Housing Prices: देश के प्रमुख शहरों में अपना घर खरीदना ही नहीं, बल्कि नया घर बनवाना भी लगातार महंगा होता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जमीन से लेकर निर्माण सामग्री और साइट पर काम करने की लागत तक में इजाफा हुआ है। इसका सीधा असर रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और घरों की कीमतों पर देखने को मिल रहा है।
Anarock Research की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच देश के सात प्रमुख शहरों में घरों की औसत कीमत करीब 59% बढ़ी, जबकि इसी अवधि में आवासीय निर्माण लागत में लगभग 34% का इजाफा हुआ। यानी घरों की कीमत निर्माण लागत की तुलना में कहीं तेज रफ्तार से बढ़ी है।
रिपोर्ट के अनुसार, घरों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी में करीब 66% योगदान निर्माण लागत का रहा। इसके अलावा जमीन की कीमत, डेवलपर मार्जिन और मांग-सप्लाई जैसे फैक्टर भी प्रॉपर्टी के दाम बढ़ाने में अहम रहे हैं।
2021 से 2025 के बीच कितनी बढ़ी घर बनाने की लागत?
Anarock के आंकड़ों के अनुसार, 2021 में एक स्टैंडर्ड-प्लस रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट की औसत निर्माण लागत करीब ₹2,681 प्रति वर्ग फुट थी। 2025 तक यह बढ़कर लगभग ₹3,604 प्रति वर्ग फुट पहुंच गई।
इस तरह चार साल की अवधि में निर्माण लागत में करीब 34% की वृद्धि हुई। सालाना आधार पर इसकी औसत बढ़ोतरी लगभग 6.9% रही।
दूसरी ओर, घरों की औसत कीमत 2021 में करीब ₹5,826 प्रति वर्ग फुट थी, जो 2025 में बढ़कर ₹9,260 प्रति वर्ग फुट हो गई। यानी इस अवधि में घरों की कीमत करीब 59% बढ़ी और सालाना वृद्धि लगभग 12% रही।
घरों के दाम बढ़ने में निर्माण लागत की बड़ी भूमिका
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में घरों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा निर्माण लागत में वृद्धि से जुड़ा है। Anarock का अनुमान है कि कुल मूल्य वृद्धि में करीब 66% हिस्सा निर्माण लागत का रहा।
बाकी बढ़ोतरी में जमीन की कीमत, डेवलपर का मार्जिन, मांग और सप्लाई के बीच अंतर तथा प्रोजेक्ट की लोकेशन जैसे कारकों का योगदान रहा।
Anarock Group के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के अनुसार, देश के बड़े शहरों में जमीन की कीमतों में तेजी ने डेवलपर्स की लागत बढ़ाई है। इसके अलावा बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर वाले इलाकों में बढ़ती मांग और सीमित जमीन उपलब्धता का असर भी प्रॉपर्टी की कीमतों पर पड़ा है।
जमीन की कीमतों में 120% तक उछाल
रियल एस्टेट सेक्टर के लिए जमीन की बढ़ती कीमत सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच सात प्रमुख शहरों में जमीन की कीमतों में लगभग 50% से 120% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
NCR यानी दिल्ली-एनसीआर में कुछ इलाकों में जमीन की कीमत 70% से 130% तक बढ़ी। वहीं बेंगलुरु में जमीन की कीमतों में करीब 60% से 120% तक का उछाल देखने को मिला।
जमीन की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ डेवलपर की लागत तक सीमित नहीं रहता। जब किसी इलाके में जमीन महंगी होती है, तो डेवलपर आमतौर पर उस लागत को प्रोजेक्ट की बिक्री कीमत में शामिल करता है। यही वजह है कि बेहतर कनेक्टिविटी और तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में घरों की कीमतें अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ सकती हैं।
पश्चिम एशिया तनाव ने भी बढ़ाई निर्माण लागत
रियल एस्टेट सेक्टर पर सिर्फ घरेलू लागत का दबाव नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भी निर्माण से जुड़ी सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पर असर डाला है।
Anarock के अनुमान के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट के कारण निर्माण लागत पर 8-10% तक अतिरिक्त दबाव पड़ा है। खासतौर पर स्टील और ईंधन से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत में बढ़ोतरी ने डेवलपर्स की चिंता बढ़ाई है।
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
