नई दिल्ली। सोने की कीमतों ने पिछले कुछ वर्षों में निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया है। भारत में जहां इस साल घरेलू बाजार में सोने ने लगभग 20 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में मई के दौरान कीमतों में नरमी देखने को मिली। इसी वजह से अब बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सोने की तेजी अपने अंतिम चरण में पहुंच रही है और आने वाले महीनों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार मई महीने में वैश्विक स्तर पर सोने की कीमतों में 1.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि भारतीय बाजार में कीमतें 4.1 प्रतिशत बढ़ीं। यह अंतर दिखाता है कि घरेलू कारक और वैश्विक कारक फिलहाल अलग-अलग दिशा में काम कर रहे हैं।
हालांकि इतिहास बताता है कि सोने में जब भी लंबी और तेज रैली आती है, उसके बाद मुनाफावसूली और करेक्शन का दौर भी आता है। वर्ष 2011 में सोना रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था, लेकिन उसके बाद कई वर्षों तक कीमतों में कमजोरी बनी रही। इसी तरह कोविड महामारी के दौरान 2020 में तेजी के बाद भी बाजार में सुधार देखा गया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद और कई देशों द्वारा डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशें सोने को समर्थन दे रही हैं। यही कारण है कि कई बड़े निवेश बैंक अभी भी दीर्घकाल में सोने को सकारात्मक नजरिए से देख रहे हैं।
भारत में सोने की कीमतों को केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार ही प्रभावित नहीं करता। रुपये की कमजोरी, आयात शुल्क, जीएसटी और घरेलू मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरने के बावजूद भारतीय बाजार में सोना महंगा बना रहता है।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अभी खरीदारी करनी चाहिए या इंतजार करना चाहिए। वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि एकमुश्त निवेश के बजाय चरणबद्ध निवेश की रणनीति बेहतर हो सकती है। यदि कीमतों में करेक्शन आता है तो निवेशकों को बेहतर स्तर पर खरीदारी का मौका मिल सकता है।
बाजार के जानकार यह भी याद दिलाते हैं कि सोना केवल रिटर्न का साधन नहीं बल्कि जोखिम से बचाव का माध्यम भी है। इसलिए किसी भी निवेश पोर्टफोलियो में 10 से 15 प्रतिशत हिस्सेदारी सोने की रखना दीर्घकालीन रणनीति के लिए उपयोगी माना जाता है।
आने वाले महीनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, डॉलर इंडेक्स की चाल, केंद्रीय बैंकों की खरीद और भू-राजनीतिक घटनाक्रम सोने की दिशा तय करेंगे। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं तनाव बढ़ने या डॉलर कमजोर होने की स्थिति में सोना फिर नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ सकता है।


