भारत लगातार दुनिया के बड़े देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन कर रहा है, लेकिन एक सेक्टर ऐसा है जिसे हर बार इन समझौतों से बाहर रखा जाता है—डेयरी। हाल ही में Piyush Goyal ने साफ किया कि भारत ने अब तक किसी भी FTA में डेयरी सेक्टर को खोलने की अनुमति नहीं दी है, चाहे बात European Union, United Kingdom, Australia या New Zealand की ही क्यों न हो।
यह फैसला सिर्फ व्यापार नीति नहीं, बल्कि करोड़ों छोटे किसानों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
क्यों नहीं खुलता डेयरी सेक्टर?
भारत का डेयरी मॉडल पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। यहाँ उत्पादन बड़े औद्योगिक फार्म्स के बजाय छोटे और सीमांत किसानों के हाथ में है। ज्यादातर किसान कुछ ही पशु रखते हैं और उसी से उनकी आय का बड़ा हिस्सा आता है।
यही वजह है कि सरकार को डर रहता है कि अगर विदेशी कंपनियों को सीधे भारतीय बाजार में एंट्री मिल गई, तो बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले देशों से सस्ता दूध और डेयरी उत्पाद भारत में आ सकते हैं। इससे स्थानीय किसानों की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ सकती है।
गॉयल ने भी यही बात दोहराई कि भारत का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है—डेयरी सेक्टर को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए पूरी तरह खोलना अभी सही नहीं होगा।
क्या FTA में डेयरी पूरी तरह बाहर है?
यह समझना जरूरी है कि भारत ने डेयरी सेक्टर को पूरी तरह “बंद” नहीं किया है, बल्कि इसे संतुलित तरीके से मैनेज किया है।
सरकार विदेशी कंपनियों को कच्चा माल भारत लाकर उसे प्रोसेस करने और फिर 100% निर्यात करने की अनुमति देती है। यानी उत्पादन भारत में हो सकता है, लेकिन वह घरेलू बाजार में नहीं बेचा जा सकता।
इस मॉडल का फायदा यह है कि:
- देश में रोजगार बढ़ता है
- विदेशी मुद्रा आती है
- किसानों को भी सप्लाई चेन में हिस्सा मिल सकता है
और सबसे अहम—घरेलू बाजार सुरक्षित रहता है।
न्यूज़ीलैंड डील में क्या खास है?
हाल ही में India और New Zealand के बीच हुए समझौते में भी यही रणनीति अपनाई गई है। न्यूज़ीलैंड दुनिया के सबसे बड़े डेयरी निर्यातकों में से एक है, इसलिए यह सेक्टर बातचीत का अहम हिस्सा रहा।
इस समझौते के तहत:
- कुछ उत्पादों पर सीमित (quota-based) छूट दी गई है
- bulk infant formula और कुछ डेयरी प्रोडक्ट्स पर धीरे-धीरे शुल्क घटाया जाएगा
- लेकिन घरेलू बाजार को पूरी तरह नहीं खोला गया
यह दिखाता है कि भारत धीरे-धीरे और नियंत्रित तरीके से ही डेयरी सेक्टर में बदलाव ला रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
दिलचस्प बात यह है कि न्यूज़ीलैंड का भारत को डेयरी निर्यात अभी बहुत छोटा है—FY25 में यह करीब 1.07 मिलियन डॉलर रहा। इसमें दूध, क्रीम, चीज़ और बटर जैसे उत्पाद शामिल हैं।
यानी फिलहाल खतरा बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन लंबी अवधि में अगर छूट बढ़ती है तो प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
डिजिटल पेमेंट और FTA: एक नया आयाम
इस समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—डिजिटल पेमेंट सहयोग। दोनों देश रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम को जोड़ने की दिशा में काम करेंगे, जिससे cross-border payments और remittances आसान हो सकते हैं।
यह पहल भारत के डिजिटल इकोसिस्टम, खासकर UPI आधारित मॉडल, को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने में मदद कर सकती है।
हालांकि, इस सिस्टम को लागू करना आसान नहीं है और इसमें केंद्रीय बैंकों की बड़ी भूमिका होगी।
बड़ा सवाल: संरक्षण बनाम प्रतिस्पर्धा
यह पूरी बहस आखिरकार एक बड़े सवाल पर आकर टिकती है—क्या भारत को अपने डेयरी सेक्टर को पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहिए या धीरे-धीरे उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना चाहिए?
एक तरफ छोटे किसानों की आजीविका है, जो इस सेक्टर की रीढ़ हैं। दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार के अवसर हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जा सकते हैं।
फिलहाल सरकार का झुकाव साफ है—पहले किसानों की सुरक्षा, फिर धीरे-धीरे सुधार।
निष्कर्ष
भारत का डेयरी सेक्टर सिर्फ एक उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढांचे का अहम हिस्सा है। यही कारण है कि सरकार इसे FTA के दायरे से बाहर रखने की नीति पर कायम है।
हालांकि, बदलती वैश्विक परिस्थितियों और व्यापारिक दबावों के बीच भविष्य में इसमें कुछ नरमी देखने को मिल सकती है, लेकिन फिलहाल भारत का संदेश साफ है—डेयरी सेक्टर में जल्दबाजी नहीं होगी।
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