भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता के लिए एक राहत भरी खबर है—देश खाद्य सुरक्षा के मामले में मजबूत स्थिति में है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा खतरा भी सामने आ रहा है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, खासकर पश्चिम एशिया में चल रहे संकट, भारत के लिए “इंपोर्टेड महंगाई” का कारण बन सकते हैं, खासकर खाने के तेल और दालों में।
Deloitte की हालिया विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास चावल और गेहूं जैसे मुख्य खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार है, लेकिन कुछ जरूरी खाद्य वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भरता इसे वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
भारत की खाद्य सुरक्षा: मजबूत आधार लेकिन सीमाएं भी
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां खाद्यान्न उत्पादन काफी मजबूत है। चावल और गेहूं के मामले में देश न केवल आत्मनिर्भर है बल्कि कई बार निर्यात भी करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चावल का स्टॉक निर्धारित बफर से 3-4 गुना ज्यादा है, जबकि गेहूं का स्टॉक भी सुरक्षित स्तर पर बना हुआ है। इसका मतलब है कि देश के पास घरेलू खपत के लिए पर्याप्त अनाज मौजूद है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। खाने के तेल और दालों के मामले में भारत की स्थिति अलग है, जहां आयात पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
तेल और दालों में आयात निर्भरता क्यों चिंता का विषय?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 55-60% खाद्य तेल आयात करता है। इसके अलावा दालों के लिए भी 10-15% तक आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
यही वजह है कि जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं या सप्लाई चेन प्रभावित होती है, इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है।
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव, खासकर Red Sea और Suez Canal जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों पर असर, भारत के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकते हैं।
अगर इन मार्गों पर शिपिंग महंगी होती है या बाधित होती है, तो खाद्य तेल और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमत और खेती पर असर
कृषि क्षेत्र पर सबसे बड़ा असर इनपुट लागत बढ़ने से पड़ता है। कच्चे तेल की कीमतें अगर बढ़ती हैं, तो डीजल और उर्वरकों (fertilisers) की लागत भी बढ़ जाती है।
डीजल खेती में 15-20% तक लागत का हिस्सा होता है—चाहे वह सिंचाई हो, ट्रांसपोर्ट हो या मशीनरी का इस्तेमाल।
वहीं, उर्वरकों की कीमतें प्राकृतिक गैस से जुड़ी होती हैं, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर निर्भर करती हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि उर्वरक सब्सिडी पर सरकार को हर साल 1.7 से 2 लाख करोड़ रुपये तक खर्च करना पड़ सकता है, और अगर वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो यह बोझ और बढ़ सकता है।
क्या खाद्य संकट का खतरा है?
यह समझना जरूरी है कि फिलहाल भारत में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है। समस्या “उपलब्धता” की नहीं, बल्कि “कीमत” की है।
वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में थोड़ी भी गड़बड़ी होने पर कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
इसका सबसे ज्यादा असर मध्यम और गरीब वर्ग पर पड़ता है, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा खाने-पीने की चीजों पर खर्च होता है।
मानसून: सबसे बड़ा जोखिम फैक्टर
भारत की कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बारिश में 10% की कमी आती है, तो कृषि विकास दर (GVA) में 1-1.5% की गिरावट हो सकती है। साथ ही खाद्य महंगाई में 1-2% तक बढ़ोतरी हो सकती है।
दाल और सब्जियों जैसी फसलों पर इसका असर ज्यादा होता है, जिससे आम जनता को सीधे महंगाई का सामना करना पड़ता है।
सप्लाई चेन में सुधार, लेकिन अभी लंबा रास्ता
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वेयरहाउसिंग और कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किया है।
वेयरहाउस क्षमता 150 मिलियन टन से ज्यादा हो चुकी है, जबकि कोल्ड स्टोरेज क्षमता 35-40 मिलियन टन तक पहुंच गई है।
फिर भी, विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अभी पर्याप्त नहीं है। खासकर कोल्ड चेन में असंतुलन है, जहां ज्यादातर स्टोरेज आलू जैसे सीमित उत्पादों के लिए केंद्रित है।
अगर सप्लाई चेन और मजबूत होती है, तो कीमतों में उतार-चढ़ाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था: धीरे-धीरे सुधार के संकेत
इन चुनौतियों के बावजूद, ग्रामीण भारत में कुछ सकारात्मक संकेत भी दिख रहे हैं।
FMCG कंपनियों की ग्रामीण बिक्री 6-8% की दर से बढ़ रही है, जो शहरी बाजार (4-6%) से बेहतर है।
इसके अलावा ट्रैक्टर बिक्री में भी वृद्धि देखने को मिल रही है, जो इस बात का संकेत है कि किसानों की आय और निवेश क्षमता धीरे-धीरे बढ़ रही है।
हालांकि यह सुधार अभी असमान है और पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है।
निष्कर्ष: संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती
भारत के पास मजबूत खाद्य उत्पादन क्षमता है, जो उसे बड़े संकटों से बचाती है। लेकिन वैश्विक बाजार पर निर्भरता—खासकर खाद्य तेल और दालों में—एक कमजोर कड़ी बनी हुई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में अनिश्चितता के बीच भारत को सावधानी से कदम उठाने होंगे।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी—महंगाई को नियंत्रित रखना, किसानों की लागत को संतुलित करना और सप्लाई चेन को मजबूत बनाना।
अगर इन तीनों मोर्चों पर सही रणनीति अपनाई जाती है, तो भारत न केवल खाद्य सुरक्षा बनाए रख पाएगा, बल्कि वैश्विक संकटों के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर भी रख सकेगा।
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