- स्टील की कीमत: करीब 20% बढ़ी
- TMT बार: लगभग ₹72,000 प्रति टन
- ईंधन और साइट लॉजिस्टिक्स: 15-20% तक महंगे
- टाइल्स, ग्लास और हार्डवेयर: 8-12% तक महंगे
- MEP लागत: 9-13% तक बढ़ी
निर्माण सामग्री के साथ-साथ सामान को साइट तक पहुंचाने की लागत बढ़ने से भी कुल प्रोजेक्ट कॉस्ट पर दबाव बढ़ा है।
लेबर अभी भी निर्माण लागत का बड़ा हिस्सा
किसी भी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में मजदूरों की लागत महत्वपूर्ण होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुल निर्माण लागत में लेबर का हिस्सा करीब 25-30% तक रहता है।
हालांकि, हाल की अवधि में लेबर कॉस्ट में वृद्धि अन्य कई निर्माण घटकों की तुलना में सीमित रही है। इसमें करीब 5-6% की बढ़ोतरी हुई है।
इसी तरह सीमेंट की कीमतों में लगभग 4-5% की वृद्धि हुई है। इसके मुकाबले MEP यानी Mechanical, Electrical और Plumbing से जुड़ी लागत में ज्यादा तेजी देखी गई है।
MEP लागत में तेजी ने बढ़ाई चिंता
2023 से 2025 के बीच कोर बिल्डिंग की निर्माण लागत करीब 13% बढ़कर ₹2,212 प्रति वर्ग फुट हो गई। इसी दौरान MEP लागत में 17% से ज्यादा की वृद्धि हुई और यह लगभग ₹788 प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गई।
2025 में कुल निर्माण लागत में MEP का हिस्सा करीब 22% रहा। इससे पता चलता है कि आधुनिक आवासीय प्रोजेक्ट्स में सिर्फ ईंट, सीमेंट और स्टील ही लागत बढ़ाने वाले प्रमुख घटक नहीं हैं। इलेक्ट्रिकल, प्लंबिंग, एयर-कंडीशनिंग और अन्य तकनीकी सुविधाओं पर होने वाला खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है।
पुराने और नए प्रोजेक्ट पर अलग पड़ेगा असर
बढ़ती निर्माण लागत का असर सभी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर एक जैसा नहीं पड़ेगा। पहले से लॉन्च और काफी हद तक बिक चुके प्रोजेक्ट्स के लिए स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
ऐसे प्रोजेक्ट्स में डेवलपर ने पहले ही खरीदारों के लिए कीमत तय कर दी होती है। इसलिए लागत बढ़ने के बाद तुरंत कीमत बढ़ाना आसान नहीं होता। इसका सीधा असर डेवलपर के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
वहीं नए प्रोजेक्ट्स में डेवलपर्स के पास बढ़ी हुई लागत को बिक्री कीमत में शामिल करने की अपेक्षाकृत ज्यादा गुंजाइश होती है। लेकिन यहां भी बाजार की मांग एक सीमा तय करती है।
मिडिल क्लास खरीदारों पर बढ़ सकता है दबाव
अगर निर्माण लागत, जमीन की कीमत और अन्य इनपुट कॉस्ट लगातार बढ़ती रहती है, तो इसका अंतिम असर घर खरीदारों पर पड़ सकता है। खासतौर पर मिड-इनकम और अफोर्डेबल हाउसिंग सेगमेंट में कीमत बढ़ाना डेवलपर्स के लिए आसान नहीं होगा।
इस वर्ग के खरीदारों की भुगतान क्षमता सीमित होती है। ऐसे में बहुत ज्यादा कीमत बढ़ने पर मांग प्रभावित हो सकती है।
दूसरी तरफ, डेवलपर्स के लिए लागत को लंबे समय तक खुद वहन करना भी मुश्किल है। इसलिए आने वाले समय में रियल एस्टेट बाजार में जमीन की कीमत, निर्माण लागत और खरीदारों की भुगतान क्षमता के बीच संतुलन काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है।
घर खरीदने वालों के लिए क्या मतलब?
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि घरों की कीमतें निर्माण लागत की तुलना में तेज गति से बढ़ी हैं। ऐसे में घर खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए सिर्फ प्रॉपर्टी की मौजूदा कीमत देखना पर्याप्त नहीं होगा।
खरीदारों को लोकेशन, डेवलपर की विश्वसनीयता, प्रोजेक्ट की निर्माण स्थिति, कनेक्टिविटी और भविष्य में उस क्षेत्र में होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
निष्कर्ष: जमीन और निर्माण सामग्री की बढ़ती लागत ने रियल एस्टेट सेक्टर के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। 2021 से 2025 के बीच घरों की कीमतों में 59% की बढ़ोतरी और निर्माण लागत में 34% का उछाल इस बदलाव को स्पष्ट करता है। पश्चिम एशिया तनाव और महंगी लॉजिस्टिक्स ने लागत पर अतिरिक्त दबाव डाला है। ऐसे में आने वाले समय में घरों की कीमतों पर इन लागतों का असर कितना पड़ता है, यह देखने वाली बात होगी।


