भारत एक तरफ महंगी एलएनजी (LNG) आयात करने को मजबूर है तो दूसरी तरफ देश में ही उत्पादित होने वाली बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस बिना इस्तेमाल के बेकार पड़ी हुई है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस गैस को उपयोग में लाने के रास्ते में कोई तकनीकी चुनौती नहीं बल्कि एक नियामकीय अड़चन खड़ी है। पूर्वोत्तर भारत में मौजूद पाइपलाइन नेटवर्क महज 100 मीटर की दूरी पर आकर समाप्त हो जाते हैं, लेकिन मौजूदा नियमों के कारण इन्हें आपस में जोड़ा नहीं जा सकता। ऊर्जा कंपनियों का कहना है कि यदि इस बाधा को दूर कर दिया जाए तो कुछ ही हफ्तों में लाखों घन मीटर गैस राष्ट्रीय ग्रिड में पहुंचाई जा सकती है।
देश में गैस की कमी, फिर भी बेकार पड़ी है बड़ी मात्रा
भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन और औद्योगिक इकाइयों में प्राकृतिक गैस की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके बावजूद पूर्वोत्तर क्षेत्र में उत्पादित होने वाली बड़ी मात्रा में गैस का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
ऊर्जा कंपनियों के अनुसार पूर्वोत्तर से होने वाले कुल घरेलू गैस उत्पादन का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा यानी करीब 14 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन (MMSCMD) गैस बिना इस्तेमाल के पड़ी हुई है। दूसरी ओर भारत को गैस की मांग पूरी करने के लिए बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात करनी पड़ रही है।
वर्तमान समय में देश करीब 95 MMSCMD एलएनजी आयात कर रहा है, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 19 से 20 डॉलर प्रति MMBtu तक पहुंच रही है। इससे विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ रहा है। उद्योग जगत का अनुमान है कि इस स्थिति के कारण भारत को सालाना लगभग 50 करोड़ डॉलर यानी करीब 4,700 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। दैनिक आधार पर यह नुकसान करीब 13 करोड़ रुपये बैठता है।
आखिर क्या है 100 मीटर वाली समस्या?
पूर्वोत्तर भारत में तीन प्रमुख गैस पाइपलाइन नेटवर्क मौजूद हैं।
- दुलियाजान-नुमालीगढ़ पाइपलाइन
- असम गैस कंपनी लिमिटेड (AGCL) नेटवर्क
- इंद्रधनुष गैस ग्रिड लिमिटेड (IGGL) नेटवर्क
तकनीकी रूप से ये नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये पाइपलाइनें नुमालीगढ़ रिफाइनरी के आसपास लगभग 100 मीटर के दायरे में आकर समाप्त हो जाती हैं। यदि इन्हें जोड़ दिया जाए तो बड़ी मात्रा में फंसी हुई गैस बाजार तक पहुंच सकती है।
लेकिन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (PNGRB) के मौजूदा नियमों के तहत कॉमन कैरियर पाइपलाइन और क्षेत्रीय पाइपलाइन नेटवर्क को जोड़ने की अनुमति नहीं है। यही कारण है कि गैस उपलब्ध होने के बावजूद उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पा रही है।
कंपनियों ने PNGRB से क्या मांग की है?
