नई दिल्ली। एक समय था जब भारत मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के छोटे-छोटे पुर्जों के लिए भी चीन, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों पर निर्भर था। देश की इलेक्ट्रॉनिक्स जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है। अब भारत केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों का उपभोक्ता बाजार नहीं रह गया, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के 12 वर्षों के कार्यकाल के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने पिछले वर्ष चीन को लगभग ₹35,000 करोड़ मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स निर्यात किए। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि चीन को दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र माना जाता है।
आयातक से निर्यातक बनने तक का सफर
भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार लंबे समय तक आयात पर आधारित रहा। स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी और औद्योगिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश कंपोनेंट विदेशों से मंगाए जाते थे। इससे न केवल व्यापार घाटा बढ़ता था बल्कि घरेलू विनिर्माण क्षेत्र का विकास भी सीमित रहता था।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं, सेमीकंडक्टर मिशन, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर और अन्य प्रोत्साहन कार्यक्रमों के माध्यम से घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कई वैश्विक कंपनियों ने भारत में उत्पादन इकाइयां स्थापित कीं और स्थानीय सप्लाई चेन विकसित होने लगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में बढ़ोतरी केवल उत्पादन क्षमता का संकेत नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारतीय कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा कर रही हैं।
चीन को निर्यात क्यों है बड़ी उपलब्धि?
चीन दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादक देश है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, नेटवर्किंग उपकरण और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक है। ऐसे देश को भारत से इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स का निर्यात होना इस बात का संकेत है कि भारतीय कंपनियां अब वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बन चुकी हैं।
अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत अब केवल अंतिम उत्पादों की असेंबली तक सीमित नहीं रहना चाहता। सरकार का लक्ष्य उन महत्वपूर्ण पुर्जों और कंपोनेंट्स का उत्पादन बढ़ाना है जिन पर पूरी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री आधारित होती है।
विशेष रूप से मोबाइल फोन, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB), कैमरा मॉड्यूल, चार्जिंग सिस्टम, डिस्प्ले से जुड़े कंपोनेंट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल के क्षेत्र में भारत की क्षमता बढ़ रही है।
25 लाख नौकरियां बनने का दावा
इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के विस्तार का सबसे बड़ा लाभ रोजगार के रूप में देखने को मिल रहा है। मंत्री के अनुसार इस सेक्टर में अब तक लगभग 25 लाख रोजगार अवसर पैदा हुए हैं। इनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की नौकरियां शामिल हैं।
इन नौकरियों का बड़ा हिस्सा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, कंपोनेंट उत्पादन, लॉजिस्टिक्स, डिजाइन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और सप्लाई चेन प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। सरकार का दावा है कि इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बनने वाली नौकरियां अपेक्षाकृत बेहतर वेतन और कौशल आधारित अवसर प्रदान कर रही हैं।
‘स्क्रूड्राइवर इकॉनमी’ वाली आलोचना पर जवाब
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को लेकर अक्सर यह आलोचना की जाती रही है कि देश केवल आयातित पुर्जों को जोड़ने का काम करता है और वास्तविक मूल्य संवर्धन सीमित है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अश्विनी वैष्णव ने कहा कि दुनिया के लगभग सभी बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण देशों ने इसी मॉडल से शुरुआत की थी।
उन्होंने कहा कि चीन, वियतनाम और ताइवान ने भी पहले अंतिम उत्पादों की असेंबली से शुरुआत की, फिर मॉड्यूल निर्माण और उसके बाद कंपोनेंट निर्माण की ओर बढ़े। भारत भी इसी विकास यात्रा पर आगे बढ़ रहा है।
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी देश के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में प्रवेश का शुरुआती चरण असेंबली ही होता है। इसके बाद धीरे-धीरे स्थानीय उत्पादन और अनुसंधान क्षमता विकसित होती है।
सरकार का अगला लक्ष्य क्या है?
सरकार अब इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर विशेष ध्यान दे रही है। मंत्री ने बताया कि वर्तमान में देश में लगभग 75 नई कंपोनेंट फैक्ट्रियों का निर्माण कार्य चल रहा है। अगले दो से तीन वर्षों में इस संख्या को बढ़ाकर 250 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
यदि यह लक्ष्य हासिल होता है तो भारत इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन के साथ-साथ कंपोनेंट निर्माण में भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
ECMS योजना से मिलेगा बड़ा बढ़ावा
मार्च 2026 में सरकार ने Electronics Component Manufacturing Scheme (ECMS) के तहत 29 नए प्रस्तावों को मंजूरी दी। इन परियोजनाओं में लगभग ₹7,104 करोड़ के निवेश का अनुमान है।
सरकार के अनुसार इन परियोजनाओं से करीब ₹84,515 करोड़ का उत्पादन होगा और 14,246 प्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा होंगे।
इससे पहले भी सरकार ₹54,567 करोड़ के निवेश से जुड़े 46 प्रस्तावों को मंजूरी दे चुकी है। इन निवेशों का उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
इलेक्ट्रॉनिक्स आज वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5G नेटवर्क, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन और स्मार्ट डिवाइस जैसी नई तकनीकों की बढ़ती मांग के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
भारत यदि इस क्षेत्र में मजबूत सप्लाई चेन विकसित करने में सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात देश की सबसे बड़ी निर्यात श्रेणियों में शामिल हो सकता है। इससे रोजगार, निवेश और विदेशी मुद्रा आय तीनों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
फिलहाल चीन को ₹35,000 करोड़ के इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स का निर्यात इस दिशा में भारत की बढ़ती क्षमता का संकेत माना जा रहा है। सरकार और उद्योग दोनों को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और निर्यात के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो सकता है।


