दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में आई जबरदस्त तेजी का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखाई देने लगा है। कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं। हालांकि इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत में ईंधन कीमतों में हुई बढ़ोतरी अपेक्षाकृत काफी कम रही है। भारत में इस सप्ताह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3.91 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे कम मानी जा रही है।
आईएएनएस की रिपोर्ट और GlobalPetrolPrices.com के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कई देशों में ईंधन कीमतों में 10% से लेकर 90% तक उछाल देखा गया है। खास बात यह है कि पाकिस्तान, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में पेट्रोल की कीमतें तीन महीने पहले की तुलना में 50% से अधिक बढ़ चुकी हैं। वहीं भारत में यह बढ़ोतरी करीब 4.4% रही है।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर खतरा और कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताओं ने वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों को तेजी से ऊपर पहुंचा दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जिससे तेल आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ गया।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है। हालांकि सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की।
इंडियन ऑयल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियां पिछले 76 दिनों से कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का बोझ खुद उठा रही थीं। लेकिन लगातार नुकसान बढ़ने के कारण अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करना जरूरी हो गया था।
भारत में सबसे कम क्यों बढ़े दाम?
भारत में कीमतों में सीमित बढ़ोतरी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। पहला कारण यह है कि केंद्र सरकार और तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की पूरी मार तुरंत उपभोक्ताओं पर नहीं डाली। अगर वैश्विक स्तर के हिसाब से कीमतें पूरी तरह पास-थ्रू की जातीं, तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल काफी ज्यादा महंगे हो सकते थे।
दूसरा बड़ा कारण रूस से रियायती दरों पर मिलने वाला कच्चा तेल है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल खरीद जारी रखी। इससे भारत को कुछ राहत मिली।
इसके अलावा भारतीय तेल कंपनियां लंबे समय तक घाटा सहन करती रहीं ताकि आम लोगों पर अचानक बड़ा बोझ न पड़े। हालांकि इसका असर अब कंपनियों की बैलेंस शीट पर दिखने लगा है।
पाकिस्तान और मलेशिया में क्यों मचा हाहाकार?
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर बनी हुई है। विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, रुपये की गिरावट और IMF की शर्तों के चलते वहां सरकार ईंधन पर सब्सिडी देने की स्थिति में नहीं है। यही वजह है कि पेट्रोल की कीमतों में करीब 55% तक उछाल आ चुका है।
मलेशिया में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों के दबाव के कारण पेट्रोल महंगा हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात जैसे तेल उत्पादक देशों में भी घरेलू ईंधन कीमतों में 50% से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डीजल की कीमतों में तेजी और भी ज्यादा गंभीर है क्योंकि इसका सीधा संबंध माल ढुलाई, ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन से होता है। इससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक हर चीज महंगी हो सकती है।
अमेरिका में भी बढ़ा दबाव
अमेरिका जैसे विकसित देश भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। वहां कई राज्यों में पेट्रोल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई हैं। अमेरिकी उपभोक्ताओं पर इसका असर ट्रांसपोर्ट और घरेलू खर्च के रूप में दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में दुनिया भर में ईंधन कीमतों में नई बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
पेट्रोल और डीजल सिर्फ वाहन चलाने का खर्च नहीं बढ़ाते, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं। डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है, फल-सब्जियों की कीमतें बढ़ती हैं, ऑनलाइन डिलीवरी महंगी हो सकती है, बस और टैक्सी किराया बढ़ सकता है, निर्माण और औद्योगिक लागत बढ़ती है
भारत में फिलहाल बढ़ोतरी सीमित है, लेकिन अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो आने वाले समय में और दबाव देखने को मिल सकता है।
क्या आगे और बढ़ सकते हैं दाम?
ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले कुछ हफ्ते बेहद अहम होंगे। अगर पश्चिम एशिया तनाव कम होता है, कच्चे तेल की सप्लाई सामान्य रहती है, और वैश्विक बाजार स्थिर होता है, तो कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन अगर युद्ध जैसी स्थिति गहराती है या सप्लाई बाधित होती है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम और बढ़ सकते हैं।
निष्कर्ष
दुनिया भर में ईंधन कीमतों में लगी आग के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की बढ़ोतरी फिलहाल सीमित रही है। हालांकि यह राहत पूरी तरह स्थायी नहीं मानी जा सकती। वैश्विक कच्चे तेल बाजार में जारी अस्थिरता का असर आने वाले दिनों में भारत पर भी पड़ सकता है। ऐसे में सरकार, तेल कंपनियों और उपभोक्ताओं — तीनों के लिए आने वाला समय चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।
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