ऑयल इंडिया (OIL), ओएनजीसी (ONGC), हिंदुस्तान ऑयल एक्सप्लोरेशन कंपनी, ऑयलमैक्स एनर्जी और वेदांता जैसी कंपनियों ने PNGRB से नियमों में अस्थायी छूट देने की मांग की है।
कंपनियों का तर्क है कि यदि नियामक सिर्फ एक बार अंतरिम अनुमति दे दे तो लगभग छह सप्ताह के भीतर 6 से 8 MMSCMD अतिरिक्त गैस राष्ट्रीय गैस नेटवर्क में पहुंचाई जा सकती है।
ऑयलमैक्स एनर्जी के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक कपिल गर्ग के अनुसार समाधान बेहद सरल है। उनके मुताबिक पाइपलाइन इंटरकनेक्शन की अस्थायी मंजूरी मिलने पर ऊपरी असम में फंसी गैस को तेजी से बाजार तक पहुंचाया जा सकता है और इससे देश की गैस कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
पूर्वोत्तर में मौजूद है विशाल गैस भंडार
पूर्वोत्तर भारत को देश का ऊर्जा केंद्र माना जाता है। असम और त्रिपुरा में दशकों से तेल और गैस का उत्पादन हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में लगभग 200 अरब घन मीटर का रिकवरेबल गैस रिजर्व मौजूद है।
ऑयल इंडिया का दुलियाजान क्षेत्र, ओएनजीसी के लकवा और गेलेकी फील्ड तथा त्रिपुरा का अगरतला डोम लंबे समय से देश की ऊर्जा जरूरतों में योगदान दे रहे हैं। इसके बावजूद पर्याप्त पाइपलाइन कनेक्टिविटी नहीं होने से इन संसाधनों का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि पूर्वोत्तर के गैस भंडार का प्रभावी उपयोग हो जाए तो भारत की आयात निर्भरता में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
पांच राज्य राजधानियां अब भी गैस नेटवर्क से बाहर
पूर्वोत्तर में गैस उत्पादन होने के बावजूद कई प्रमुख शहर पाइपलाइन गैस सुविधा से वंचित हैं। शिलांग, इम्फाल, कोहिमा, आइजोल और गंगटोक जैसी राज्य राजधानियां आज भी पाइपलाइन गैस नेटवर्क से पूरी तरह नहीं जुड़ी हैं।
इसका असर घरेलू उपभोक्ताओं, छोटे उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पड़ता है। यदि क्षेत्रीय नेटवर्क को राष्ट्रीय गैस ग्रिड से बेहतर तरीके से जोड़ा जाए तो इन शहरों को भी सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।
शुरुआती योजना की गलतियों का असर
इंद्रधनुष गैस ग्रिड लिमिटेड (IGGL) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुब्रत दास के अनुसार शुरुआत में गैस मांग का सही आकलन नहीं किया गया था। कई क्षेत्रों को डिमांड सर्वे में शामिल ही नहीं किया गया। उस समय घरेलू गैस की कीमतें कम थीं, इसलिए उत्पादकों को अतिरिक्त उत्पादन आर्थिक रूप से आकर्षक नहीं लगा।
अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। गैस की मांग और कीमत दोनों बढ़ चुकी हैं, लेकिन पर्याप्त निकासी अवसंरचना उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि दुलियाजान जैसे क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में गैस उत्पादन के बावजूद उसका व्यावसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
भारत आने वाले वर्षों में गैस आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। सरकार प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी ऊर्जा मिश्रण में बढ़ाना चाहती है। ऐसे में घरेलू उत्पादन को अधिकतम उपयोग में लाना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि पूर्वोत्तर की अतिरिक्त गैस को बाजार तक पहुंचाने का रास्ता खुलता है तो इससे कई फायदे हो सकते हैं—
- एलएनजी आयात पर निर्भरता घटेगी।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- गैस आधारित उद्योगों को राहत मिलेगी।
- पूर्वोत्तर राज्यों में निवेश बढ़ेगा।
- सिटी गैस नेटवर्क का विस्तार आसान होगा।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
आगे क्या?
अब पूरी नजर PNGRB के फैसले पर है। यदि नियामक कंपनियों की मांग मान लेता है तो अगले कुछ सप्ताह में पूर्वोत्तर की बड़ी मात्रा में फंसी गैस उपयोग में लाई जा सकती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की गैस आपूर्ति बढ़ाने का सबसे तेज और सबसे कम लागत वाला समाधान साबित हो सकता है।
महज 100 मीटर की दूरी और कुछ नियामकीय बदलाव देश को हर दिन होने वाले करोड़ों रुपये के नुकसान से बचा सकते हैं। ऐसे में यह मामला केवल पूर्वोत्तर की पाइपलाइन का नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा बचत और दीर्घकालिक आर्थिक हितों से भी जुड़ा हुआ है।
स्रोत: Economic Times, PNGRB, Oil India, ONGC, Indradhanush Gas Grid Limited (IGGL)


