प्रस्तावना: एक संकट जिसने सोच बदल दी
वेस्ट एशिया में हाल ही में हुए संघर्ष ने दुनिया को यह एहसास दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल सप्लाई का मामला नहीं, बल्कि रणनीतिक स्थिरता का सवाल भी है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
इसी पृष्ठभूमि में Arun Kumar Singh, जो Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) के चेयरमैन और सीईओ हैं, ने एक अहम चेतावनी दी है। उनका कहना है कि भारत को अब यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि वेस्ट एशिया की भौगोलिक निकटता हमेशा उसे सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करेगी।
क्या हुआ था: जब एक रास्ता बंद हुआ और दुनिया हिल गई
करीब छह हफ्तों तक चले इस संघर्ष के दौरान वह प्रमुख समुद्री मार्ग बंद हो गया, जिसके जरिए खाड़ी देश कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और एलपीजी जैसे ऊर्जा संसाधनों का निर्यात करते हैं।
यह वही मार्ग था जो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई की रीढ़ माना जाता है। इसके बंद होते ही:
- कई देशों में ईंधन की कमी पैदा हुई
- गैस और तेल की कीमतों में तेजी आई
- सप्लाई चेन बाधित हो गई
भारत को भी इस स्थिति में गैस सप्लाई को प्राथमिकता देनी पड़ी, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकें।
भारत की निर्भरता: असली चिंता यहीं है
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा अभी भी आयात पर आधारित है। आंकड़ों पर नजर डालें तो:
- लगभग 50% कच्चा तेल वेस्ट एशिया से आता है
- करीब 30% गैस की आपूर्ति वहीं से होती है
- एलपीजी की जरूरत का 85-90% आयात से पूरा होता है
इसका मतलब साफ है कि अगर वेस्ट एशिया में अस्थिरता आती है, तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है।
ONGC प्रमुख की चेतावनी: “अब दुनिया बदल चुकी है”
Arun Kumar Singh ने इस स्थिति को “paradigm shift” बताया है। उनके अनुसार, दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही, जहां वैश्वीकरण (globalisation) के कारण सप्लाई चेन स्थिर रहती थी।
उन्होंने साफ कहा कि अगर दुनिया धीरे-धीरे de-globalisation की ओर बढ़ती है, तो देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव बढ़ेंगे। इसका सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा।
उनका यह भी मानना है कि आने वाले 30-40 वर्षों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव जारी रहेगा, जिससे “सुप्रीमसी की लड़ाई” जैसी स्थिति बनी रह सकती है।
रणनीतिक भंडारण: अब विकल्प नहीं, जरूरत
इस पूरे संकट से जो सबसे बड़ा सबक निकलता है, वह है ऊर्जा भंडारण की आवश्यकता।
ONGC प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत को बड़े पैमाने पर तेल और गैस का भंडारण करना होगा, ताकि किसी भी आपात स्थिति में देश के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद रहे।
रणनीतिक भंडारण के फायदे:
- अचानक सप्लाई रुकने पर सुरक्षा
- कीमतों में तेज उछाल से बचाव
- संकट के समय स्थिरता
उनका संदेश साफ था — “जो भी करना पड़े, हमें स्टोरेज बढ़ाना होगा।”
घरेलू उत्पादन: अब ‘अस्तित्व’ का सवाल
भारत अब तक अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहा है, लेकिन ONGC प्रमुख के अनुसार अब यह रणनीति बदलनी होगी।
उन्होंने घरेलू उत्पादन को “existential necessity” यानी अस्तित्व का सवाल बताया।
इसका मतलब है कि:
- देश के भीतर तेल और गैस की खोज को तेज करना होगा
- deepwater exploration जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा
- नई तकनीकों को अपनाना होगा
उनका यह भी कहना था कि जहां भी संसाधन मिलें, उन्हें निकालने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि संकट के समय कोई देश दूसरे की मदद नहीं करता।
बदलती वैश्विक राजनीति: resource nationalism का खतरा
इस संकट ने एक और महत्वपूर्ण प्रवृत्ति को उजागर किया है — resource nationalism।
इसका मतलब है कि संसाधन-समृद्ध देश अब अपने तेल और गैस को आसानी से निर्यात करने के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
Arun Kumar Singh ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब देश चाहते हैं कि वे संसाधनों की बजाय उनके बदले पैसा लें।
यह प्रवृत्ति भविष्य में ऊर्जा आयात करने वाले देशों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
विविधीकरण की जरूरत: एक स्रोत पर भरोसा जोखिम भरा
ONGC प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में विविधता लानी होगी।
इसका मतलब केवल अलग-अलग देशों से आयात करना नहीं, बल्कि:
- ऊर्जा के अलग-अलग स्रोत अपनाना
- सप्लाई चेन को मजबूत करना
- स्टोरेज सिस्टम को विस्तारित करना
यह कदम भारत को भविष्य के संकटों से बेहतर तरीके से निपटने में मदद करेगा।
घरेलू उपयोग में बदलाव: LPG से PNG की ओर
घरेलू स्तर पर भी कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही है।
भारत ने एलपीजी उत्पादन में सुधार किया है और अब घरेलू आपूर्ति लगभग 60% तक पहुंच गई है, जो पहले करीब 30% थी। हालांकि, यह बदलाव आसान नहीं था और इसके लिए रिफाइनरियों को अपनी प्रक्रियाएं बदलनी पड़ीं।
ONGC प्रमुख ने सुझाव दिया कि घरों में CNG की बजाय पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि पाइपलाइन के जरिए गैस की सप्लाई ज्यादा स्थिर रहती है और संकट के समय भी रसोई का काम बाधित नहीं होता।
बाजार की अनिश्चितता: अब कोई पैटर्न नहीं
इस संकट ने ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को भी उजागर किया है।
ONGC प्रमुख के अनुसार, अब refining economics पहले की तरह predictable नहीं रहे। कुछ मामलों में तो यह देखा गया कि तैयार उत्पाद का मार्जिन कच्चे तेल की कीमत से भी ज्यादा हो गया।
यह स्थिति उनके 40 साल के करियर में पहली बार देखने को मिली।
इसका मतलब है कि ऊर्जा बाजार अब पहले से कहीं ज्यादा जटिल और अस्थिर हो चुका है।
विश्लेषण: भारत को क्या करना चाहिए?
इस पूरे घटनाक्रम से भारत के लिए कुछ स्पष्ट संदेश निकलते हैं:
पहला, केवल भौगोलिक निकटता पर भरोसा करना अब पर्याप्त नहीं है।
दूसरा, ऊर्जा भंडारण को प्राथमिकता देनी होगी।
तीसरा, घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।
चौथा, ऊर्जा स्रोतों और सप्लाई चेन में विविधता लानी होगी।
पांचवां, वैश्विक राजनीति को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी।
निष्कर्ष: ऊर्जा सुरक्षा ही असली ताकत
वेस्ट एशिया संकट ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक और रणनीतिक मजबूती का आधार है।
Arun Kumar Singh की चेतावनी केवल वर्तमान स्थिति का विश्लेषण नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक दिशा-निर्देश भी है।
भारत ने इस संकट का सामना अच्छी तरह किया, लेकिन आने वाले समय में चुनौतियां और जटिल हो सकती हैं। ऐसे में जरूरी है कि देश अभी से अपनी ऊर्जा नीति को मजबूत और लचीला बनाए, ताकि किसी भी वैश्विक संकट का असर न्यूनतम हो।
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