरणादायक कहानी
वाडीलाल की कहानी यह साबित करती है कि बड़ा ब्रांड बनने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि लंबी सोच, गुणवत्ता और लगातार नवाचार की जरूरत होती है।
एक छोटी सी सोडा दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज भारत की सबसे बड़ी आइसक्रीम कंपनियों में शामिल हो चुका है। ऐसे समय में जब कई ब्रांड समय के साथ खत्म हो गए, वाडीलाल ने खुद को लगातार बदलते बाजार के हिसाब से ढाला और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है।
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