India Defence Sector Growth: भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक, देश का घरेलू रक्षा उत्पादन 2014 के करीब ₹46,000 करोड़ से बढ़कर अब लगभग ₹1.80 लाख करोड़ हो गया है। इसी अवधि में रक्षा निर्यात भी करीब ₹1,000 करोड़ से बढ़कर ₹39,000 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है।
सरकार की कोशिश अब सिर्फ घरेलू जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण और निर्यात के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की है। वित्त वर्ष 2028-29 तक रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
2014 से 2026 तक रक्षा क्षेत्र में बड़ा बदलाव
राजनाथ सिंह ने रक्षा क्षेत्र की प्रगति का जिक्र करते हुए बताया कि साल 2014 में भारत में हथियारों और गोला-बारूद समेत रक्षा उत्पादन का मूल्य करीब ₹46,000 करोड़ था। अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग ₹1.80 लाख करोड़ हो चुका है।
रक्षा निर्यात के मोर्चे पर भी भारत ने उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। 2014 में जहां रक्षा निर्यात करीब ₹1,000 करोड़ था, वहीं अब यह लगभग ₹39,000 करोड़ तक पहुंच गया है। यह बदलाव भारत की बढ़ती घरेलू विनिर्माण क्षमता और वैश्विक बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
जबलपुर में ₹472 करोड़ का नया प्लांट
रक्षा मंत्री ने मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में T-सीरीज के मेन बैटल टैंकों के ओवरहॉलिंग के लिए बनने वाले ₹472 करोड़ के नए प्लांट का शिलान्यास किया।
यह प्लांट सालाना करीब 80 T-72 और T-90 टैंकों की ओवरहॉलिंग यानी मरम्मत, रखरखाव और अपग्रेडेशन करने में सक्षम होगा। भारतीय सेना को हर साल लगभग 230 T-सीरीज टैंकों के ओवरहॉल की जरूरत होती है।
फिलहाल चेन्नई के आवडी स्थित हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में सालाना करीब 150 टैंकों की ओवरहॉलिंग की जाती है। जबलपुर में नया प्लांट शुरू होने के बाद अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध होगी, जिससे सेना के टैंकों के रखरखाव की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।
अब हथियारों के साथ मेंटेनेंस क्षमता भी बढ़ी
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत अब केवल आधुनिक हथियारों और सैन्य उपकरणों का निर्माण करने वाला देश नहीं रह गया है, बल्कि इनके रखरखाव, ओवरहॉलिंग और अपग्रेडेशन की क्षमता भी विकसित कर रहा है।
यह क्षमता रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी सैन्य प्लेटफॉर्म की प्रभावशीलता केवल उसके निर्माण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि लंबे समय तक उसके रखरखाव और अपग्रेडेशन पर भी निर्भर करती है। जबलपुर का नया प्लांट इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्थानीय युवाओं को मिलेंगे रोजगार के अवसर
नए रक्षा प्लांट से जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है। रक्षा क्षेत्र से जुड़े उत्पादन, रखरखाव और इंजीनियरिंग कार्यों के विस्तार से स्थानीय स्तर पर तकनीकी कौशल की मांग भी बढ़ सकती है।
इसके अलावा, टैंकों की ओवरहॉलिंग की क्षमता बढ़ने से भारतीय सेना के महत्वपूर्ण सैन्य प्लेटफॉर्म को समय पर तैयार रखने में मदद मिलेगी। इससे ऑपरेशनल रेडीनेस को मजबूत करने में भी योगदान मिल सकता है।
1969 में हुई थी व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर की स्थापना
व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर का इतिहास करीब छह दशक पुराना है। इसकी स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी। वर्तमान में यह आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के तहत काम करती है।
फैक्ट्री के शुरुआती दौर में जर्मनी की MAN कंपनी के सहयोग से ‘शक्तिमान 3-टन’ ट्रक बनाए गए। इसके अलावा जापान की निसान कंपनी के सहयोग से ‘निसान 1T’ और ‘जोन्गा’ जैसे वाहनों का भी निर्माण किया गया।
आज VFJ भारतीय रक्षा उत्पादन ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। करीब 330 एकड़ में फैली फैक्ट्री और इसके लगभग 600 एकड़ के संलग्न एस्टेट का उपयोग रक्षा वाहनों और सैन्य जरूरतों से जुड़े कार्यों के लिए किया जाता है।
आत्मनिर्भर भारत को मिल रही मजबूती
भारत के रक्षा क्षेत्र में उत्पादन और निर्यात में हुई वृद्धि सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के प्रमुख परिणामों में से एक के रूप में देखी जा रही है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी निर्भरता कम करने में मदद मिलती है और भारतीय कंपनियों के लिए वैश्विक रक्षा बाजार में अवसर भी बढ़ते हैं।
₹1.80 लाख करोड़ के रक्षा उत्पादन और करीब ₹39,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का आंकड़ा भारत की बदलती रक्षा औद्योगिक क्षमता को दिखाता है। अब सरकार की नजर अगले लक्ष्य यानी वित्त वर्ष 2028-29 तक ₹50,000 करोड़ के रक्षा निर्यात पर है।


