नेपाल में नववर्ष का स्वागत केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं होता, बल्कि यह परंपरा, आस्था और सामुदायिक उत्साह का जीवंत उत्सव बन जाता है। इस बार भी ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब Sindoor Jatra के दौरान प्राचीन नगर मध्यपुर थिमी पूरी तरह नारंगी रंग में रंग गया।
ढोल-नगाड़ों की गूंज, हवा में उड़ता सिंदूर और श्रद्धालुओं की भीड़—यह सब मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जो किसी भी आगंतुक को मंत्रमुग्ध कर दे। नेपाली नववर्ष 2081 के दूसरे दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
परंपरा और आस्था का संगम
सिंदूर जात्रा का केंद्र है बालकुमारी मंदिर, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं। यह मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है और माना जाता है कि देवी बालकुमारी पूरे काठमांडू घाटी की रक्षक देवी हैं।
इस अवसर पर 26 पारंपरिक पालकियां (खट) मंदिर परिसर में लाई जाती हैं। इन पालकियों को सिंदूर से पूरी तरह रंगा जाता है और श्रद्धालु नृत्य-गान करते हुए इन्हें पूरे नगर में घुमाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पहले इन पालकियों की संख्या 32 हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ यह घटकर 26 रह गई है। फिर भी उत्साह में कोई कमी नहीं आई है।
क्यों खास है सिंदूर जात्रा?
यह त्योहार केवल रंग खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हैं।
“सिंदूर” को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। जब लोग एक-दूसरे पर सिंदूर लगाते हैं, तो यह केवल खुशी का इजहार नहीं बल्कि एक-दूसरे के लिए सुख-समृद्धि की कामना भी होती है।
स्थानीय भाषा में इसे “भुली सिंहा” कहा जाता है—जहां “भुली” का अर्थ नारंगी रंग और “सिंहा” का अर्थ सिंदूर होता है।
यह त्योहार बिस्का जात्रा का भी हिस्सा है, जो नेपाल के भक्तपुर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
संगीत, नृत्य और जीवंत परंपरा
सिंदूर जात्रा का सबसे आकर्षक हिस्सा है इसका पारंपरिक संगीत। “धिमे बाजा” (ढोल और झांझ) की आवाज पूरे शहर में गूंजती है, जिससे माहौल और भी जीवंत हो जाता है।
श्रद्धालु न केवल नाचते-गाते हैं, बल्कि पालकियों के साथ पूरे नगर की परिक्रमा करते हैं। यह दृश्य एक तरह से सामूहिक उत्सव का प्रतीक बन जाता है, जहां पूरा शहर एक परिवार की तरह जश्न मनाता है।
इस दौरान केवल नारंगी रंग का सिंदूर ही इस्तेमाल किया जाता है, जिसे पवित्र माना जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
अनोखी परंपराएं और अनुष्ठान
सिंदूर जात्रा से एक दिन पहले “गुंसिन छोयेकेगु” नामक अनुष्ठान किया जाता है, जिसमें लकड़ी जलाकर एक विशेष पूजा की जाती है।
इसके अलावा, शाम के समय श्रद्धालु तेल के दीये जलाते हैं और कुछ लोग इन्हें अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों—जैसे पैर, छाती और माथे—पर रखकर घंटों तक स्थिर रहते हैं। यह एक प्रकार की तपस्या मानी जाती है।
पास के बोडे शहर में एक और अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां एक श्रद्धालु अपनी जीभ छेदता है। यह धार्मिक आस्था और साहस का प्रतीक माना जाता है।
विदेशी पर्यटकों के लिए खास आकर्षण
सिंदूर जात्रा केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक भक्तपुर पहुंचते हैं और इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं।
एक विदेशी पर्यटक ने बताया कि यह अनुभव उनके देश के नववर्ष से बिल्कुल अलग है। वहां जहां नववर्ष परिवार के साथ शांत माहौल में मनाया जाता है, वहीं नेपाल में पूरा शहर एक साथ जश्न मनाता है।
यही सामूहिकता और उत्साह इस त्योहार को खास बनाता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
सिंदूर जात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।
इस दिन लोग पुराने मतभेद भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं, सिंदूर लगाते हैं और नए साल की शुभकामनाएं देते हैं।
यह त्योहार यह भी दिखाता है कि कैसे परंपराएं समय के साथ बदलते हुए भी अपनी मूल भावना को बनाए रखती हैं।
नेपाल की सांस्कृतिक विरासत का यह एक ऐसा उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बना रहेगा।
निष्कर्ष
नेपाल का सिंदूर जात्रा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है—जहां रंग, संगीत, आस्था और समुदाय एक साथ मिलते हैं।
मध्यपुर थिमी की गलियों में उड़ता नारंगी सिंदूर इस बात का प्रतीक है कि परंपराएं आज भी जीवित हैं और लोगों को जोड़ने का काम कर रही हैं।
नए साल की शुरुआत इस तरह के उत्सव के साथ करना न केवल खुशी देता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि जीवन में रंग, उत्साह और एकता कितनी जरूरी है।
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